आचार्य महाश्रमण की निर्गुण-चेतना से विश्व-शांति की नई दिशा

A new direction for world peace through the Nirguna consciousness of Acharya Mahashraman

ललित गर्ग

मानव इतिहास के इस अशांत और संक्रमणकालीन दौर में जब विश्व का परिदृश्य युद्ध, हिंसा, आतंकवाद और वैचारिक टकरावों से आच्छादित है, तब शांति, सह-अस्तित्व और मानवीय मूल्यों की पुकार पहले से कहीं अधिक तीव्र हो उठी है। ऐसे समय में आचार्य महाश्रमण एक ऐसे आध्यात्मिक प्रकाशस्तंभ के रूप में उभरते हैं, जिनका चिंतन केवल किसी एक पंथ, सम्प्रदाय या राष्ट्र तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का व्यापक दृष्टिकोण अपने भीतर समेटे हुए है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व ‘निर्गुण रंगी चदरिया’ की उस अनुभूति को मूर्त करता है, जो गुणों के पार जाकर आत्मा की शुद्ध चेतना में स्थित होने का संदेश देती है। भगवद्गीता में अर्जुन को दिए गए श्रीकृष्ण के उपदेश ‘त्रिगुणातीत बन जा’ के अनुरूप आचार्य महाश्रमण का जीवन एक सजीव उदाहरण बनकर सामने आता है। उन्होंने सत्व, रज और तम के बंधनों को पार कर उस निर्गुण अवस्था को साधने का प्रयास किया है, जहाँ व्यक्ति न केवल आत्मबोध को प्राप्त करता है, बल्कि समष्टि के कल्याण का माध्यम भी बन जाता है। उनका यह दृष्टिकोण केवल दार्शनिक विमर्श नहीं, बल्कि व्यवहारिक जीवन में उतरा हुआ सत्य है। उनकी साधना ‘सत्य की पूजा’ नहीं करती, बल्कि ‘सत्य की शल्य-चिकित्सा’ करती है अर्थात् वे सत्य को केवल स्वीकार नहीं करते, बल्कि उसकी गहराई में उतरकर उसे परिष्कृत करते हैं।

आचार्य महाश्रमण का जीवन ‘रहें भीतर, जीएँ बाहर’ के सूत्र पर आधारित है। यह सूत्र आधुनिक जीवन की जटिलताओं में संतुलन स्थापित करने का एक अद्वितीय मार्ग प्रस्तुत करता है। आज का मनुष्य बाहरी उपलब्धियों की दौड़ में अपने भीतर के शून्य को अनदेखा कर देता है, जिसके परिणामस्वरूप तनाव, असंतोष और हिंसा का जन्म होता है। आचार्य महाश्रमण का चिंतन इस अंतर्विरोध को समाप्त करने का प्रयास करता है। वे सिखाते हैं कि यदि भीतर शांति और संतुलन है, तो बाहर का जीवन स्वतः ही सुव्यवस्थित हो जाता है। यही कारण है कि उनकी साधना केवल आत्मिक उन्नति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी आधार बनती है। उनकी ‘अहिंसा यात्रा’ आज के समय की एक ऐतिहासिक और युगान्तरकारी पहल है, जो हमें दांडी यात्रा और भूदान आंदोलन की याद दिलाती है। यह यात्रा केवल एक पदयात्रा नहीं, बल्कि विचारों की क्रांति है-एक ऐसी क्रांति, जो हथियारों से नहीं, बल्कि संवाद, संवेदना और संस्कारों से संचालित होती है। देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रों में पैदल चलकर उन्होंने लाखों लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया, उन्हें नशामुक्ति, सदाचार, नैतिकता और अहिंसा के मार्ग पर अग्रसर किया। आज जब विश्व के अनेक देश युद्ध और आतंकवाद की विभीषिका से जूझ रहे हैं, तब आचार्य महाश्रमण का यह प्रयास एक वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करता है-एक ऐसा मार्ग, जहाँ शांति केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि एक व्यवहारिक संभावना बन जाती है। उनकी दृष्टि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को साकार करती है, जहाँ सम्पूर्ण विश्व एक परिवार के रूप में देखा जाता है। वे किसी व्यक्ति को उसके धर्म, जाति, वर्ग या क्षेत्र के आधार पर नहीं, बल्कि उसके भीतर विद्यमान गुणों के आधार पर आंकते हैं। यह दृष्टिकोण न केवल सामाजिक समरसता को बढ़ावा देता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर शांति और सहयोग की नींव भी रखता है। आज जब पहचान की राजनीति और सांस्कृतिक विभाजन समाज को खंडित कर रहे हैं, तब आचार्य महाश्रमण का यह समन्वयवादी दृष्टिकोण अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है।

