अजय कुमार बियानी
आज जब भी किसी प्रतियोगी परीक्षा या बोर्ड परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने की खबर सामने आती है, तो पूरा देश हैरान रह जाता है। ऐसा प्रतीत कराया जाता है मानो यह समस्या अभी-अभी जन्मी हो। वास्तविकता यह है कि प्रश्नपत्र लीक और अनुमानित प्रश्नों का खेल नया नहीं, बल्कि दशकों पुराना है। केवल उसका स्वरूप बदल गया है। पहले यह सीमित था, आज तकनीक ने इसे व्यापक बना दिया है।
अपने छात्र जीवन की स्मृतियाँ आज भी ताज़ा हैं। अभियांत्रिकी महाविद्यालय में अध्ययन के दौरान कई बार हमारे प्राध्यापक स्वयं परीक्षा से पहले महत्वपूर्ण प्रश्नों की सूची बता देते थे। वे कहते थे—”इन प्रश्नों को अच्छी तरह तैयार कर लो, परीक्षा में इन्हीं में से अधिकांश प्रश्न आएंगे।” विद्यार्थी भी उसी दिशा में तैयारी करते थे। परिणामस्वरूप पढ़ाई का उद्देश्य ज्ञान अर्जित करना नहीं, बल्कि परीक्षा पास करना बन जाता था।
इससे भी पहले, जब हम आठवीं-नौवीं कक्षा में पढ़ते थे, तब इंदौर की गलियों में एक अलग ही दृश्य दिखाई देता था। शाम ढलते ही रेवड़ी और गजक बेचने वाले ठेलों पर बीस पैसे में “अनुमानित प्रश्न” की छोटी-सी पुस्तिका मिलने लगती थी। विद्यार्थी बड़ी उत्सुकता से उसे खरीदते थे।
विश्वास यही रहता था कि यदि इनमें से कुछ प्रश्न याद कर लिए जाएँ तो परीक्षा सरल हो जाएगी। यह एक खुला रहस्य था, जिसे सभी जानते थे और सहज रूप से स्वीकार भी करते थे।
उस समय इन पुस्तिकाओं को परीक्षा की तैयारी का सहायक माना जाता था। इनमें कई बार ऐसे प्रश्न होते थे जो वास्तव में परीक्षा में पूछे जाते थे। इससे यह धारणा बनती गई कि पूरे पाठ्यक्रम को समझने की आवश्यकता नहीं, केवल संभावित प्रश्न याद कर लेना ही पर्याप्त है। धीरे-धीरे अध्ययन की संस्कृति की जगह “महत्वपूर्ण प्रश्नों” की संस्कृति विकसित होने लगी।
आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं। मुद्रित पुस्तिकाओं की जगह सामाजिक माध्यम, संदेश समूह और विभिन्न डिजिटल माध्यमों ने ले ली है। पहले बीस पैसे की पुस्तिका थी, आज कुछ ही क्षणों में हजारों लोगों तक संदेश पहुँच जाता है। अंतर केवल गति का है, मानसिकता का नहीं। यदि शिक्षा व्यवस्था केवल परीक्षा केंद्रित रहेगी, तो अनुमानित प्रश्नों और प्रश्नपत्र लीक जैसी प्रवृत्तियाँ किसी न किसी रूप में जीवित रहेंगी।
यह भी स्वीकार करना होगा कि अनुमानित प्रश्न और प्रश्नपत्र लीक एक जैसी बातें नहीं हैं। अनुमानित प्रश्न अनुभव और विश्लेषण पर आधारित हो सकते हैं, जबकि प्रश्नपत्र लीक सीधे-सीधे परीक्षा की गोपनीयता और ईमानदारी पर आघात है। दोनों के बीच स्पष्ट अंतर है, लेकिन दोनों की जड़ में परीक्षा को केवल अंक प्राप्त करने का माध्यम मानने की सोच अवश्य दिखाई देती है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थियों में जिज्ञासा, तर्कशक्ति और विषय की समझ विकसित कर रही है, या केवल परीक्षा पास करने की तैयारी करा रही है? यदि लक्ष्य केवल अंक होंगे, तो शॉर्टकट खोजने वालों की कमी कभी नहीं होगी। लेकिन यदि शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान, कौशल और चरित्र निर्माण होगा, तो अनुमानित प्रश्नों का आकर्षण स्वतः कम हो जाएगा।
समय आ गया है कि परीक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और विश्लेषणात्मक बनाया जाए। रटने की प्रवृत्ति के स्थान पर समझ आधारित मूल्यांकन को बढ़ावा मिले। साथ ही विद्यार्थियों को भी यह समझना होगा कि जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा किसी प्रश्नपत्र से नहीं, बल्कि वास्तविक परिस्थितियों से होती है। वहाँ न अनुमानित प्रश्न मिलते हैं और न ही कोई प्रश्नपत्र पहले से उपलब्ध होता है।
शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य उत्तर याद करना नहीं, बल्कि प्रश्नों को समझने और जीवन की चुनौतियों का समाधान खोजने की क्षमता विकसित करना है। यही वह परिवर्तन है, जो शिक्षा को परीक्षा की सीमाओं से निकालकर जीवन की दिशा बना सकता है।





