काला धन का साम्राज्य और बेबस होती एजेंसियां

The Empire of Black Money and Helpless Agencies

महेन्द्र तिवारी

काला धन आज केवल किसी व्यक्ति, संस्था या देश की समस्या नहीं रह गया है। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी उन सबसे गंभीर चुनौतियों में शामिल हो चुका है, जिनसे निपटना किसी एक सरकार या जांच संस्था के लिए संभव नहीं है। भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कैम्ब्रिज में आयोजित 43वें अंतरराष्ट्रीय आर्थिक अपराध सम्मेलन के समापन सत्र में इस समस्या की भयावहता को जिस उदाहरण के माध्यम से सामने रखा, वह पूरी दुनिया की आर्थिक और कानूनी व्यवस्था को आईना दिखाता है। उन्होंने कहा कि यदि धन शोधन के वैश्विक अनुमानों को मोटे तौर पर भी सही माना जाए तो एक वर्ष में अवैध रूप से प्रवाहित होने वाला धन इतना है कि उससे दुनिया के 8 अरब लोगों में से प्रत्येक के लिए एक साधारण संगणक खरीदा जा सकता है। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि इस विशाल अवैध संपदा का 1 प्रतिशत से भी कम हिस्सा वापस प्राप्त हो पाता है।

इस आंकड़े का अर्थ केवल इतना नहीं है कि अपराधियों ने बहुत बड़ी मात्रा में धन अर्जित कर लिया है। इसका सबसे गंभीर पक्ष यह है कि आधुनिक कानून व्यवस्था अपराध से पैदा हुई संपत्ति का पीछा करने में उतनी सफल नहीं है, जितनी तेजी से अपराधी उस संपत्ति को छिपाने और स्थानांतरित करने में सफल हो रहे हैं। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने इसी अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि प्रत्येक 100 हिस्सों में से 99 हिस्से केवल भाषणों और रिपोर्टों में रह जाते हैं, जबकि लगभग 1 हिस्सा ही वास्तव में वापस आ पाता है।

धन शोधन का संसार अत्यंत जटिल है। भ्रष्टाचार, रिश्वत, तस्करी, धोखाधड़ी, संगठित अपराध, कर चोरी और दूसरे गैरकानूनी कार्यों से अर्जित धन को अनेक स्तरों पर घुमाया जाता है। अपराधी ऐसे माध्यमों का सहारा लेते हैं जिनसे धन का वास्तविक स्रोत और वास्तविक स्वामी छिप जाता है। कभी यह धन अनेक खातों के माध्यम से घूमता है, कभी अलग-अलग संस्थाओं और संपत्तियों में लगाया जाता है और कभी देश की सीमा पार कर दूसरे देशों में पहुंच जाता है। जब तक जांच एजेंसी मूल धन के स्रोत तक पहुंचती है, तब तक धन का स्वरूप और उसका स्थान दोनों बदल चुके होते हैं।

आज की तकनीक ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। जिस तकनीकी विकास ने व्यापार, बैंकिंग और संचार को गति दी है, उसी ने आर्थिक अपराधियों को भी असाधारण सुविधा प्रदान की है। कुछ ही क्षणों में धन एक खाते से दूसरे खाते और एक देश से दूसरे देश में पहुंच सकता है। आभासी माध्यमों से होने वाली ठगी इसका नया उदाहरण है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने तथाकथित आभासी गिरफ्तारी जैसी धोखाधड़ी का भी उल्लेख किया, जिसमें अपराधी पुलिस, न्यायिक अधिकारी या सरकारी अधिकारी बनकर लोगों को भयभीत करते हैं और उनकी मेहनत की कमाई हड़प लेते हैं।

