एथेनॉल का अधूरा हिसाब: ऊर्जा सुरक्षा की कीमत कौन चुका रहा है?

The Incomplete Ethanol Ledger: Who Is Paying the Price for Energy Security?

“ऊर्जा आत्मनिर्भरता का स्वागत होना चाहिए, लेकिन यदि उसकी सफलता की बैलेंस शीट में करदाता, किसान, भूजल और खाद्य सुरक्षा के खर्च अदृश्य छोड़ दिए जाएँ, तो वह उपलब्धि नहीं, अधूरा लेखा-जोखा बन जाती है : डॉ राजाराम त्रिपाठी”

डॉ राजाराम त्रिपाठी

  • भारत ने निर्धारित समय से पाँच वर्ष पहले ही 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य प्राप्त कर लिया। सरकार के अनुसार इससे लगभग ₹1.67 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा बची,
  • एथेनॉल के कच्चे माल गन्ना मक्का, चावल के किसानों को ₹1.45 लाख करोड़ से अधिक का भुगतान हुआ तथा विदेशी ईंधन आयात पर निर्भरता भी घटी।
  • किंतु क्या इस उपलब्धि की लागत में उर्वरक सब्सिडी, सिंचाई, कृषि बिजली, रियायती ऋण, डिस्टिलरी को ब्याज सहायता, एफसीआई के रियायती चावल तथा पर्यावरणीय लागत भी जोड़ी गई है?
  • ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा, दोनों राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न हैं। किसी एक की सफलता दूसरे की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।
  • किसी भी नीति का मूल्यांकन केवल शुद्ध लाभ ‘Gross Benefit’ से नहीं, बल्कि कुल वास्तविक राष्ट्रीय हित लाभ ‘Net National Benefit’ से होना चाहिए।

भारत की एथेनॉल नीति इन दिनों राष्ट्रीय विमर्श का विषय है बन गया है। मेरा कुछ ही दिनों के भीतर इसी मूल विषय पर यह दूसरा लेख है किन्तु पिछले लेख से यह पूरी तरह से अलग है। ऐसा सामान्यतः नहीं होता किन्तु कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन पर मौन रहना भी सार्वजनिक उत्तरदायित्व से पलायन माना जाना चाहिए। इस लेख में हम एथेनॉल के उपयोग से वाहनों के इंजन में खराबी आने की अंतहीन चर्चा पर बहस नहीं करेंगे। क्योंकि इस विषय पर पहले ही काफी चर्चा हो चुकी है, पक्ष विपक्ष दोनों ओर से तर्क कुतर्क अभी भी जारी हैं। इस मुद्दे पर समुचित तकनीकी जांच, दीर्घकालिक प्रायोगिक परीक्षण तथा उसके परिणाम आने अभी शेष हैं। इसलिए यह विषय इन समस्त तथ्यों , दावों प्रतिदावों की निष्पक्ष जांच पड़ताल करते हुए एक पृथक लेख की मांग करता है।

दुर्भाग्य यह भी है कि आज एथेनॉल पर बहस तथ्यों से कम और राजनीतिक पूर्वाग्रहों से अधिक संचालित हो रही है। एक पक्ष इसे किसानों की समृद्धि का अंतिम अचूक अस्त्र घोषित कर चुका है, जबकि दूसरा इसे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का नया अभूतपूर्व संकट सिद्ध करने में लगा है। दोनों पक्षों के बीच सबसे बड़ी अनुपस्थित वस्तु है सही सटीक इमानदार आर्थिक लेखा-जोखा।
मैं प्रारंभ में ही स्पष्ट कर दूँ कि यह लेख न तो एथेनॉल के विरोध में है और न किसी सरकार के पक्ष या विपक्ष में। भारत जैसे देश में ऊर्जा नीति या खाद्य नको चुनावी चश्मे से देखना राष्ट्रीय भूल होगी। यह करोड़ों किसान परिवारों की आजीविका, विश्व की सबसे बड़ी आबादी की खाद्य सुरक्षा, सीमित जल संसाधनों, करदाताओं की गाढ़ी कमाई और भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता से जुड़ा विषय है। इसलिए इस पर नारे नहीं, निष्पक्ष राष्ट्रीय विमर्श होना चाहिए।

