प्रभात डबराल
आपको ये तो पता ही है कि हिटलर के जमाने में जर्मनी में जितने यहूदी मारे गए थे उससे कई गुणा ज़्यादा यहूदी यहाँ पोलैंड में मारे गए थे.
आजकल पोलैंड में हूँ और वारसा में तो जहाँ देखो यहूदी प्रभाव दिखता रहता है इसलिए इनके बारे में कुछ दिलचस्प जानकारी शेयर कर रहा हूँ.
हज़ार सालों से यहाँ यहूदी रहते आए हैं. खासकर शहरों में. लेकिन ये कभी यहाँ बहुमत में नहीं थे. दोनों विश्व युद्धों के बीच नाजी अधिपत्य से पहले यहाँ करीब 35 लाख यहूदी थे जो हिटलरी नरसंहार के बाद घटकर लगभग तीन लाख रह गए. वे जनसंख्या के दस प्रतिशत से घटकर 0.3 प्रतिशत रह गए. 30/32 लाख मार दिए गये.
नरसंहार से पहले हालाँकि यहूदी कुल जनसंख्या के दस प्रतिशत ही थे लेकिन आमतौर पर दौलतमंद होने के कारण उनका जलवा ज़बरदस्त था. उनके घर बड़े और सुंदर थे, उन्होंने शानदार और विशाल सिनेगॉग (मंदिर) बनाए. व्यापार पर तो उनका क़ब्ज़ा ही था. हिटलर ने उनका सबकुछ तबाह कर दिया. जो ज़िंदा बचे वो या तो भाग गए या दाने दाने को मोहताज हो गए.
ऐसे में दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जब पोलैंड सोवियत संघ के साथ जुड़ा तो सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी का रवैया यहूदियों के प्रति सहानुभूति का रहा. यहूदी भी बड़ी तादाद में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए. कुछ तो नेता भी बन गए.
ये बात बाक़ी पोलिश लोगों को पसंद नहीं आई. वैसे भी रूस की बोल्शेविक क्रांति जारशाही को सत्ताच्युत करके हुई थी. ज़ार राजा होने के साथ साथ आर्थोडौक्स ईसाई चर्च के मुखिया भी माने जाते थे इसलिए कम्युनिस्टों पर ईसाई विरोधी होने का तमग़ा लगते समय नहीं लगा.
कम्युनिस्टों की धर्म निरपेक्षता को यहूदी तुष्टिकरण का जामा पहनाकर उन्हें ईसाई विरोधी प्रचारित कर दिया गया.
मार्क्स भी यहूदी थे ही इसलिए ईसाई धर्मगुरुओं को कम्युनिस्टों पर यहूदी तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए सोवियत संघ की अवधारणा पर ही हमला करने का मौक़ा मिल गया. अमरीका और पश्चिमी यूरोप को इस काम में जुटना ही था.
पोलैंड में सोवियत संघ से अलग होने का जो सफल आंदोलन चला उसके पीछे अन्य बातों के अलावा ‘तुष्टिकरण’ वाले प्रचार का भी,मामूली ही सही,पर कुछ हाथ तो था ही.
बहरहाल अब यहाँ यहूदी असरदार नहीं रहे. हालाँकि यहाँ के यहूदी आमतौर पर इसराइल के समर्थक कहे जा सकते हैं लेकिन इस समय जो युद्ध चल रहा है उस पर किसी बड़े यहूदी संगठन ने कोई टिप्पणी नहीं की है.
पोलैंड की सरकार भी हारमूज को खाली कराने अपने युद्धपोत भेजने से इंकार कर ही चुकी है.





