डिग्री का प्रमाणपत्र या ज्ञान का प्रमाण?

A degree certificate or proof of knowledge?

अजय कुमार बियानी

भारत में जब भी किसी सार्वजनिक व्यक्ति की शैक्षणिक योग्यता पर बहस छिड़ती है, तो चर्चा का केंद्र अक्सर डिग्री बन जाती है। कोई पूछता है—डिग्री असली है या नहीं? कोई कहता है—विश्वविद्यालय का अभिलेख दिखाइए। कोई यह सिद्ध करने में जुट जाता है कि अमुक व्यक्ति कितना पढ़ा-लिखा है। परंतु इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा प्रश्न पीछे छूट जाता है—क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था वास्तव में ज्ञान देती है, या केवल डिग्री?
यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति, किसी एक दल या किसी एक नेता का नहीं, बल्कि पूरे भारतीय शिक्षा तंत्र का है।

हमारी परीक्षा प्रणाली का बड़ा हिस्सा वर्षों तक रटने की संस्कृति पर आधारित रहा है। विद्यालयों में शिक्षक यदि किसी प्रश्न को “महत्त्वपूर्ण” बता दें, तो विद्यार्थी समझ जाता है कि यही प्रश्न परीक्षा में आएगा। उत्तर समझने से अधिक उन्हें याद करने पर ज़ोर दिया जाता है। परीक्षा समाप्त होते ही अधिकांश उत्तर स्मृति से भी समाप्त हो जाते हैं।

यही कारण है कि कई बार अधिक अंक प्राप्त करने वाला विद्यार्थी व्यवहारिक ज्ञान में पीछे रह जाता है और औसत अंक प्राप्त करने वाला विषय की वास्तविक समझ रखता है। प्रयोगशाला में प्रयोग करने वाला छात्र अंकतालिका में पीछे रह जाता है, जबकि केवल संभावित प्रश्न रटने वाला शीर्ष स्थान प्राप्त कर लेता है।

यह समस्या केवल विज्ञान तक सीमित नहीं है। गणित, अर्थशास्त्र, साहित्य, समाजशास्त्र—लगभग प्रत्येक विषय में परीक्षा और ज्ञान के बीच की दूरी दिखाई देती है। डिग्री हाथ में आ जाती है, लेकिन विषय का आत्मविश्वास विकसित नहीं हो पाता।

उच्च शिक्षा की स्थिति भी अनेक प्रश्न खड़े करती है। शोध का उद्देश्य ज्ञान का विस्तार होना चाहिए, लेकिन अनेक स्थानों पर शोध केवल उपाधि प्राप्त करने की औपचारिकता बनकर रह गया है। कहीं प्रभाव काम करता है, कहीं परिचय, कहीं केवल औपचारिकता। निस्संदेह अनेक विश्वविद्यालयों और शोधकर्ताओं ने उत्कृष्ट कार्य भी किया है, परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि पूरी व्यवस्था समान रूप से आदर्श नहीं कही जा सकती।

समाज में एक और प्रवृत्ति भी दिखाई देती है। अनेक बार डिग्री प्रतिष्ठा का प्रतीक बन जाती है, ज्ञान का नहीं। परिचय देते समय कहा जाता है—फलाँ व्यक्ति अमुक विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर हैं, अमुक विषय में शोध कर चुके हैं। लेकिन यदि उसी विषय पर सामान्य संवाद किया जाए, तो अनेक बार उत्तर केवल पुस्तकीय परिभाषाओं तक सीमित रह जाते हैं।

यहीं से शिक्षा और साक्षरता का अंतर स्पष्ट होता है। साक्षर व्यक्ति पढ़-लिख सकता है, जबकि शिक्षित व्यक्ति परिस्थितियों का विवेकपूर्ण विश्लेषण भी कर सकता है। डिग्री साक्षरता का प्रमाण हो सकती है, परंतु शिक्षा का प्रमाण केवल व्यवहार देता है।

इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक योग्यता को लेकर वर्षों से विवाद होता रहा है। समर्थक और विरोधी दोनों अपने-अपने तर्क प्रस्तुत करते हैं। किंतु यदि इस विवाद से ऊपर उठकर देखा जाए, तो अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि किसी भी जननेता की वास्तविक क्षमता का मूल्यांकन केवल प्रमाणपत्रों से किया जा सकता है या उसके अनुभव, निर्णय क्षमता और प्रशासनिक समझ से भी?