इसमें कोई विवाद नहीं कि भारत ने एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम में उल्लेखनीय प्रगति की है। एक दशक पहले जहाँ पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण लगभग नगण्य था, वहीं आज भारत लगभग 20 प्रतिशत मिश्रण तक पहुँच चुका है। सरकार का दावा है कि इससे लगभग ₹1.67 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा बची, किसानों को ₹1.45 लाख करोड़ से अधिक का अतिरिक्त भुगतान हुआ, तेल आयात पर निर्भरता घटी और कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता मिली। इन उपलब्धियों का स्वागत होना ही चाहिए।

किन्तु यहीं से एक ऐसा प्रश्न जन्म लेता है जिसे शायद अब तक सबसे कम पूछा गया है।

क्या किसी भी राष्ट्रीय नीति का मूल्यांकन केवल उसकी बचत से किया जा सकता है, या उसकी वास्तविक लागत भी जोड़ी जानी चाहिए?
यही इस पूरे लेख का मूल प्रश्न है।

आज सरकार हमें बताती है कि एक लीटर एथेनॉल किस कीमत पर मिलेगा। लेकिन क्या कभी यह भी बताया गया कि उस एक लीटर एथेनॉल के पीछे करदाता पहले ही कितनी दृश्य व अदृश्य सब्सिडियाँ का बिल टैक्स के जरिए चुका चुका है?

अर्थशास्त्र का पहला सिद्धांत कहता है कि किसी भी उत्पाद की लागत केवल फैक्ट्री के गेट पर शुरू नहीं होती। उसकी शुरुआत कच्चे माल के मूल स्रोत (Source of origin) यान इथेनॉल के मामले में यह खेत से शुरू होती है।

यदि एथेनॉल मक्का, गन्ने और चावल से बनता है, तो उन फसलों की खेती पर मिलने वाली उर्वरक सब्सिडी, सिंचाई पर सार्वजनिक निवेश, कृषि बिजली, रियायती ऋण, न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था, डिस्टिलरी को ब्याज सहायता, MSME ल अन्य अनुदान, एफसीआई से रियायती दर पर उपलब्ध कराए गए खाद्यान्न, परिवहन, भंडारण तथा इथेनॉल बनाने वाली डिस्टलरी के उत्सर्जन का पर्यावरणीय दायित्व, ये सब अंततः उसी एथेनॉल की वास्तविक लागत का हिस्सा हैं। इसके अलावा यदि एथेनॉल के इस्तेमाल से वाहनों के इंजन का कोई दीर्घकालिक नुकसान हो रहा है, जैसा कि उपभोक्ताओं की शिकायत आ रही है तो यह देश के वाहन मालिकों का बहुत ही बड़ा नुकसान होगा। हालांकि अभी यह पूरी तरह से तकनीकी आधार पर सिद्ध नहीं हुआ है, इसलिए हम इसी से पर ज्यादा चर्चा यहां नहीं करेंगे। बहरहाल यदि इन सबको लागत से बाहर रखा जाए तो उपलब्धि का लेखा-जोखा अधूरा रह जाएगा।

भारत में एक विचित्र परंपरा विकसित हो गई है। उपलब्धियाँ ढोल ताशे बजाकर प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाई, सुनाई जाती हैं, खर्चीले आयोजन करके उपलब्धियों का निरंतर शंखनाद किया जाता है और असल लागत के आंकड़े बजट के फुटनोट में चुपचाप छिपा दिए जाते हैं।
लोकतंत्र में यह परंपरा अधिक दिनों तक नहीं चल सकती।

क्योंकि करदाता केवल यह जानना नहीं चाहता कि सरकार ने कितना बचाया।

वह यह भी जानना चाहता है कि उस बचत की वास्तविक कीमत किसने चुकाई। असल में वास्तविक प्रश्न यहीं से प्रारम्भ होता है।