आचार्य महाश्रमण की सादगी, विनम्रता और अनुशासन उनके व्यक्तित्व की विशिष्ट पहचान हैं। आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ जैसे महान आचार्यों के सान्निध्य में विकसित उनका जीवन एक ऐसी परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, जो आत्मानुशासन और सेवा को सर्वोच्च मूल्य मानती है। बाल्यावस्था में ही दीक्षा लेकर उन्होंने जिस तप, त्याग और समर्पण का मार्ग अपनाया, वह आज के भौतिकतावादी युग में एक प्रेरणास्रोत है। उनकी जीवन यात्रा मोहनलाल से मुनि मुदितकुमार, फिर महाश्रमण और अंततः आचार्य बनने तक एक ऐसी साधना गाथा है, जो यह सिद्ध करती है कि आत्मबल और संकल्प से किसी भी ऊँचाई को प्राप्त किया जा सकता है। आचार्य महाश्रमण की बौद्धिक प्रतिभा भी उतनी ही प्रभावशाली है, जितनी उनकी आध्यात्मिक साधना। उत्तराध्ययन सूत्र और भगवद्गीता जैसे महान ग्रंथों का तुलनात्मक अध्ययन कर उन्होंने यह सिद्ध किया है कि सत्य किसी एक परंपरा का एकाधिकार नहीं है। उनके प्रवचनों का संकलन ‘सुखी बनो’ इस दृष्टि का सशक्त उदाहरण है, जिसमें उन्होंने जीवन को सरल, सार्थक और संतुलित बनाने के सूत्र प्रस्तुत किए हैं। उनका चिंतन आगम, दर्शन, तर्कशास्त्र, मनोविज्ञान और समाजशास्त्र जैसे विविध क्षेत्रों को समाहित करता है, जिससे उनका व्यक्तित्व एक बहुआयामी मनीषी के रूप में उभरता है।
आज के वैश्विक परिदृश्य में, जहाँ युद्ध की विभीषिका और परमाणु हथियारों की होड़ मानव अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरा बन चुकी है, वहाँ आचार्य महाश्रमण का ‘अहिंसा का शंखनाद’ एक जीवनदायी संदेश के रूप में सामने आता है। उनका यह विश्वास कि ‘अहिंसा केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है’, हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि क्या वास्तव में हिंसा के माध्यम से स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है? उनका उत्तर स्पष्ट है-नहीं। शांति का मार्ग केवल संवाद, सहिष्णुता और करुणा से होकर गुजरता है। उनके प्रयासों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे केवल उपदेश नहीं देते, बल्कि स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। प्रतिदिन नई ऊर्जा और संकल्प के साथ वे मानव उत्थान के कार्यों में जुटे रहते हैं। उनकी दिनचर्या, उनका अनुशासन और उनका समर्पण यह दर्शाता है कि सच्चा नेतृत्व वही है, जो अपने आचरण से दूसरों को प्रेरित करे। उनके नेतृत्व में तेरापंथ धर्मसंघ न केवल संगठित और सशक्त हुआ है, बल्कि उसने समाज सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य और नैतिक जागरण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

निश्चित तौर पर जैन धर्म के महान तपस्वी, अनुशासनप्रिय, दूरदर्शी और तेजस्वी आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में आध्यात्मिकता और आधुनिकता का अद्भुत संगम बनी जैन विश्व भारती में इस वर्ष योगक्षेम वर्ष के रूप में एक नया आध्यात्मिक इतिहास रचा जा रहा है, आध्यात्मिक प्रशिक्षण की एक नई परंपरा विकसित की जा रही है। देशभर में विचरण करने वाले साधु-संतों को एक जगह बुलाकर आचार्य महाश्रमण उन्हें अध्यात्म का प्रशिक्षण दे रहे हैं। यह वास्तव में जैन धर्म का एक अनूठा और संभवतः पहला ऐसा व्यापक प्रयोग है, जिसमें वर्षभर तक साधु-साध्वियों के साथ-साथ श्रावक समाज को भी गहन एवं व्यवस्थित रूप से जैन एवं तेरापंथ दर्शन, अध्यात्म, योग, ध्यान, स्वाध्याय, संयम और जीवन मूल्यों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। आचार्य श्री महाश्रमण की दूरदर्शी सोच, उनका अनुशासन, उनका साधना-प्रधान जीवन और समाज को आध्यात्मिक दिशा देने का उनका प्रयास वास्तव में अद्वितीय है। उन्होंने धर्म को केवल परंपरा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जीवन और समाज से जोड़ा। समय को बांधने की अद्भुत खूबी है उनमें। कम समय में अधिक काम। वह भी इतनी सहजता और निर्भरता से सम्पादित कर लेने की सामर्थ्य, उनकी कार्य व्यस्तता कभी व्यग्रता में नहीं बदलती। यह सब इसीलिए हो सकता है कि उनकी प्रत्येक प्रवृत्ति निवृत्ति से निथर कर आती है। उनकी क्रियाशीलता आंतरिक स्थिरता स्थितप्रज्ञता से अभिनिःसृत होती है।

आचार्य महाश्रमण का चिंतन एक नए युग का उद्घोष है-एक ऐसा युग, जहाँ विज्ञान और आध्यात्म, भौतिकता और नैतिकता, व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन स्थापित हो सके। वे हमें यह सिखाते हैं कि वास्तविक प्रगति केवल तकनीकी उन्नति से नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों के विकास से संभव है। उनका जीवन और संदेश हमें यह विश्वास दिलाता है कि यदि हम अहिंसा, सत्य, और करुणा के मार्ग पर चलें, तो एक शांतिपूर्ण और समृद्ध विश्व का निर्माण संभव है। अंततः आचार्य महाश्रमण केवल एक धर्मगुरु नहीं, बल्कि एक युगद्रष्टा हैं, जिनकी दृष्टि वर्तमान की सीमाओं को पार कर भविष्य की संभावनाओं को देखती है। उनकी ‘निर्गुण चदरिया’ हमें यह संदेश देती है कि जब मनुष्य अपने भीतर के गुणों से ऊपर उठकर शुद्ध चेतना में स्थित हो जाता है, तभी वह सच्चे अर्थों में मानवता की सेवा कर सकता है। आज के युद्धग्रस्त और अशांत विश्व में, उनके विचार और प्रयास एक प्रकाशपुंज की तरह हैं, जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने की क्षमता रखते हैं।