“विकास भी, विरासत भी” के संकल्प के साथ आगे बढ़ता राजस्थान

Rajasthan moves forward with the resolve of “Development as well as Heritage”

गोपेन्द्र नाथ भट्ट

राजस्थान अपनी ऐतिहासिक धरोहर, समृद्ध संस्कृति और वीरता की गाथाओं के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध रहा है। किलों, महलों, हवेलियों, लोककला और परंपराओं से सुसज्जित यह प्रदेश केवल अतीत की यादों में ही नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की संभावनाओं में भी अग्रणी बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसी दृष्टि को साकार करने के लिए राज्य सरकार मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और उप मुख्यमंत्री और पर्यटन मंत्री दिया कुमारी “विकास भी, विरासत भी” के संकल्प के साथ कार्य कर रही है। यह नारा केवल एक राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि एक संतुलित और दूरदर्शी विकास मॉडल का प्रतीक है।
आधुनिक युग में विकास का अर्थ केवल आधारभूत संरचना का विस्तार या औद्योगिक प्रगति नहीं रह गया है। अब विकास में सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है। राजस्थान सरकार ने इस बदलते परिदृश्य को समझते हुए विकास की ऐसी रूपरेखा तैयार की है, जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ-साथ सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी सुनिश्चित किया जा रहा है।

राज्य में सड़कों, एक्सप्रेस-वे, रेल और हवाई सेवाओं के विस्तार के माध्यम से कनेक्टिविटी को मजबूत किया जा रहा है। नई औद्योगिक नीतियों के जरिए निवेश को आकर्षित किया जा रहा है, जिससे रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं। युवाओं के लिए स्वरोजगार योजनाएं, स्टार्टअप प्रोत्साहन और कौशल विकास कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, जो प्रदेश को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में सहायक हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी आधुनिक सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है, जिससे आमजन का जीवन स्तर बेहतर हो सके।

दूसरी ओर, राजस्थान की पहचान उसकी विरासत से है। यदि यह विरासत सुरक्षित नहीं रहेगी, तो प्रदेश अपनी आत्मा खो देगा। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सरकार ने ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और संवर्धन के लिए अनेक पहल की हैं। किलों, मंदिरों, बावड़ियों और प्राचीन स्थापत्य को संरक्षित कर उन्हें पर्यटन से जोड़ा जा रहा है। इससे न केवल इतिहास सुरक्षित रहता है, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होते हैं।

पर्यटन के क्षेत्र में “थीम आधारित सर्किट” विकसित किए जा रहे हैं, जिनमें सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों को एक-दूसरे से जोड़ा जा रहा है। लोक कलाकारों, हस्तशिल्पियों और ग्रामीण कारीगरों को प्रोत्साहित कर उनकी कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इससे परंपराएं जीवित रहती हैं और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर मिलता है।

“विकास भी, विरासत भी” का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह संतुलन बनाता है। यदि केवल विकास पर ध्यान दिया जाए, तो आधुनिकता की दौड़ में हमारी सांस्कृतिक पहचान खो सकती है। वहीं यदि केवल विरासत को ही महत्व दिया जाए, तो आर्थिक प्रगति बाधित हो सकती है। इसलिए दोनों का समन्वय ही एक स्थायी और समृद्ध भविष्य की नींव रख सकता है।
राजस्थान सरकार का यह दृष्टिकोण “विकसित राजस्थान” के लक्ष्य को भी मजबूत करता है। वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प में राजस्थान की महत्वपूर्ण भूमिका होगी, और इसके लिए राज्य को आर्थिक रूप से सुदृढ़ तथा सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाए रखना आवश्यक है।

निष्कर्षतः, “विकास भी, विरासत भी” एक ऐसा संतुलित मार्ग है, जो राजस्थान को आधुनिकता की ओर अग्रसर करते हुए उसकी ऐतिहासिक पहचान को भी अक्षुण्ण बनाए रखता है। यह नीति न केवल वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक समृद्ध और गौरवशाली राजस्थान की नींव तैयार करती रहे।