यदि मक्का, गन्ना और चावल एथेनॉल का कच्चा माल हैं, तो उनकी लागत का हिसाब केवल किसान के खेत तक सीमित नहीं रह सकता। उस खेत तक पहुँचने वाली प्रत्येक सरकारी सहायता भी उसी ईंधन की लागत का हिस्सा है।

उदाहरण के लिए, वर्ष 2025-26 में केंद्र सरकार का उर्वरक सब्सिडी व्यय लगभग ₹1.67 लाख करोड़ रहा। कृषि को अधिकांश राज्यों में रियायती अथवा निःशुल्क बिजली मिलती है। सिंचाई परियोजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये सार्वजनिक धन खर्च होता है। किसानों को ब्याज अनुदान के साथ सस्ता कृषि ऋण उपलब्ध कराया जाता है। दूसरी ओर एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए डिस्टिलरी स्थापित करने हेतु भी सरकार ब्याज सहायता और रियायती वित्त उपलब्ध करा रही है। खाद्यान्न आधारित एथेनॉल के लिए विभिन्न अवधियों में भारतीय खाद्य निगम (FCI) का चावल भी रियायती दरों पर उपलब्ध कराया गया। इन सबका भुगतान कौन करता है? अंततः वही भारतीय करदाता, जिसके नाम पर ऊर्जा आत्मनिर्भरता का उत्सव मनाया जा रहा है।

इसका सीधा मतलब यह है कि यदि इन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सब्सिडियों का समुचित आर्थिक मूल्यांकन किया जाए, तो एथेनॉल की वास्तविक लागत सरकारी खरीद मूल्य से काफी अधिक दिखाई दे सकती है। यह अत्यंत गंभीर सवाल है और इसे अनसुना अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।

अर्थशास्त्र में एक सिद्धांत है, “There is no free lunch.” अर्थात कोई भी उपलब्धि बिना कीमत चुकाए नहीं मिलती। प्रश्न केवल इतना है कि वह कीमत कौन चुका रहा है और क्या उसका पूरा हिसाब सार्वजनिक है?

एथेनॉल की चर्चा में पानी का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भारत पहले ही विश्व के सर्वाधिक जल-संकटग्रस्त देशों में गिना जाने लगा है। गन्ना कुल कृषि क्षेत्र का छोटा हिस्सा घेरता है, लेकिन सिंचाई जल का अनुपातहीन उपयोग करता है। यदि भविष्य में एथेनॉल उत्पादन का बड़ा आधार गन्ना और सिंचित मक्का ही बने रहे, तो ऊर्जा सुरक्षा और जल सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा? इस प्रश्न का उत्तर भी नीति के साथ-साथ आना चाहिए।

इसके साथ ही एक और विषय प्रायः चर्चा से बाहर रहता है। एथेनॉल संयंत्रों से निकलने वाले अपशिष्ट, ‘स्पेंट वॉश’ के वैज्ञानिक प्रबंधन, भूजल संरक्षण तथा प्रदूषण नियंत्रण की वास्तविक लागत क्या है? यदि किसी उद्योग के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों का भार अंततः समाज वहन करता है, तो उस लागत को भी आर्थिक विश्लेषण का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। केवल कार्बन उत्सर्जन में संभावित कमी गिनना पर्याप्त नहीं है; कार्बन बचत के साथ पर्यावरणीय व्यय का संतुलित मूल्यांकन भी आवश्यक है।

