अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम हेट स्पीच- डिजिटल युग में हेट स्पीच दंगों व नफरतों को खुला आमंत्रण

Freedom of Expression vs. Hate Speech – Hate speech in the digital age is an open invitation to riots and hatred

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

वैश्विक स्तरपर संचार क्रांति ने जिस गति से समाज को बदला है,वह अभूतपूर्व है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और 24×7 ब्रॉडकास्ट मीडिया के विस्तार ने सूचना के प्रवाह को इतना तेज बना दिया है कि अब किसी व्यक्ति, चाहे वह आम नागरिक हो,राजनीतिक नेता हो या धार्मिक वक्ता,इनका एक शब्द भी कुछ ही मिनटों में लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंच जाता है। यह तकनीकी प्रगति जहां लोकतंत्र को मजबूत करने, विचारों के आदान-प्रदान और पारदर्शिता बढ़ाने का माध्यम बनी है,वहीं इसके नकारात्मक पहलू भी उतनी ही तेजी से सामने आए हैं। खासकर हेट स्पीच यानें नफरत फैलाने वाले भाषणों ने सामाजिक सौहार्द, धर्मनिरपेक्षता और भाईचारे की भावना के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर दी है।

जब कोई भड़काऊ बयान, अफवाह या सांप्रदायिक टिप्पणी वायरल होती है, तो उसका प्रभाव केवल डिजिटल दुनियाँ तक सीमित नहीं रहता, वह वास्तविक जीवन में तनाव,अविश्वास, हिंसा और यहां तक कि दंगों का कारण बन सकता है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत समेत दुनियाँ के कई देशों में हेट स्पीच को नियंत्रित करने के लिए कानूनों और न्यायिक हस्तक्षेप की मांग तेज हुई है।इसी पृष्ठभूमि में 29 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसने इस बहस को नई दिशा दी।अदालत ने हेट स्पीच को रोकने के लिए नए दिशानिर्देश बनाने या अतिरिक्त न्यायिक हस्तक्षेप से इनकार करते हुए स्पष्ट कहा कि मौजूदा कानूनी ढांचा इन अपराधों से निपटने के लिए पर्याप्त है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन की है। यह निर्णय केवल कानूनी दृष्टिकोण से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्रमें शक्तियों के पृथक्करण न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका के बीच संतुलन को भी स्पष्ट करता है।

साथियों बात अगर हम हेट स्पीच के खिलाफ दायर याचिकाओं में याचिकाकर्ताओं ने तर्क को समझने की करें तो उन्होंने तर्क दिया था कि वर्तमान कानून अस्पष्ट हैं और उनका प्रभावी तरीके से पालन नहीं हो रहा हैउनका कहना था कि राजनीतिक भाषणों, धार्मिक सभाओं और सोशल मीडिया के माध्यम से फैल रही नफरत समाज में विभाजन को बढ़ा रही है और इसके लिए एक स्पष्ट, सख्त और समग्र कानून की आवश्यकता है। कोरोना जिहाद जैसे विवादित नैरेटिव और विभिन्न धार्मिक मंचों से दिए गए भड़काऊ भाषणों का उदाहरण देते हुएउन्होंने अदालत से मांग की थी कि वह इस दिशा में ठोस दिशानिर्देश जारी करे।

किन अदालत ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया और दोहराया कि कानून बनाने का अधिकार संसद और राज्य विधानसभाओं के पास है, न कि न्यायपालिका के पास। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक न्यायालय कानून की व्याख्या कर सकते हैं और मौलिक अधिकारों को लागू करवा सकते हैं, लेकिन वे खुद कानून नहीं बना सकते।

साथियों बात अगर हम इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू को समझने की करें तो वह यह है कि अदालत ने भारतीय न्यायिक परंपरा को कायम रखते हुए विधायी शून्य (लेजिस्लेटिव वेंक्यूम ) की अवधारणा को खारिज किया। अदालत ने कहा कि भारत में पहले से ही ऐसे कई कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, जो हेट स्पीच से निपटने के लिए पर्याप्त हैं। उदाहरण के तौर पर, भारतीय न्याय संहिता 2023 की विभिन्न धाराएं जैसे धारा 196 (वैमनस्य फैलाना), धारा 299 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना) और अन्य प्रावधान स्पष्ट रूप से इस तरह के अपराधों को कवर करते हैं। इसके अलावा, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 में भी ऐसे प्रावधान हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि संज्ञेय अपराधों के मामलों में एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य हो। अदालत ने यह भी बताया कि यदि पुलिस एफआईआर दर्ज करने में विफल रहती है, तो पीड़ित व्यक्ति पुलिस अधीक्षक या मजिस्ट्रेट के पास जाकर न्याय प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार, कानूनी ढांचे में पर्याप्त उपाय मौजूद हैं,जरूरत है तो केवल उनके सही और समय पर उपयोग की।हालांकि अदालत ने यह भी स्वीकार किया कि यदि बदलते समय और सामाजिक चुनौतियों के अनुसार नए कानूनों या संशोधनों की आवश्यकता महसूस होती है, तो केंद्र और राज्य सरकारें इस पर विचार कर सकती हैं। इस संदर्भ में 2017 की लॉ कमीशन की 267वीं रिपोर्ट का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है, जिसमें हेट स्पीच से संबंधित कानूनों को और स्पष्ट करने के सुझाव दिए गए थे। लेकिन अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह निर्णय विधायिका के विवेक पर निर्भर करता है, न कि न्यायपालिका के निर्देश पर।

