तीन तलाक कानून: आधी आबादी को डर से आज़ादी मिलने के निहितार्थ

Triple Talaq Law: Implications of Freedom from Fear for Half the Population

दिलीप कुमार पाठक

देश की संसद ने जब एक झटके में तीन तलाक कहने की सदियों पुरानी प्रथा पर कानूनन रोक लगाई, तो उसे महज़ एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं माना गया। वह देश की करोड़ों मुस्लिम महिलाओं के लिए एक नए सवेरे जैसी उम्मीद थी। हालांकि यह सोचना ज़रूरी हो जाता है कि ज़मीन पर इस कानून से कितना बड़ा बदलाव आया है और समाज में इसे लेकर पहले और अब की स्थिति में क्या अंतर आया है। यह बदलाव सिर्फ कानूनी पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर हमारे सामाजिक ताने-बाने और महिलाओं के बुनियादी मानवाधिकारों पर पड़ा है।

कानून बनने से पहले की हकीकत बेहद डरावनी थी। मुस्लिम महिलाओं के सिर पर हमेशा एक अदृश्य तलवार लटकी रहती थी। भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन के एक पुराने सर्वे के मुताबिक, करीब बाइस प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं को यह भी पता नहीं होता था कि उनके शौहर ने उन्हें कब तलाक दे दिया। कोई फोन पर, कोई व्हाट्सएप मैसेज पर, तो कोई मामूली गुस्से में आकर तीन बार ‘तलाक’ बोलकर सालों पुराना रिश्ता पल भर में तोड़ देता था। इसके बाद महिलाओं को बेसहारा छोड़ दिया जाता था और उनके पास न्याय मांगने का कोई रास्ता नहीं था। सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि जब सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया, उसके बाद भी समाज में यह कुप्रथा रुकी नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2017 में जब इस प्रथा को बैन किया, तो उसके पास दोषियों को सजा देने का कोई अधिकार नहीं था क्योंकि इसके लिए कोई लिखित कानून नहीं बना था। इसी वजह से अगस्त 2017 से लेकर दिसंबर 2017 के बीच केवल 4 महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से तीन तलाक के 100 से ज्यादा नए मामले सामने आ गए। इसी बढ़ती संख्या को देखकर सरकार दिसंबर 2017 में संसद में सख्त सजा वाला कानून लेकर आई। तब सरकार ने कहा कि जब तक इस पर सख्त सजा का प्रावधान नहीं होगा, तब तक समाज का यह डर खत्म नहीं होगा। इसी के परिणामस्वरूप इस ऐतिहासिक कानून को मंजूरी मिली।

सख्त कानून बनने के बाद ज़मीनी आंकड़े पूरी तरह बदल गए। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, इस कानून के आने के बाद देश भर में तीन तलाक के मामलों में बयासी प्रतिशत से ज़्यादा की भारी कमी दर्ज की गई है। यह आंकड़ा साफ करता है कि कड़े कानून का समाज में एक गहरा असर हुआ है। पहले जहाँ बिना किसी ठोस वजह के रिश्ता खत्म कर दिया जाता था, वहाँ अब पुरुषों के मन में तीन साल जेल की सजा का डर बैठा है। महिलाओं को अब यह कानूनी भरोसा मिला है कि उनका घर और उनका आत्मसम्मान किसी की मर्जी का मोहताज नहीं है। वे अब बिना किसी मानसिक खौफ के सम्मान के साथ जी रही हैं। एक निष्पक्ष नज़र डालें तो इस कानून को लेकर समाज में दो अलग-अलग तरह के विचार चलते हैं। कानून के समर्थकों का कहना है कि यह सामाजिक बराबरी और लैंगिक न्याय के लिए उठाया गया सबसे बड़ा कदम है। लेकिन इसके आलोचकों का एक व्यावहारिक सवाल यह भी है कि शादी और तलाक सिविल मामले हैं, इसलिए इसमें सीधे जेल की सजा देना पारिवारिक मामलों को और उलझा देता है। उनका तर्क है कि अगर शौहर तीन साल के लिए जेल चला जाएगा, तो वह जेल के भीतर से अपनी पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण के लिए गुज़ारा भत्ता कैसे देगा। इससे कई बार महिला और उसके बच्चों के सामने आर्थिक संकट और गहरा हो जाता है। इन दोनों पक्षों के बीच अगर हम एक निष्पक्ष और सकारात्मक रास्ता तलाशें, तो यह साफ है कि किसी भी रूढ़िवादी सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए कानून का डंडा बेहद ज़रूरी होता है। इतिहास गवाह है कि सती प्रथा, दहेज प्रथा या बाल विवाह जैसी कुप्रथाएं भी केवल समझाने-बुझाने से खत्म नहीं हुईं, उनके लिए भी कड़े कानून बनाने पड़े थे। यह कानून हमारी बेटियों को समाज में बराबरी और गरिमा से जीने का अधिकार देता है, जिसे सिर्फ राजनीति के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।

ज़मीनी हकीकत यह है कि कोई भी सामाजिक सुधार केवल पुलिस और जेल के भरोसे पूरा नहीं हो सकता। असली बदलाव तब माना जाएगा जब कानून के कड़े पहरे के साथ-साथ हमारे समाज की बंद सोच भी बदलेगी। कानून एक सुरक्षा ढाल तो दे सकता है, लेकिन ज़िंदगी चलाने के लिए संबल की ज़रूरत होती है। इसलिए आज सबसे बड़ी आवश्यकता मुस्लिम बेटियों को उच्च शिक्षा और सम्मानजनक रोज़गार से जोड़ने की है। जब तक आधी आबादी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होगी, तब तक उसका वजूद सुरक्षित नहीं हो सकता। जिस दिन बेटियां अपने पैरों पर खड़ी होकर समाज में बराबरी का हक पाएंगी, तो यह कानून अपने मकसद में कामयाब होगा।