आर्थिक अपराध की विशेषता यह है कि इसमें अपराध का प्रमाण अक्सर किसी घटनास्थल पर नहीं मिलता। हत्या या डकैती जैसे अपराधों में घटनास्थल, हथियार या प्रत्यक्षदर्शी महत्वपूर्ण प्रमाण बन सकते हैं, लेकिन धन शोधन में अपराध का रास्ता कागज, खाते, संस्थाओं, संपत्तियों और सीमाओं के बीच छिपा रहता है। अपराधी जानता है कि यदि धन को पर्याप्त स्तरों पर घुमा दिया जाए तो जांचकर्ता के लिए उसके मूल स्रोत तक पहुंचना कठिन हो जाएगा। इसलिए आर्थिक अपराध के विरुद्ध लड़ाई में केवल अपराधी को गिरफ्तार करना पर्याप्त नहीं है। उसके धन के स्रोत, रास्ते, स्वामित्व और अंतिम ठिकाने तक पहुंचना भी उतना ही आवश्यक है।

यही कारण है कि न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने आर्थिक अपराध के विरुद्ध सफलता का पैमाना केवल अपराध के बारे में जानकारी जुटाने को नहीं, बल्कि अपराध से अर्जित संपत्ति का पता लगाने, उसे रोकने और वापस प्राप्त करने को माना। उनका संदेश स्पष्ट है कि यदि अपराधी जेल पहुंच भी जाए लेकिन उसकी अवैध संपत्ति सुरक्षित रह जाए तो आर्थिक अपराध के विरुद्ध लड़ाई अधूरी है। अपराध से होने वाले लाभ को समाप्त करना ही इस संघर्ष का मूल उद्देश्य होना चाहिए।

इस संदर्भ में भारतीय चिंतक कौटिल्य का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है। लगभग 2000 वर्ष पहले रचित अर्थशास्त्र में उन्होंने राजस्व की चोरी और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के विभिन्न तरीकों की पहचान की थी। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने बताया कि कौटिल्य ने अधिकारियों द्वारा राजस्व के दुरुपयोग के 40 तरीकों का उल्लेख किया और उसके मुकाबले लेखा परीक्षण, गुप्त सूचना, परस्पर सत्यापन तथा अवैध संपत्ति की जब्ती जैसे उपाय सुझाए थे। अर्थात आर्थिक अपराध की समस्या नई नहीं है। नया केवल उसका स्वरूप, उसका विस्तार और उसकी गति है।

भारत ने आर्थिक अपराध से निपटने के लिए पिछले वर्षों में कई महत्वपूर्ण कानूनी और संस्थागत उपाय किए हैं। धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 और भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018 इसी व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इनके साथ विभिन्न जांच संस्थाएं और विशेष न्यायालय भी काम करते हैं। इनका उद्देश्य अपराध से अर्जित संपत्ति का पता लगाना, उसे कुर्क करना और कानून के अनुसार उसे जब्त करना है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने भी भारत की व्यवस्था को कानून, संस्थाओं और न्यायिक सिद्धांतों की कई परतों से बनी संरचना बताया।

लेकिन कानून बनाना और कानून को प्रभावी ढंग से लागू करना दो अलग बातें हैं। आर्थिक अपराधी अक्सर देश की सीमाओं से बाहर निकल जाते हैं और संपत्ति भी दूसरे देशों में पहुंचा देते हैं। ऐसे मामलों में किसी एक देश की जांच संस्था की शक्ति सीमित हो जाती है। उसे दूसरे देश की सरकार, न्याय व्यवस्था और वित्तीय संस्थाओं के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने भी सीमा पार आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए पारस्परिक कानूनी सहायता, वित्तीय सूचना के आदान प्रदान और संपत्ति के वास्तविक स्वामियों की पहचान करने वाली व्यवस्थाओं को मजबूत करने पर जोर दिया।

यहीं से वैश्विक व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है। अपराधी धन को अंतरराष्ट्रीय बना चुका है, लेकिन कानून अब भी बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय सीमाओं में बंधा हुआ है। एक देश में अपराध से अर्जित धन दूसरे देश में पहुंचते ही अलग कानूनी व्यवस्था के अधीन हो जाता है। अपराधी इसी अंतर का लाभ उठाता है। प्रत्यर्पण में वर्षों लग सकते हैं और विदेशों में मौजूद संपत्ति की जब्ती भी लंबी कानूनी प्रक्रिया में उलझ सकती है। इसीलिए आर्थिक अपराध के विरुद्ध प्रभावी लड़ाई के लिए देशों के बीच केवल समझौते पर्याप्त नहीं हैं। उन समझौतों पर तेजी से अमल भी आवश्यक है।

