सुनील कुमार महला
मध्य-पूर्व में जंग को चलते हुए एक महीने से भी ज्यादा का समय(34-35 दिन)हो गया है और इस युद्ध के और अधिक लंबा खिंचने से पूरी दुनिया सकते में है।इधर, हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सख्त/कड़ा रूख अपनाते हुए यह बात कही है कि अमेरिका बमबारी कर ईरान को पाषाण युग में पहुंचा देगा, जहां वो पहले था। वास्तव में, डोनाल्ड ट्रम्प के इस बयान का सीधा सा मतलब यह है कि किसी देश की सैन्य, आर्थिक और बुनियादी ताकत को पूरी तरह खत्म कर देना। इसे ठीक नहीं ठहराया जा सकता है।
बहरहाल , यहां पाठकों को बताता चलूं कि ट्रंप ने 2 अप्रैल 2026 गुरुवार तड़के (भारतीय समयानुसार) व्हाइट हाउस से प्राइम टाइम संबोधन में ये बात(ईरान को पाषाण युग में पहुंचा देने की बात) कही है। कहना ग़लत नहीं होगा कि डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान के बाद युद्धविराम और हॉर्मुज खुलने की उम्मीद लगा रही दुनिया सकते में हैं। ट्रंप ने कहा कि 32 दिन की जंग और अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन के बाद ईरान अब कोई खतरा नहीं है। अमेरिका ने ईरान की नौसेना और वायुसेना को नष्ट कर दिया है और ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम बुरी तरह प्रभावित हो चुका है। कहना ग़लत नहीं होगा कि अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पर हमला न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक शांति के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि सभी देश युद्ध के बजाय बातचीत, सहयोग और शांति के मार्ग को अपनाएं। हाल फिलहाल, ट्रंप ने कहा कि अगले दो-तीन हफ्तों में ईरान पर कड़ा प्रहार करेंगे और हम उसे पाषाण युग में भेज देंगे, जहां उसे वास्तव में होना चाहिए था। हालांकि, ट्रंप ने युद्ध को खत्म करने की कोई ठोस योजना नहीं बताई। उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि अमेरिका बहुत जल्दी अपना काम पूरा कर लेगा। इधर, डोनाल्ड ट्रंप की धमकी के बाद ईरान की आईआरजीसी के एयरोस्पेस प्रमुख जनरल सैय्यद माजिद मूसावी ने यह बात कही है कि 250 साल का इतिहास वाला देश छह हजार साल पुरानी सभ्यता को धमकी दे रहा है, और ये सिर्फ उसका भ्रम है। ट्रंप के पाषाण युग वाली धमकी से जुड़े अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की पोस्ट के जवाब में मूसावी ने कहा कि अमेरिका अपने सैनिकों को उनकी कब्रों की ओर ले जा रहा है। ईरान को पाषाण युग में ले जाना सिर्फ आपका भ्रम है। उन्होंने कहा कि हॉलीवुड के भ्रमों से अमेरिका के दिमाग में जहर भर गया है, इसी का नतीजा है कि वो हजारों साल पुरानी सभ्यता को धमका रहा है। अगर उसकी धरती पर कोई उतरता है तो एक भी व्यक्ति जिंदा नहीं बचेगा। वहीं, ईरान के पहले उप-राष्ट्रपति मो. रेजा आरीफ ने कहा कि सिर्फ पाषाण युग की मानसिकता वाला व्यक्ति ही देशों को पाषाण युग में पहुंचाने की धमकी दे सकता है।ईरान सेना के प्रमुख मेजर जनरल आमीर हतामी ने कहा कि हमपर हमला करने वाले नहीं बचेंगे। उन्होंने कहा कि अगर कोई हमारी धरती पर आक्रमण करता है तो हम उसे कड़ा जवाब देंगे। हमारे देश से युद्ध का साया हटना चाहिए। सभी के लिए सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए। वहीं ईरानी सेना के प्रवक्ता ले. कर्नल इब्राहिम जोल्फागरि ने कहा कि ईरान के पास मिसाइलों और विस्फोटों का पर्याप्त भंडार है। जिन सैन्य ठिकानों पर आपने हमला किया वो ईरान के लिए महत्वहीन हैं। वहीं दूसरी ओर
दुनियाभर के निवेशकों को यह उम्मीद थी की मध्य पूर्व की जंग थम जाएगी। तेल संकट से जूझ रहे देशों को इससे उबरने का मौका मिलेगा, लेकिन ट्रंप के ऐलान से दुनियाभर के बाजार सकते में आ गए। भारत का शेयर बाजार भी शुरुआत में लड़खड़ाकर संभला। कच्चा तेल और महंगा हो गया।सच तो यह है कि मध्य-पूर्व की जंग से पूरी दुनिया को कहीं न कहीं समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।एशियाई बाजारों में गिरावट आ गई है और निक्केई, शंघाई, हैंगसैग और सिंगापुर के बाजार 3% टूटे हैं। हालांकि, सेंसेक्स झटकों के बाद निचले स्तर से 2000 अंक सुधरा है।अमेरिकी बाजारों में भी जंग का काफी हद तक असर हुआ है और यही कारण है कि डैक्स, फिट्सी, नैस्डेक, डाओ जोन्स आधा फीसदी गिरा है। इधर, रुपये को आरबीआई ने संभाला और यह 1.56 रुपये की बढ़त लेकर 93.14 पर बंद हुआ। इतना ही नहीं, जंग से सोने-चांदी की कीमतों पर भी व्यापक रूप से असर पड़ा है और सोना 3500 रुपये तो चांदी 9000 रुपये की गिरावट लेकर बंद हुई।
बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि ताज़ा (अप्रैल 2026 तक) उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका-ईरान-इज़राइल युद्ध के कारण ईरान में सबसे भारी नुकसान हुआ है, जहाँ अब तक लगभग 1,800 से 2,000+ मौतें और करीब 20,000 तक घायल बताए जा रहे हैं। वहीं इज़राइल में लगभग 19-30 लोगों की मौत और 4,000 से अधिक लोग घायल हुए हैं। वहीं,अमेरिका के करीब 13-15 सैनिक मारे गए हैं। अगर पूरे संघर्ष क्षेत्र (ईरान, इज़राइल, लेबनान व अन्य प्रभावित इलाकों) को जोड़ें तो रायटर के अनुसार कुल मौतों का आंकड़ा 3,000 से 5,000 से अधिक के बीच पहुँच चुका है, जबकि घायलों की संख्या 20,000 से अधिक है। ताज़ा खबरों में यह भी बताया गया है कि यह युद्ध अभी जारी है और लगातार हवाई हमलों व मिसाइल हमलों के कारण ये आंकड़े रोज़ बढ़ रहे हैं, जिससे यह एक बड़े मानवीय संकट में बदलता जा रहा है।
कहना ग़लत नहीं होगा कि मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष-खासतौर पर ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने पूरी दुनिया को गहरे संकट में डाल दिया है। तेल और गैस आपूर्ति पर इसका सीधा असर पड़ा है, क्योंकि वैश्विक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है; परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल और एलएनजी की कीमतों में तेज उछाल देखा गया है। इसका असर यह हुआ कि परिवहन लागत बढ़ी, जिससे खाद्यान्न, दाल-अनाज, सब्ज़ियों और रोज़मर्रा के सभी आवश्यक सामान महंगे हो गए। कई देशों में महंगाई दर तेजी से बढ़ी है और आर्थिक अस्थिरता की आशंका गहरा गई है।
इसके साथ ही पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र को भी भारी क्षति पहुंच रही है। लगातार हो रहे हवाई हमलों, मिसाइल हमलों और तेल भंडारण केंद्रों पर हमलों से बड़े पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन, आगजनी और प्रदूषण बढ़ा है। समुद्री क्षेत्रों में तेल रिसाव का खतरा भी बढ़ गया है, जिससे समुद्री जीव-जंतु और तटीय पारिस्थितिकी प्रभावित हो रही है। युद्धग्रस्त क्षेत्रों में जल, वायु और मिट्टी प्रदूषण के कारण मानव स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरे मंडरा रहे हैं। इस प्रकार यह संघर्ष केवल सैन्य या राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक, पर्यावरणीय और मानवीय संकट का व्यापक रूप ले चुका है।
वास्तव में, युद्ध किसी भी समस्या का अंतिम और स्थायी समाधान नहीं हो सकता, बल्कि यह मानवता पर सीधा और गहरा प्रहार है। वर्तमान में अमेरिका, ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ता तनाव इस बात का उदाहरण है कि शक्ति प्रदर्शन और सैन्य टकराव केवल विनाश को जन्म देते हैं, समाधान को नहीं।सच तो यह है कि यह जंग जितनी लंबी खिंच रही है, उतना ही दुनिया के लिए खतरा बढ़ता जा रहा है। बड़े देशों के आक्रामक बयान हालात को और बिगाड़ सकते हैं। इसका असर सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और शांति पर पड़ रहा है। अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि ये राष्ट्र आपसी संवाद, कूटनीति और शांतिपूर्ण वार्ता के माध्यम से अपने मतभेदों को सुलझाएँ। यह सत्य है कि प्राकृतिक संसाधनों जैसे तेल और गैस पर मानव का अधिकार है, किंतु ये संसाधन सीमित हैं और इनका अंधाधुंध दोहन या युद्ध के कारण विनाश अंततः पूरी मानवता के लिए हानिकारक सिद्ध होगा। युद्ध के चलते न केवल अर्थव्यवस्था और समाज प्रभावित होते हैं, बल्कि धरती भी बंजर होती जा रही है; जंगल नष्ट हो रहे हैं, जैव विविधता खतरे में है और पशु-पक्षियों का अस्तित्व संकट में पड़ रहा है। इसलिए यह समय विनाश के मार्ग से हटकर सह-अस्तित्व, संतुलन और शांति के रास्ते को अपनाने का है, क्योंकि अंततः यही मानव और प्रकृति दोनों के हित में है।





