जंतर-मंतर के छात्र आंदोलन की सरकार के वादा खिलाफी से छात्र असंतुष्ठ हैं ?

Are the students dissatisfied with the government's failure to keep its promises regarding the Jantar Mantar student protest?

सौरभ वार्ष्णेय

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां असहमति व्यक्त करने का अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित है। जब समाज का कोई वर्ग अपनी समस्याओं को लेकर संगठित होकर आवाज उठाता है, तो उसे लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया माना जाता है। हाल के दिनों में दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों द्वारा किया गया आंदोलन और 20 जुलाई 2026 के संसद चलो कार्यक्रम ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। परीक्षा प्रणाली, भर्ती प्रक्रिया और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर हजारों युवाओं की भागीदारी ने यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या आज का छात्र पहले की तुलना में अधिक निर्भीक होकर सरकार के सामने अपनी बात रख रहा है। आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में छात्रों की भागीदारी, सरकार के विरुद्ध लगाए गए तीखे नारे और पुलिस के साथ हुए टकराव ने इस बहस को और गहरा कर दिया।

इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि इसमें केवल किसी एक विश्वविद्यालय या राज्य के छात्र नहीं थे, बल्कि विभिन्न राज्यों के युवा एक साझा मुद्दे पर एक मंच पर दिखाई दिए। जब किसी आंदोलन का आधार व्यापक जनहित का प्रश्न बन जाता है, तब उसका प्रभाव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी होता है। यही कारण है कि जंतर-मंतर का यह आंदोलन सामान्य छात्र प्रदर्शनों से अलग दिखाई दिया।

कई विश्लेषकों का मानना है कि इस आंदोलन ने यह संकेत दिया कि नई पीढ़ी केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि वह आवश्यकता पडऩे पर सड़क पर उतरकर भी अपनी बात कहने को तैयार है। यदि यह आकलन सही है, तो यह लोकतांत्रिक भागीदारी का संकेत हो सकता है। लेकिन इसके साथ यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी एक आंदोलन के आधार पर पूरे छात्र समुदाय की मन:स्थिति के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

भारतीय छात्र आंदोलनों का इतिहास बताता है कि जब भी युवाओं ने किसी मुद्दे को अपने भविष्य से जोड़ा है, तब उनकी भागीदारी व्यापक हुई है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर जेपी आंदोलन तक, छात्रों ने सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस दिखाया। वर्तमान आंदोलन भी इसी परंपरा की याद दिलाता है, हालांकि इसकी परिस्थितियां अलग हैं।

इस आंदोलन के दौरान सरकार की आलोचना खुलकर हुई। कई प्रदर्शनकारियों ने सार्वजनिक रूप से सरकार की नीतियों और परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए। यह दृश्य उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण था जो मानते हैं कि आज का युवा राजनीतिक रूप से उदासीन हो गया है। इसके विपरीत, आंदोलन ने यह संकेत दिया कि जब भविष्य और अवसरों का प्रश्न सामने आता है, तब छात्र खुलकर अपनी राय रखते हैं।

हालांकि यह कहना कि “सरकार का डर पूरी तरह खत्म हो गया है, एक व्यापक निष्कर्ष होगा, जिसके समर्थन में पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। किसी आंदोलन में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी यह अवश्य दिखाती है कि अनेक छात्र सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखने के लिए तैयार थे, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि सभी छात्रों के मन से भय समाप्त हो गया है। अलग-अलग क्षेत्रों, संस्थानों और परिस्थितियों में छात्रों के अनुभव भिन्न हो सकते हैं।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई और उसके बाद की घटनाओं पर भी व्यापक चर्चा हुई। कुछ प्रदर्शनकारियों ने अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगाए, वहीं प्रशासन की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया गया। इन घटनाओं के बाद कुछ मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की मांग भी की गई।

लोकतंत्र में किसी भी सरकार की आलोचना करना नागरिक का अधिकार है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि विरोध शांतिपूर्ण और संवैधानिक दायरे में रहे। इसी प्रकार राज्य की जिम्मेदारी है कि वह शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखे। यही संतुलन लोकतंत्र की परिपक्वता का आधार है।

इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह भी रहा कि परीक्षा सुधारों पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हुई। व्यापक जनदबाव के बाद सरकार ने परीक्षा प्रणाली में सुधारों की घोषणा की, एक उच्चस्तरीय टास्क फोर्स गठित की और संबंधित विधायी कदम भी उठाए। इससे यह संकेत मिलता है कि लोकतांत्रिक आंदोलनों का नीति-निर्माण पर प्रभाव पड़ सकता है।

आज का छात्र पहले की तुलना में अधिक जागरूक है। इंटरनेट, डिजिटल मीडिया और सूचना तक आसान पहुंच ने उसे अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति अधिक सचेत बनाया है। यही कारण है कि वह केवल दर्शक बनकर नहीं रहना चाहता, बल्कि निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने की भी कोशिश करता है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए सकारात्मक हो सकती है, यदि इसे संवाद और संवैधानिक मूल्यों के साथ आगे बढ़ाया जाए।

जंतर-मंतर का आंदोलन यह अवश्य दर्शाता है कि भारतीय छात्र समुदाय का एक महत्वपूर्ण वर्ग अपनी बात खुलकर रखने को तैयार है। लेकिन यह कहना कि “सरकार का डर पूरी तरह समाप्त हो गया है”, उपलब्ध तथ्यों से स्थापित निष्कर्ष नहीं है। अधिक संतुलित निष्कर्ष यह होगा कि इस आंदोलन ने अनेक छात्रों में अपनी मांगों को सार्वजनिक रूप से उठाने का आत्मविश्वास प्रदर्शित किया और सरकार तथा समाज दोनों को यह संदेश दिया कि युवाओं की चिंताओं को गंभीरता से सुनना आवश्यक है। लोकतंत्र की शक्ति इसी में है कि सरकारें आलोचना सुनें, नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखें और संवाद के माध्यम से समाधान खोजे जाएं।