अब आइए किसान के सबसे बड़े प्रश्न पर।

एथेनॉल की बहस का सबसे महत्वपूर्ण, किंतु सबसे अधिक उपेक्षित पक्ष किसान, खाद्य सुरक्षा और MSP का भविष्य है। सरकार का कहना है कि एथेनॉल कार्यक्रम ने किसानों को अतिरिक्त बाज़ार दिया है, गन्ना किसानों के भुगतान में सुधार हुआ है और मक्का की माँग बढ़ी है। यदि किसान को बेहतर मूल्य मिलता है तो उसका स्वागत होना ही चाहिए। लेकिन एक कृषि अर्थशास्त्री के रूप में मेरा प्रश्न आज से अधिक कल को लेकर है। यदि भविष्य में मक्का, गन्ना और चावल के सबसे बड़े खरीदार सरकारी एजेंसियों के बजाय एथेनॉल उद्योग बन गए, तो मूल्य का निर्धारण संसद करेगी या बाजार? यदि उद्योग MSP से अधिक देगा तो सरकारी खरीद कमजोर पड़ेगी, और यदि सरकार MSP बढ़ाएगी तो एथेनॉल की लागत बढ़ेगी। यह केवल मूल्य का नहीं, भारत की भावी कृषि नीति का प्रश्न है। फिर यदि किसी वर्ष सूखा पड़ जाए और खाद्यान्न तथा ईंधन में से किसी एक को प्राथमिकता देनी पड़े, तो पहले अधिकार भारत की जनता की थाली का होगा या गाड़ियों के टैंक का? अमेरिका और ब्राज़ील जैसे देशों ने इस चुनौती का उत्तर केवल एथेनॉल बढ़ाकर नहीं, बल्कि अनुसंधान, जल प्रबंधन, उत्पादकता वृद्धि और दूसरी पीढ़ी (2G) के जैव-ईंधनों में बड़े निवेश से दिया। भारत को भी समय रहते खाद्य फसलों को ईंधन की होड़ में उतारने के बजाय कृषि अवशेष, बाँस और अन्य गैर-खाद्य जैव संसाधनों पर अधिक बल देना होगा। कहीं ऐसा न हो कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता की जल्दबाज़ी में हम अनजाने में अपनी खाद्य आत्मनिर्भरता की नींव ही कमजोर कर बैठें।

इसलिए यह बहस “एथेनॉल बनाम पेट्रोल” की नहीं है। यह बहस “ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा और आर्थिक पारदर्शिता” के बीच संतुलन की है।

यहां मैं एक बात पूरे दायित्व के साथ कहना चाहता हूँ कि एथेनॉल के मामले में सबसे बड़ी भूल यह नहीं होगी कि हमने उसे अपनाया बल्कि सबसे बड़ी भूल यह होगी कि हम उसे ही अंतिम सत्य मान लें।

दुनिया का ऊर्जा विज्ञान प्रतिदिन बदल रहा है। आज एथेनॉल है, कल हरित हाइड्रोजन हो सकता है, परसों किसी नई जैव-प्रौद्योगिकी का ईंधन। इसलिए किसी एक विकल्प को अर्थ नीति का मूलाधार बना देना अनर्थ होगा, यह दूरदर्शिता नहीं, जड़ता होगी।

सरकार का यह तर्क निश्चित रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए कि एथेनॉल कार्यक्रम ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बल दिया है। विदेशी मुद्रा बचाने, किसानों को अतिरिक्त बाज़ार उपलब्ध कराने और पेट्रोल में जैव-ईंधन की हिस्सेदारी बढ़ाने में इसकी सकारात्मक भूमिका रही है। यह भी सत्य है कि श्री नितिन गडकरी ने वैकल्पिक ईंधनों को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया। उपलब्धियों को स्वीकार करना बौद्धिक ईमानदारी है।
किन्तु लोकतंत्र में कोई भी उपलब्धि कभी भी प्रजा के प्रश्नों से ऊपर नहीं होती।

यदि सरकार यह कहती है कि एथेनॉल से देश ने लगभग ₹1.67 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा बचाई है, तो उसे उतनी ही पारदर्शिता से यह भी बताना चाहिए कि उसी अवधि में उर्वरक सब्सिडी, कृषि बिजली, सिंचाई, ब्याज सहायता, डिस्टिलरी प्रोत्साहन, FCI से रियायती खाद्यान्न, जल संसाधनों के उपयोग और पर्यावरणीय दायित्वों के रूप में कुल सार्वजनिक व्यय कितना हुआ। केवल बचत बताना पर्याप्त नहीं है; शुद्ध राष्ट्रीय लाभ (Net National Benefit) बताना भी उतना ही आवश्यक है।