इस समस्या का सामाजिक प्रभाव भी कम गंभीर नहीं है। जब आम नागरिक देखता है कि ईमानदारी से अर्जित धन पर कर और नियमों का पूरा बोझ है, जबकि अवैध धन रखने वाला व्यक्ति वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया से बचता रहता है, तो व्यवस्था के प्रति उसका विश्वास कमजोर होता है। इससे केवल आर्थिक असमानता नहीं बढ़ती, बल्कि कानून के प्रति सम्मान भी घटता है। काला धन संपत्ति बाजार, व्यापार और राजनीतिक प्रक्रिया तक को प्रभावित कर सकता है। जब अवैध संपत्ति का उपयोग वैध अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा करने के लिए होता है तो ईमानदार व्यक्ति पीछे छूट जाता है।

इसलिए काले धन के विरुद्ध संघर्ष को केवल राजस्व की चोरी रोकने का अभियान समझना भूल होगी। यह न्याय, समानता, लोकतंत्र और नागरिक विश्वास की रक्षा का प्रश्न भी है। जिस धन का निर्माण अपराध से हुआ है, उसे अपराधी के पास सुरक्षित रहने देना अंततः अपराध को लाभ पहुंचाना है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत का संदेश इसी मूल सिद्धांत पर आधारित है कि आर्थिक अपराध से लड़ाई का अंतिम उद्देश्य अपराधी को केवल दंडित करना नहीं, बल्कि अपराध से होने वाले आर्थिक लाभ को समाप्त करना होना चाहिए।

अब आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है जिसमें धन के संदिग्ध प्रवाह का पता बहुत पहले चल सके। वित्तीय सूचनाओं का त्वरित आदान प्रदान हो, वास्तविक स्वामियों की पहचान स्पष्ट हो, संदिग्ध संपत्तियों को समय रहते रोका जा सके और न्यायिक आदेशों के बाद संपत्ति की वापसी में अनावश्यक विलंब न हो। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि कठोर कानूनों के नाम पर नागरिकों के मूल अधिकारों की अनदेखी न हो। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने स्वयं विधि के शासन और उचित कानूनी प्रक्रिया की आवश्यकता पर जोर दिया है।

कौटिल्य के समय से लेकर आज के अंकीय युग तक आर्थिक अपराध का मूल उद्देश्य नहीं बदला है। अपराधी तब भी राज्य के धन पर नजर रखता था और आज भी रखता है। अंतर केवल इतना है कि उस समय धन की चोरी सीमित दूरी और सीमित साधनों से होती थी, जबकि आज अवैध संपत्ति कुछ ही क्षणों में महाद्वीपों के पार जा सकती है। इसलिए अब कानून की गति भी उसी स्तर तक पहुंचानी होगी। यदि अपराधी सीमाहीन हो गया है तो जांच और न्याय का सहयोग भी सीमाहीन होना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश का कैम्ब्रिज संदेश वास्तव में पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है। काले धन का साम्राज्य केवल धन का साम्राज्य नहीं है, बल्कि वह उस व्यवस्था को कमजोर करता है जिस पर आधुनिक समाज का विश्वास टिका है। जब 100 में से 99 हिस्से की अवैध संपत्ति कानून की पकड़ से बाहर रह जाती है, तो यह केवल अपराधियों की सफलता नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के सामने खड़ी चुनौती है। अब समय भाषणों और रिपोर्टों से आगे बढ़कर धन की वास्तविक वापसी का है। अपराधी को यह संदेश मिलना चाहिए कि सीमा, तकनीक, गुप्त खाते या जटिल वित्तीय संरचना उसे कानून से स्थायी सुरक्षा नहीं दे सकती। तभी काले धन के साम्राज्य को वास्तव में कमजोर किया जा सकेगा।