भाजपा के 47 साल: शिखर पर जीत, सिद्धांतों पर सवाल

47 years of BJP: Victory at the top, questions on principles

दिलीप कुमार पाठक

6 अप्रैल 1980 को मुंबई के समंदर किनारे जब अटल बिहारी वाजपेयी ने अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा का उद्घोष किया था, तो वह केवल एक चुनावी नारा नहीं बल्कि एक वैकल्पिक राजनीति का संकल्प था। आज 2026 में जब भारतीय जनता पार्टी अपना 47वां स्थापना दिवस मना रही है, तो इसमें कोई दो राय नहीं कि वह दुनिया के सबसे बड़े और अजेय नजर आने वाले राजनीतिक संगठन के रूप में स्थापित हो चुकी है। लेकिन इस अभूतपूर्व सफलता के ऊंचे बुर्ज पर बैठकर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो कुछ बुनियादी सवाल आज भी पार्टी की उस अलग तरह के दल वाली छवि का पीछा कर रहे हैं। क्या सत्ता के इस विशाल साम्राज्य को खड़ा करने की प्रक्रिया में वे आदर्श कहीं पीछे छूट गए हैं, जो इस दल की नींव में रखे गए थे? भारतीय राजनीति के इस लंबे सफर में भाजपा ने शून्य से शिखर तक की जो यात्रा तय की है, वह संगठनात्मक कौशल का अद्भुत उदाहरण तो है, पर क्या यह सफर अपनी मूल शुचिता को भी साथ लेकर चल पाया है?

भाजपा की वैचारिक यात्रा का मूल आधार अंत्योदय और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के दो मजबूत स्तंभ थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का सपना था कि विकास की कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति का उदय हो। हालांकि, उज्ज्वला से लेकर मुफ्त राशन और सीधे बैंक खातों में मदद जैसी बड़ी योजनाओं ने एक बड़ा लाभार्थी वर्ग तैयार किया है, जिसे पार्टी अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानती है। लेकिन क्या कल्याणकारी योजनाओं का यह दाता और याचक वाला मॉडल असल सशक्तिकरण है? आज की राजनीति सेवा से ज्यादा आयोजन प्रबंधन और डिजिटल प्रचार पर टिकी नजर आती है। जिस नैतिक बल और सादगी की मिसाल पुराने दौर के नेता देते थे, उसकी जगह अब चकाचौंध और भारी-भरकम चुनावी मशीनरी ने ले ली है। विकास के दावों के बीच यह सवाल अक्सर दबी जुबान में पूछा जाता है कि क्या हम बुनियादी मुद्दों के बजाय केवल भावनात्मक और सांकेतिक राजनीति के जाल में तो नहीं उलझ गए हैं?

एक जीवंत लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष का होना उतना ही जरूरी है जितना कि एक स्पष्ट बहुमत वाली सरकार का होना। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में विपक्ष मुक्त भारत की जिस अवधारणा को हवा दी गई, उसने लोकतांत्रिक संतुलन को बुरी तरह असहज किया है। जांच एजेंसियों के बढ़ते प्रभाव और विपक्षी नेताओं का बड़ी संख्या में भाजपा में शामिल होकर रातों-रात पवित्र हो जाना, पार्टी की उस शुचिता पर गहरा सवालिया निशान लगाता है जिसका दावा वह दशकों से करती आई है। क्या सत्ता पाने की व्याकुलता में किसी भी दल के दागी चेहरों को अपना लेना उस कार्यकर्ता आधारित संगठन के लिए सही है, जो कभी अपने सिद्धांतों पर गर्व करता था? आज पार्टी का ढांचा भी पहले की तुलना में अधिक व्यक्ति-केंद्रित हो गया है। सामूहिक नेतृत्व और आंतरिक विमर्श की जगह अब केवल ऊपर से आने वाले आदेशों और हां में हां मिलाने वाली संस्कृति ने ले ली है।

राम मंदिर का निर्माण, अनुच्छेद 370 का खात्मा और नागरिकता कानूनों जैसे मुद्दों पर उसे व्यापक जनसमर्थन मिला है, लेकिन क्या राष्ट्रवाद की इस प्रबल लहर ने देश की बुनियादी आर्थिक चुनौतियों को कालीन के नीचे धकेल दिया है? बढ़ती बेरोजगारी, मध्यम वर्ग पर महंगाई का लगातार बढ़ता बोझ और अमीर-गरीब के बीच बढ़ती गहरी खाई ऐसे कड़वे सच हैं, जिन्हें केवल भव्य आयोजनों और नारों से नहीं बदला जा सकता। आत्मनिर्भर भारत का संकल्प तब तक अधूरा है जब तक देश का शिक्षित युवा रोजगार के लिए दर-दर भटक रहा है। बड़े व्यापारिक घरानों के साथ बढ़ती नजदीकियों ने भी यह धारणा पुख्ता की है कि पार्टी का झुकाव अब आम आदमी से हटकर खास प्रबंधकों की ओर हो गया है।

स्थापना दिवस के इस महत्वपूर्ण अवसर पर भाजपा को गहराई से आत्ममंथन करने की जरूरत है। क्या वह केवल चुनाव जीतने वाली एक पेशेवर मशीन बनकर रहना चाहती है या वापस उस नैतिक राजनीति की ओर लौटेगी, जिसका वादा 1980 के मुंबई अधिवेशन में किया गया था? लोकतंत्र केवल बहुमत का नाम नहीं है, यह अल्पमत के सम्मान, आलोचना को पचाने की शक्ति और संस्थाओं की स्वायत्तता का नाम भी है। यदि भाजपा को आने वाले दशकों में अपनी साख और गौरवशाली इतिहास को बचाए रखना है, तो उसे अपनी जीत के अहंकार से ऊपर उठकर उन लोकतांत्रिक मूल्यों को फिर से गले लगाना होगा, जो उसकी स्थापना की मूल भावना थे। सत्ता तो आती-जाती रहती है, लेकिन जो विचार अपनी नैतिकता और लोक-लाज की परवाह करना छोड़ देता है, वह इतिहास की नजरों में अपनी चमक धीरे-धीरे खोने लगता है। आने वाला समय बताएगा कि कमल की यह पंखुड़ियाँ सिद्धांतों की महक फैलाती हैं या केवल सत्ता की धूप में मुरझा कर रह जाती हैं।