सुरक्षित और टिकाऊ मुद्रा की नई पहल

New initiative for safe and durable currency

महेन्द्र तिवारी

भारत की अर्थव्यवस्था निरंतर विस्तार के नए चरण में प्रवेश कर रही है। डिजिटल भुगतान के बढ़ते प्रचलन के बावजूद नकद मुद्रा आज भी करोड़ों भारतीयों के दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। देश के छोटे व्यापार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक परिवहन, कृषि बाजार और असंगठित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आज भी नकद लेनदेन पर निर्भर है। ऐसे में मुद्रा की गुणवत्ता, सुरक्षा और टिकाऊपन केवल तकनीकी विषय नहीं रह जाते, बल्कि आर्थिक व्यवस्था की विश्वसनीयता से सीधे जुड़े होते हैं। इसी संदर्भ में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा पॉलीमर अर्थात प्लास्टिक आधारित नोटों की दिशा में उठाया गया कदम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। केंद्र सरकार ने आरबीआई के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए दस रुपये और बीस रुपये के पॉलीमर नोटों के बड़े पैमाने पर फील्ड ट्रायल की अनुमति दी है। पहले चरण में दोनों मूल्यवर्ग के एक एक अरब नोटों का परीक्षण किया जाएगा। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो भविष्य में अन्य मूल्यवर्ग के नोटों में भी इस तकनीक का विस्तार किया जा सकता है। फिलहाल सरकार ने स्पष्ट किया है कि कागजी नोटों को तत्काल हटाने की कोई योजना नहीं है और यह केवल परीक्षण आधारित पहल है।

पॉलीमर नोट सामान्य कागज से नहीं बल्कि विशेष प्रकार के सिंथेटिक पॉलीमर पदार्थ से बनाए जाते हैं। यह सामग्री नमी, धूल, गंदगी और बार बार मोड़े जाने जैसी परिस्थितियों को बेहतर ढंग से सहन कर सकती है। यही कारण है कि इनकी आयु पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में कई गुना अधिक होती है। सामान्यतः कम मूल्यवर्ग के नोट सबसे अधिक हाथों से गुजरते हैं और कुछ ही महीनों में फटने या खराब होने लगते हैं। इसके कारण रिजर्व बैंक को हर वर्ष बड़ी संख्या में पुराने नोट वापस लेकर नए नोट छापने पड़ते हैं। यदि पॉलीमर नोट अपेक्षा के अनुसार लंबे समय तक चलते हैं तो नोटों की छपाई, परिवहन और नष्ट करने की लागत में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।

भारत में नकली नोटों की चुनौती लंबे समय से चिंता का विषय रही है। समय समय पर सुरक्षा एजेंसियों ने नकली भारतीय मुद्रा के नेटवर्क का खुलासा किया है। नकली नोट केवल आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचाते बल्कि उनका उपयोग अवैध गतिविधियों और संगठित अपराध में भी किया जाता है। पॉलीमर नोटों में पारदर्शी विंडो, उन्नत होलोग्राम, रंग बदलने वाली स्याही, सूक्ष्म प्रिंटिंग और अन्य आधुनिक सुरक्षा विशेषताएं जोड़ी जा सकती हैं। इन विशेषताओं की नकल करना पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में कहीं अधिक कठिन माना जाता है। इसलिए पॉलीमर नोट नकली मुद्रा पर प्रभावी नियंत्रण का माध्यम बन सकते हैं।

इस पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू पर्यावरण से भी जुड़ा हुआ है। पहली नजर में प्लास्टिक शब्द सुनकर पर्यावरण संबंधी चिंताएं स्वाभाविक लग सकती हैं, लेकिन पॉलीमर नोट सामान्य प्लास्टिक नहीं होते। इनका निर्माण विशेष तकनीक से किया जाता है और उपयोग के बाद इन्हें पुनर्चक्रित भी किया जा सकता है। चूंकि इनकी आयु अधिक होती है इसलिए समान अवधि में कम संख्या में नोट छापने पड़ते हैं। इससे कागज की खपत, ऊर्जा की आवश्यकता और परिवहन संबंधी खर्च में भी कमी आती है। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी माना है कि लंबे समय में पॉलीमर नोट पर्यावरणीय दृष्टि से लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं।

दुनिया के अनेक देशों ने पहले ही पॉलीमर मुद्रा को अपनाकर इसके लाभ प्राप्त किए हैं। ऑस्ट्रेलिया इस तकनीक को अपनाने वाला पहला देश था। इसके बाद कनाडा, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, रोमानिया और अनेक अन्य देशों ने भी अपनी मुद्रा में पॉलीमर तकनीक का उपयोग किया। इन देशों के अनुभव बताते हैं कि पॉलीमर नोट अधिक समय तक सुरक्षित रहते हैं और नकली नोटों की घटनाओं में कमी लाने में सहायक होते हैं। भारत जैसे विशाल देश के लिए इन अनुभवों का अध्ययन अत्यंत उपयोगी हो सकता है।