साथियों बात अगर हम इस पूरे मामले में सबसे जटिल और महत्वपूर्ण सवाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और हेट स्पीच के बीच संतुलन का है इसको समझने की करें तो, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) के तहत इस अधिकार पर उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं,जैसे कि सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस संतुलन को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। अदालत ने संकेत दिया कि हर आपत्तिजनक या कठोर बयान को हेट स्पीच नहीं माना जा सकता। यदि ऐसा किया गया, तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का अनावश्यक हनन होगा। इसलिए, केवल वही भाषण प्रतिबंधित होना चाहिए जो वास्तव में हिंसा, घृणा या वैमनस्य को बढ़ावा देता हो।यह दृष्टिकोण भारतीय न्यायपालिका के पिछले कई महत्वपूर्ण फैसलों के अनुरूप है। उदाहरण के लिए, प्रवासी भलाई संगठन बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हेट स्पीच से निपटने के लिए मौजूदा कानून पर्याप्त हैं और समस्या उनके क्रियान्वयन में है। इसी तरह, श्रेया सिंघल बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया में अदालत ने आईटी एक्ट की धारा 66A को रद्द करते हुए यह स्पष्ट किया था कि केवल वही भाषण प्रतिबंधित किया जा सकता है जो उकसावे की श्रेणी में आता है। इस फैसले ने डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं को सटीक रूप से परिभाषित किया।

साथियों बात अगर हम इस विषय पर पूर्व में दिए गए माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को समझने की करें तो सुब्रमण्यम स्वामी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया में अदालत ने यह स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है और इसमें दूसरों की प्रतिष्ठा और गरिमा की रक्षा भी शामिल है। वहीं तहसीन एस. पूनावाला बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया में अदालत ने मॉब लिंचिंग और हेट स्पीच के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए सरकारों को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए थे। हाल के वर्षों में अमिश देवगन बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया ने हेट स्पीच की परिभाषा को और स्पष्ट किया, यह बताते हुए कि ऐसा भाषण जो किसी समुदाय के खिलाफ घृणा या हिंसा को बढ़ावा देता है, वह हेट स्पीच के दायरे में आता है।इन सभी फैसलों को एक साथ देखने पर यह स्पष्ट होता है कि सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण लगातार संतुलित और सुसंगत रहा है। अदालत ने न तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पूर्ण रूप से निरंकुश होने दिया है और न ही हेट स्पीच के नाम पर इसे अत्यधिक सीमित किया है।बल्कि उसने एक मध्य मार्ग अपनाया है, जहां लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक सद्भाव दोनों की रक्षा की जा सके।फिर भी, सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब कानून मौजूद हैं, तो हेट स्पीच की घटनाएं क्यों बढ़ रही हैं? इसका उत्तर प्रशासनिक और राजनीतिक क्रियान्वयन में निहित है। कई मामलों में देखा गया है कि पुलिस समय पर एफआईआर दर्ज नहीं करती, जांच में देरी होती है या निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। कभी-कभी राजनीतिक दबाव या सामाजिक ध्रुवीकरण भी कार्रवाई को प्रभावित करता है। ऐसे में अदालत का यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है कि कानून की प्रभावशीलता उसके अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके निष्पक्ष और समयबद्ध क्रियान्वयन में है।

साथियों बात अगर हमडिजिटल युग में हेट स्पीच की चुनौती और भी जटिल हो गई है इसको समझने की करें तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम के माध्यम से ऐसे कंटेंट को तेजी से फैलाते हैं, जो अधिक विवादास्पद या भावनात्मक होता है। इससे नफरत फैलाने वाले संदेशों का प्रसार और भी तेज हो जाता है। इसके अलावा, फेक न्यूज और अफवाहें भी इस समस्या को बढ़ाती हैं। इसलिए केवल कानूनी उपाय पर्याप्त नहीं हैं इसके लिए तकनीकी, सामाजिक और शैक्षिक स्तर पर भी प्रयास आवश्यक हैं।समाधान के रूप में एक बहु- आयामी दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। सबसे पहले, कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना होगा। पुलिस और प्रशासन को प्रशिक्षित और जवाबदेह बनाना होगा ताकि वे समय पर और निष्पक्ष कार्रवाई कर सकें।दूसरा,सोशल मीडिया कंपनियों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी और हेट स्पीच को रोकने के लिए सख्त नीतियां लागू करनी होंगी। तीसरा, समाज में जागरूकता बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है ताकि लोग नफरत फैलाने वाले भाषणों को पहचान सकें और उनके खिलाफ आवाज उठा सकें।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करें इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि हेट स्पीच केवल एक कानूनी समस्या नहीं है यह एक सामाजिक, नैतिक और राजनीतिक चुनौती भी है। सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला इस बात को स्पष्ट करता है कि भारत में कानूनों की कमी नहीं है, बल्कि उनकी प्रभावशीलता को बढ़ाने की आवश्यकता है। यह निर्णय एक महत्वपूर्ण संदेश देता है: लोकतंत्र में संतुलन बनाए रखना जरूरी है जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे, लेकिन उसके नाम पर नफरत और हिंसा को बढ़ावा न मिले। जब तक सरकार, न्यायपालिका, मीडिया और आम नागरिक मिलकर इस दिशा में काम नहीं करेंगे, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा। यही वह रास्ता है, जो एक समावेशी, शांतिपूर्ण और मजबूत लोकतांत्रिक समाज की ओर ले जाता है।