जयदेव राठी
आज के समय में रसोई की कल्पना एलपीजी गैस के बिना अधूरी सी लगने लगी है। पिछले एक दशक में सरकारों ने रसोई गैस को स्वच्छ ईंधन के रूप में प्रचारित किया और विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी पहुँच बढ़ाने के लिए कई योजनाएँ लागू कीं। इसका परिणाम यह हुआ कि आज देश के अधिकांश घरों में एलपीजी सिलेंडर मौजूद है। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या किसी एक ईंधन पर इतनी अधिक निर्भरता उचित है? दुनिया के कई देश धीरे-धीरे एलपीजी पर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को अपनाने की बात कर रहे हैं। ऐसे में यह विषय विचारणीय हो जाता है कि क्या हमें भी पुराने और वैकल्पिक विकल्पों को सुरक्षित रखकर चलना चाहिए।
एलपीजी को स्वच्छ ईंधन माना जाता है क्योंकि यह लकड़ी, कोयला या गोबर के उपलों की तुलना में कम धुआँ उत्पन्न करता है। ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य की दृष्टि से यह एक बड़ी राहत के रूप में सामने आया। पहले रसोई में चूल्हे के धुएँ के कारण आँखों में जलन, साँस की बीमारी और फेफड़ों से जुड़ी समस्याएँ आम बात थीं। एलपीजी के उपयोग से इन समस्याओं में काफी कमी आई है। यही कारण है कि इसे स्वास्थ्य के लिए बेहतर विकल्प बताया जाता है।
यह प्रचलित धारणा है कि एलपीजी स्वास्थ्य के लिए पूर्णतः सुरक्षित है। परंतु हालिया वैज्ञानिक अनुसंधान इस मान्यता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। एलपीजी दहन से फॉर्मेल्डिहाइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें उत्पन्न होती हैं, जो बंद रसोई में स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न करती हैं। चार देशों में किए गए एक बड़े शोध, जिसे ‘हैपिन ट्रायल’ कहा जाता है, में जीवाश्म ईंधन से एलपीजी पर स्थानांतरण के बाद भी अपेक्षित स्वास्थ्य लाभ नहीं मिले, जिसने इस विषय पर बहस को और जटिल बना दिया। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी अब यह स्वीकार करता है कि एलपीजी एक ‘अंतरिम’ समाधान है, अंतिम नहीं। एलपीजी को वास्तव में एक संक्रमणकालीन ईंधन के रूप में देखा जाता है, जब तक नवीकरणीय ऊर्जा के विकल्प व्यापक पैमाने पर बाज़ार में उपलब्ध न हों।
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि एलपीजी पूरी तरह जोखिम मुक्त नहीं है। गैस सिलेंडर से रिसाव, विस्फोट और दुर्घटनाओं की घटनाएँ समय-समय पर सामने आती रहती हैं। ग्रामीण और छोटे कस्बों में जहाँ सुरक्षा के प्रति जागरूकता कम होती है, वहाँ यह खतरा और भी बढ़ जाता है। इसके अलावा एलपीजी पेट्रोलियम से प्राप्त होने वाला ईंधन है और भारत अपनी जरूरत का अधिकांश हिस्सा आयात करता है। इस कारण इसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर रहती है। जब कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है तो गैस सिलेंडर महंगा हो जाता है और इसका सीधा असर आम परिवार के बजट पर पड़ता है।
ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से भी यह चिंता का विषय है कि यदि किसी कारण से गैस की आपूर्ति बाधित हो जाए तो करोड़ों परिवारों की रसोई प्रभावित हो सकती है। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी संकट के कारण ईंधन की आपूर्ति प्रभावित होती है तो सबसे पहले आम आदमी ही परेशान होता है। इसलिए किसी एक स्रोत पर पूरी तरह निर्भर होना दूरदर्शिता नहीं माना जाता।
यहाँ यह बात भी याद रखने योग्य है कि हमारे ग्रामीण समाज ने सदियों तक बिना एलपीजी के जीवन व्यतीत किया है। लकड़ी, गोबर के उपले, कृषि अवशेष और बायोमास जैसे कई विकल्पों का उपयोग किया जाता था। इन विकल्पों में कुछ कमियाँ अवश्य थीं, लेकिन यह स्थानीय स्तर पर उपलब्ध और सस्ते भी थे। आज भी कई बुजुर्ग बताते हैं कि पारंपरिक चूल्हे पर बना भोजन स्वाद और स्वास्थ्य दोनों की दृष्टि से अलग होता था।
हालाँकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें पूरी तरह पुराने तरीकों की ओर लौट जाना चाहिए। असल आवश्यकता संतुलन की है। आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए पारंपरिक विकल्पों को अधिक सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल बनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए सुधरे हुए चूल्हे, बायोगैस प्लांट और सौर ऊर्जा आधारित कुकिंग सिस्टम ऐसे विकल्प हैं जो भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
दुनिया के कई देशों में आज ऊर्जा के विविध स्रोतों पर जोर दिया जा रहा है। यूरोप और अमेरिका में इलेक्ट्रिक इंडक्शन कुकटॉप, सोलर कुकिंग और बायोगैस जैसी तकनीकों पर तेजी से काम हो रहा है। इसका उद्देश्य केवल पर्यावरण की रक्षा करना ही नहीं बल्कि ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों को विकसित करना भी है ताकि किसी एक ईंधन पर निर्भरता कम हो सके।
भारत जैसे विशाल और विविधताओं वाले देश में यह और भी आवश्यक हो जाता है। यहाँ अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग संसाधन उपलब्ध हैं। पहाड़ी इलाकों में लकड़ी और बायोमास अधिक मिलता है, जबकि धूप वाले क्षेत्रों में सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएँ हैं। यदि स्थानीय संसाधनों के आधार पर ऊर्जा के विकल्प विकसित किए जाएँ तो न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी बल्कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी।
एक और महत्वपूर्ण पहलू पर्यावरण का है। एलपीजी को अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन माना जाता है, लेकिन यह जीवाश्म ईंधन ही है और इससे कार्बन उत्सर्जन होता है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे को देखते हुए दुनिया अब धीरे-धीरे नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ रही है। यदि भविष्य में कार्बन उत्सर्जन पर सख्त नियम लागू होते हैं तो एलपीजी का उपयोग भी सीमित हो सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में बायोगैस एक बहुत अच्छा विकल्प हो सकता है। पशुपालन वाले परिवारों के लिए यह ईंधन सस्ता और टिकाऊ है। इससे न केवल रसोई के लिए गैस मिलती है बल्कि जैविक खाद भी तैयार होती है, जो खेती के लिए उपयोगी है। इसी प्रकार सौर ऊर्जा आधारित कुकर और इलेक्ट्रिक कुकिंग सिस्टम भी धीरे-धीरे लोकप्रिय हो सकते हैं, खासकर तब जब बिजली की उपलब्धता बेहतर हो जाए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऊर्जा के क्षेत्र में हमें दूरदर्शी नीति अपनानी होगी। केवल एक तकनीक या एक ईंधन को समाधान मान लेना उचित नहीं है। सरकार को चाहिए कि वह एलपीजी के साथ-साथ अन्य विकल्पों को भी बढ़ावा दे।
अनुसंधान और नवाचार के माध्यम से ऐसे समाधान विकसित किए जाएँ जो सस्ते, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल हों।
समाज के स्तर पर भी जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। लोगों को यह समझना होगा कि ऊर्जा के विविध स्रोत हमारे लिए सुरक्षा कवच की तरह होते हैं। यदि किसी कारण से एक स्रोत उपलब्ध न हो तो दूसरा विकल्प काम आ सके। यही कारण है कि पुराने जमाने में लोग कई प्रकार के ईंधनों का उपयोग करते थे और किसी एक पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहते थे।
यह कहा जा सकता है कि एलपीजी ने हमारे जीवन को सुविधाजनक बनाया है और इसके कई लाभ भी हैं, लेकिन केवल इसी पर निर्भर रहना बुद्धिमानी नहीं होगी। भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए हमें ऊर्जा के विविध विकल्पों को विकसित करना होगा। पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का समन्वय ही हमें सुरक्षित और स्थायी ऊर्जा व्यवस्था की ओर ले जा सकता है। यदि हम आज से ही वैकल्पिक रास्तों पर ध्यान देंगे तो आने वाले समय में किसी भी संकट का सामना अधिक मजबूती से कर पाएँगे। यही ऊर्जा सुरक्षा और स्वस्थ समाज की दिशा में सबसे समझदारी भरा कदम होगा।