मुझे आश्चर्य इस बात का नहीं कि सरकार अपनी उपलब्धियाँ गिनाती है। हर सरकार ऐसा करती है। आश्चर्य इस बात का है कि हमारे यहाँ नीति का मूल्यांकन भी अक्सर सरकारी विज्ञापन की भाषा में होने लगता है। उपलब्धियों की प्रेस विज्ञप्तियाँ तो पन्नों पर छप जाती हैं, लेकिन उनकी लागत अक्सर बजट के परिशिष्टों में छिपी रह जाती है।

भारत जैसे लोकतंत्र में नीति की सबसे बड़ी मित्र प्रशंसा नहीं, बल्कि पारदर्शी समीक्षा होती है।

एक प्रश्न और है, जो शायद सबसे कठिन है।

यदि किसी वर्ष सूखा पड़ जाए, मक्का और चावल का उत्पादन घट जाए, तो प्राथमिकता किसे मिलेगी? भारत की जनता की थाली को या भारत की गाड़ियों के टैंक को? यह प्रश्न आज काल्पनिक लग सकता है, लेकिन दूरदर्शी नीतियाँ भविष्य के प्रश्नों का उत्तर पहले से तैयार रखती हैं।

इसलिए अब समय आ गया है कि भारत प्रथम पीढ़ी (1G) एथेनॉल से आगे बढ़कर दूसरी पीढ़ी (2G) और तीसरी पीढ़ी के जैव-ईंधनों, कृषि अवशेषों, बांस, गैर-खाद्य बायोमास और अन्य वैकल्पिक स्रोतों पर कहीं अधिक निवेश करे। इससे ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी और खाद्य सुरक्षा पर अनावश्यक दबाव भी नहीं पड़ेगा।

अंत में मेरा आग्रह केवल इतना है कि भारत सरकार एथेनॉल कार्यक्रम पर एक राष्ट्रीय लागत-लाभ श्वेतपत्र (National Cost-Benefit White Paper) जारी करे। उसमें केवल विदेशी मुद्रा बचत ही नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सब्सिडियाँ, जल उपयोग, पर्यावरणीय लागत, MSP पर संभावित प्रभाव, खाद्य सुरक्षा तथा किसानों की वास्तविक आय का स्वतंत्र आर्थिक मूल्यांकन भी सम्मिलित किया जाए।

क्योंकि राष्ट्र केवल यह जानने का अधिकारी नहीं है कि “हमने कितना बचाया?”

राष्ट्र यह जानने का भी अधिकारी है कि “उस बचत की वास्तविक कीमत कितनी और किसने चुकाई?”

और अंततः यही किसी लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान है कि वहाँ नीतियाँ तालियों से नहीं, तथ्यों से मजबूत होती हैं; प्रचार से नहीं, पारदर्शिता से विश्वसनीय बनती हैं।

भारत को एथेनॉल अवश्य चाहिए, लेकिन उससे भी अधिक चाहिए पूरा हिसाब।

क्योंकि ऊर्जा आत्मनिर्भरता तभी स्थायी होगी, जब उसके साथ आर्थिक ईमानदारी, खाद्य सुरक्षा, किसान का विश्वास और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व भी समान गति से आगे बढ़ें। अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि हम पेट्रोलियम आयात का बिल तो कम कर दें, लेकिन उसकी कीमत भविष्य की पीढ़ियाँ जल, खाद्य संकट और कर के रूप में चुकाएँ।

“राष्ट्र का भविष्य किसी एक ईंधन से तय नहीं होगा। वह इस बात से तय होगा कि नीति बनाते समय सरकार ने जनता को भागीदार बनाया या केवल उपभोक्ता। लोकतंत्र में सबसे अच्छा व सस्ता ईंधन भी वही होगा, जिसका पूरा हिसाब जनता से छिपाना न पड़े।”