वैश्विक संकट बनता अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र

America and the United Nations becoming a global crisis

सीता राम शर्मा ” चेतन “

संवैधानिक प्रशासनिक सामाजिक नपुंसकता निष्क्रियता मानवीय व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी अव्यवस्था अराजकता का कारण बनती है । फिलहाल चलता युद्धरत वैश्विक संकट भी युद्ध को लेकर इसी वैश्विक संवैधानिक प्रशासनिक सामाजिक नपुंसकता निष्क्रियता का ही परिणाम है । दुर्भाग्य से वैश्विक संकट के मुख्य कारण बने निष्प्रभावी संयुक्त राष्ट्र के वर्तमान आत्मघाती वैश्विक प्रारूप से ना खुद यह वैश्विक संगठन परिचित है बल्कि वे सभी वैश्विक राष्ट्र भी परिचित हैं जिन्होंने इसे वैश्विक शांति और सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ही बनाया था । कहा और माना यह जाता है कि तेजी से बदलती वैश्विक व्यवस्था के साथ इस संगठन के ढांचे में आवश्यक बदलाव नहीं किया जाना इसकी वर्तमान असफलता और इसके महत्वहीन होने का मुख्य कारण है पर सच्चाई यह है कि इसकी असफलता का मुख्य कारण इसका विसंगतिपूर्ण त्रुटिपूर्ण निर्माणित प्रारंभिक ढांचा था जो इसके ऐसे वैश्विक संवैधानिक नियम कानूनों के स्तंभों पर बनाया गया था जो ना समान मानवीय, राष्ट्रीय और लोकतांत्रिक अधिकारों के अनुरूप था और ना ही समान अतंरराष्ट्रीय शांतिपूर्ण अधिकारों के लिए उपयुक्त । दुर्भाग्य से परिस्थितिवश त्रुटिपूर्ण हुए अपने उस निर्माण में यह संगठन आज तक वह आवश्यक सुधार नहीं कर पाया जो इसके होने को प्रासंगिक और उपयोगी सिद्ध कर सके । आश्चर्य का विषय यह है कि युद्ध की निरंतर बढ़ती त्रासदी और संभावनाओं के बीच वैश्विक जगत के साथ स्वंय
इस संगठन के सर्वोच्च पदाधिकारी भी इस संगठन को अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए असक्षम और असहाय बताते हुए इसमें व्यापक सुधार की बात तो करते हैं पर उस पर अमल करने-कराने में असफल हैं ! पिछले दिनों वर्तमान संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने तो संयुक्त राष्ट्र की कमियों, कमजोरियों और असफलताओं का जिक्र करते हुए यह भी स्पष्ट कह दिया कि उन्हें इसमें तत्काल आवश्यक सुधारों की कोई गुंजाइश भी दिखाई नहीं देती ! अफसोस कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव की यह चिंता व्यथा सिर्फ समाचारों का एक छोटा सा हिस्सा भर रही ।

गौरतलब है कि प्रायोजित वैश्विक आतंकवाद, युद्धोनमाद और दुनिया का जमा तथा बढ़ता घोर विनाशकारी युद्धक जखीरा वर्तमान विश्व की प्रमुख वैश्विक समस्या है, जिस पर पूर्ण नियंत्रण की शक्ति, दंड विधान तथा उसे लागू करने कराने की क्षमता हासिल किए बिना किसी भी प्रभावी वैश्विक संगठन का अस्तित्व में होना सर्वथा व्यर्थ होने के साथ ऐसी अत्यंत अनिवार्य आवश्यकता पर प्रमुखता से वैश्विक ध्यान आकृष्ट करने के मार्ग में भी बाधक है । यहां यह भी अत्यंत आवश्यक विचारणीय तथ्य है कि वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए एक वैश्विक संगठन और विधान होने के बावजूद नाटो जैसे क्षेत्रीय संगठनों और सुरक्षा गुटों की आवश्यकता क्यों ? ऐसे संगठनों और गुटों का अस्तित्व में होना संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक संगठन के होने के औचित्य पर बड़ा सवाल खड़ा करता है । इन महत्वपूर्ण तथ्यों और सवालों पर पूरी गंभीरता से सोचे और आवश्यक सुधार किए बिना किसी भी वैश्विक संगठन की प्रासंगिकता को ही खत्म करना है । अतः यदि सचमुच वैश्विक मानवीय समुदाय अथवा राष्ट्रों को वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए कोई प्रभावी वैश्विक संगठन चाहिए तो संयुक्त राष्ट्र में तत्काल बड़े सुुुधार करना चाहिए । बेहतर तो यह होगा कि वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप इसमें आमूलचूल परिवर्तन किया जाए ।

वैश्विक शांति के परिप्रेक्ष्य में रुस-युक्रेन के बाद चलते इरान-अमेरिका इजराइल युद्ध तक के पूरे हालिया घटनाक्रम पर गौर करें तो एक तरफ जहां ट्रंप के नेतृत्व वाला अमेरिका प्रमुख वैश्विक खलनायक की भूमिका में दिखाई देता है तो दूसरी तरफ इरान जैसे देश की भविष्य की तैयारियां और नीतियां भी वैश्विक भविष्य को लेकर चिंतित करने वाली लगती हैं । ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में अमेरिका फर्स्ट की बात करते हुए अब तक जिस नीति पर काम किया है वह विश्व के साथ अमेरिका के लिए भी अत्यंत घातक सिद्ध हुई है और इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि इसी तरह उन्होंने अपना यह कार्यकाल पूर्ण किया तो अमेरिका अपने इतिहास की उस सबसे शर्मनाक स्थिति को प्राप्त करेगा जिससे उबरने में उसे दशकों लग जाएगें और यह उसके साथ वैश्विक दृष्टिकोण से भी उचित नहीं होगा । ट्रंप को चाहिए कि वह अमेरिका के शक्ति-सामर्थ्य को वैश्विक संकट में डालने की बजाय उसे वैश्विक शांति और विकास में लगाए । अंत में बात मूलभूत भारतीय दृष्टिकोण और विचार के साथ, जो ईश्वरीय विश्वास और सिद्धांत को सर्वमान्य मानता है, यह प्रतीत होती है कि हर विध्वंस नवसृजन का कारण होता है । बेहतर होगा कि वह नवसृजन अनावश्यक मानवीय रक्तपात की बजाय अनावश्यक विध्वंसकारी कृत्रिम संसाधनों के विनाश और वैश्विक शासन व्यवस्था के साथ वैश्विक भाईचारे को ज्यादा मजबूत और विश्वसनीय बना कर हो । फिलहाल वैश्विक सुशासन और भाईचारे की राह में प्रथम दृष्टया सबसे बड़ी बाधा और संकट संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका ही दिखाई देता है । दुनिया को इन दोनों पर ही गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है ।