नजरूल के बेतरतीब जीवन को तरतीब से प्रस्तुत करता नाटक: झिली मिली, आंका बांका

A play that presents Nazrul's chaotic life in an orderly manner: Jhili Mili, Aanka Banka

नाट्य समीक्षा – रावेल पुष्प

विद्रोही कवि के नाम से प्रख्यात कवि काजी नजरूल इस्लाम के जीवन और उनकी विचारधारा तथा कुछ खास कविताओं को संजोती हुई नाट्य प्रस्तुति थी- झिली मिली आंका बांका!

उसे रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय के नाट्य विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ गगनदीप के निर्देशन में नटी विनोदिनी मंच पर प्रस्तुत कर रहा था थिएटर रिपेयेटर ग्रुप।

काजी नज़रुल इस्लाम का गरीबी में बीतता बचपन तथा बेतरतीब स्कूली शिक्षा और कर्म जीवन के विभिन्न पहलुओं मसलन कभी ब्रेड की फैक्ट्री में काम करना,कभी किसी अखबार में लिखना,मिलिट्री में काम वगैरह को बड़े सहज लेकिन कलात्मक तरीके से प्रस्तुत किया गया। इसके अलावा उनके स्कूली जीवन के मित्रों तथा साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों तथा उनके व्यक्तिगत जीवन यानि विवाह, पत्नी तथा ससुराल से संबंधित विभिन्न घटनाओं को बड़े कलात्मक तरीके से पेश किया गया है। इसके साथ ही उनकी प्रसिद्ध रचनाओं की भावपूर्ण प्रस्तुति कवि के मुख से कभी प्रत्यक्ष और कभी पार्श्व से की गई है। एक ही मंच पर न्यूनतम उपादानों से दृश्य परिवर्तन भी निश्चय ही निदेशक तथा कलाकारों की सूझबूझ का ही परिणाम था।

मंच पर काजी नज़रुल इस्लाम के बचपन से लेकर जीवन के विभिन्न समय पर चरित्रों को जीवंत कर रहे थे – अनुपमा भादुड़ी,अर्नव सेनगुप्ता,शायक मुखर्जी, सुशांत बनर्जी तथा देवराज मुखर्जी तथा कानन बाला और गिरीबाला देवी के चरित्र में थीं रिया खातून,विरोजा सुंदरी थीं इश्पिता घोष और बुलबुल थी किमाया।

इसकी संगीत परिकल्पना जहां गौतम घोष ने की थी वहीं नाट्य लेखन रतन सन्यायमथ का था।

गौरतलब है कि इसकी निर्देशक डॉ गगनदीप सुप्रतिष्ठित नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की छात्रा रही हैं तथा उन्होंने पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला से थियेटर और टीवी में स्वर्ण पदक के साथ स्नातकोत्तर किया है। वे कुछ विश्वविद्यालयों में थियेटर पर अतिथि प्रोफेसर के रूप में भी अपनी सेवाएं देती हैं और नाटकों के प्रति पूर्ण समर्पित हैं।

ये नाटक झिली मिली आंका बांका विद्रोही कवि काजी नजरूल इस्लाम के बेतरतीब जीवन को तरतीब से प्रस्तुत करता है।