भारत में पॉलीमर नोटों का विचार नया नहीं है। वर्ष 2013 और उसके बाद भी सीमित स्तर पर कुछ शहरों में इनका परीक्षण किया गया था। उस समय विभिन्न तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब बदलती आर्थिक आवश्यकताओं, बेहतर तकनीक और बढ़ती मुद्रा मांग को देखते हुए इसे नए रूप में पुनर्जीवित किया गया है। इस बार परीक्षण का दायरा पहले की तुलना में कहीं बड़ा रखा गया है ताकि अलग अलग जलवायु, भौगोलिक परिस्थितियों और उपयोग के स्तर पर नोटों के प्रदर्शन का व्यापक मूल्यांकन किया जा सके।

भारत जैसे देश में मौसम की विविधता एक बड़ी चुनौती है। कहीं अत्यधिक गर्मी पड़ती है तो कहीं लगातार वर्षा होती है। कई क्षेत्रों में धूल और नमी का स्तर भी अधिक रहता है। ऐसे वातावरण में कागजी नोट अपेक्षाकृत जल्दी खराब हो जाते हैं। फील्ड ट्रायल का उद्देश्य यही समझना है कि पॉलीमर नोट वास्तविक परिस्थितियों में कितने प्रभावी सिद्ध होते हैं। यदि वे इन परिस्थितियों में भी अपनी गुणवत्ता बनाए रखते हैं तो उनका व्यापक उपयोग आर्थिक दृष्टि से लाभदायक हो सकता है।

हालांकि इस योजना के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। पॉलीमर नोटों के निर्माण की प्रारंभिक लागत कागजी नोटों की तुलना में अधिक होती है। इसके अलावा एटीएम मशीनों, नकदी गिनने वाली मशीनों और बैंकिंग प्रणाली के कुछ उपकरणों में आवश्यक तकनीकी परिवर्तन भी करने पड़ सकते हैं। जनता को नए नोटों की विशेषताओं की जानकारी देना और उन्हें नकली नोटों से अलग पहचानने का प्रशिक्षण देना भी आवश्यक होगा। इसलिए यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

भारत में डिजिटल भुगतान प्रणाली तेजी से विकसित हुई है। यूपीआई ने लेनदेन की दुनिया बदल दी है, फिर भी नकदी की उपयोगिता समाप्त नहीं हुई है। छोटे दुकानदारों, ग्रामीण क्षेत्रों, सीमित इंटरनेट वाले इलाकों और अनेक सामाजिक परिस्थितियों में नकद भुगतान आज भी सबसे सुविधाजनक माध्यम है। इसलिए डिजिटल अर्थव्यवस्था और नकद मुद्रा दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। पॉलीमर नोटों की पहल इसी संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसमें आधुनिक तकनीक अपनाते हुए नकद मुद्रा को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जा रहा है।

आरबीआई का यह निर्णय केवल नए प्रकार के नोट जारी करने तक सीमित नहीं है बल्कि यह भविष्य की मुद्रा व्यवस्था की दिशा भी तय करता है। यदि परीक्षण सफल रहता है तो भारत उन देशों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा जिन्होंने आधुनिक तकनीक के माध्यम से अपनी मुद्रा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया है। इससे जनता का विश्वास मजबूत होगा, नकली नोटों की चुनौती कम होगी और मुद्रा प्रबंधन की लागत में भी दीर्घकालिक बचत संभव होगी।

यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल कागजी नोटों को समाप्त करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है। परीक्षण पूरा होने के बाद उसके परिणामों का मूल्यांकन किया जाएगा। यदि अपेक्षित सफलता मिलती है तभी आगे की रणनीति तय होगी। यह सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि भारत की विशाल आबादी और विविध परिस्थितियों में किसी भी बड़े परिवर्तन को चरणबद्ध तरीके से लागू करना ही व्यावहारिक होता है।

आर्थिक सुधारों की सफलता केवल नई नीतियां बनाने से नहीं बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन से निर्धारित होती है। पॉलीमर नोटों का प्रयोग भी इसी कसौटी पर परखा जाएगा। यदि यह पहल सफल होती है तो भारत की मुद्रा व्यवस्था अधिक आधुनिक, सुरक्षित और टिकाऊ बन सकती है। इससे नकली नोटों पर नियंत्रण, सरकारी खर्च में कमी, जनता को बेहतर गुणवत्ता वाले नोट और बैंकिंग व्यवस्था को अधिक दक्ष बनाने जैसे अनेक लाभ प्राप्त हो सकते हैं। आने वाले वर्षों में यह पहल भारतीय मुद्रा इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों में से एक सिद्ध हो सकती है और यह दिखाएगी कि तकनीकी नवाचार किस प्रकार आम नागरिक के दैनिक जीवन को भी अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बना सकता है।