राजनीति किसी विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला नहीं है। करोड़ों लोगों वाले विविधतापूर्ण देश का संचालन केवल पुस्तकीय ज्ञान से संभव नहीं होता। इसके लिए समाज की नब्ज पहचानने की क्षमता, प्रशासनिक अनुभव, निर्णय लेने का साहस और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने की योग्यता भी आवश्यक होती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि औपचारिक शिक्षा का महत्व कम है। शिक्षा तो किसी भी समाज की सबसे बड़ी शक्ति है। परंतु शिक्षा और डिग्री को समानार्थी मान लेना भी उचित नहीं होगा। इतिहास ऐसे अनेक व्यक्तित्वों से भरा पड़ा है जिनके पास सीमित औपचारिक शिक्षा थी, परंतु उनकी दूरदृष्टि असाधारण थी। दूसरी ओर अनेक उच्च शिक्षित लोग व्यवहारिक जीवन में साधारण सिद्ध हुए।

आज भारत एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन, डिजिटल प्रौद्योगिकी और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के समय में केवल रटकर परीक्षा पास करने वाली शिक्षा पर्याप्त नहीं रह गई है। अब आवश्यकता है जिज्ञासा, विश्लेषण, नवाचार, अनुसंधान और समस्या-समाधान की क्षमता विकसित करने वाली शिक्षा की।

नई शिक्षा नीति ने इस दिशा में कुछ सकारात्मक संकेत अवश्य दिए हैं, किंतु वास्तविक परिवर्तन तभी आएगा जब विद्यालयों में अंक से अधिक समझ को महत्व मिलेगा, प्रयोगशालाएँ केवल औपचारिकता नहीं रहेंगी, शोध केवल उपाधि प्राप्ति का माध्यम नहीं होगा और विश्वविद्यालय रोजगार देने वाले प्रमाणपत्रों के बजाय ज्ञान उत्पन्न करने वाले केंद्र बनेंगे।

हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि केवल सरकारें शिक्षा नहीं बदल सकतीं। शिक्षक, विद्यार्थी, अभिभावक, विश्वविद्यालय, समाज और उद्योग—सभी को अपनी भूमिका निभानी होगी। जब तक परीक्षा में अंक ही सफलता का अंतिम मापदंड बने रहेंगे, तब तक रटने की प्रवृत्ति समाप्त नहीं होगी।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम किसी व्यक्ति की डिग्री पर बहस करने से पहले अपनी शिक्षा व्यवस्था के आईने में स्वयं को देखें। यदि लाखों विद्यार्थी वर्षों तक पढ़ने के बाद भी विषय का आत्मविश्वास विकसित नहीं कर पाते, तो दोष केवल विद्यार्थियों का नहीं, व्यवस्था का भी है।
भारत को भविष्य में केवल अधिक डिग्रीधारी नागरिक नहीं, बल्कि अधिक सक्षम, अधिक जिज्ञासु और अधिक विचारशील नागरिक चाहिए। क्योंकि राष्ट्र का निर्माण प्रमाणपत्रों से नहीं, ज्ञान, चरित्र और विवेक से होता है।

डिग्री सम्मान की बात है, परंतु उससे भी बड़ा सम्मान है—ऐसा ज्ञान, जो समाज और राष्ट्र के काम आए। यही भारतीय शिक्षा व्यवस्था का वास्तविक लक्ष्य होना चाहिए।