नरेंद्र तिवारी
मुंबई भारत की आर्थिक राजधानी के साथ अरब सागर के किनारे स्थित देश का प्रमुख शहर है। बरसो से मुंबई के बारे में तरह-तरह के विचार और बातें लिखी गयी। फ़िल्मी गीतों के माध्यम से बॉम्बे, बंबई और मुंबई को समझाया गया। जो मुंबई आ नहीं बाते उन्हें गीतों से मुंबई को समझना पड़ता है। यात्रा के दौरान हम अपनी कार में गाना सुन रहे थै। ‘मुंबई शहर हादसों का शहर है, यहाँ रोज-रोज किसी मोड़-मोड़ पर होता है, कोई न कोई हादसा’ यह 1983 की फ़िल्म हादसा का गीत है, 2026 का मुंबई अधिक आधुनिक और चमकदार हो चूका है। मुंबई की हमारी ताजी यात्रा 19 सितम्बर 26 को हुई। रात तीन बजे हम कोस्टल रोड की टनल से गुजरे, यह टनल मरीन ड्राइव को वर्ली से जोड़ती है। इस टनल की लम्बाई 2.07 किमी है। जिसका एक हिस्सा अरब सागर और मलाबार हिल के निचे से गुजरता है। समुद्र के निचे टनल विज्ञान का चमत्कार है। किंतु इसी रात कोस्टल रोड पर एक तेज गति बीएमडब्लू कार कोस्टल रोड पर भयानक रूप से दुर्घटना ग्रस्त हो गयी जिसमे सवार तीन युवाओं को जान से हाथ धोना पड़ा। एक गंभीर रूप से घायल हो गया।
हमारी मुंबई यात्रा का प्रमुख उद्देश्य लालबाग के राजा के दर्शन करना था। जिसे हमने शनिवार दिन को लम्बी, घुमाओदार यात्रा के बाद दो घंटे में अंजाम तक पहुंचा दिया था। लालबाग़चा राजा दर्शन के लिए दिन भर में लाखों की संख्या में देशभर से लोग आते है। यहाँ कार लेकर जाना काफ़ी मशक्कत भरा है। अधिकृत पार्किंग में जगह नहीं मिलने पर अनाधिकृत स्थानों पर अपना वाहन खड़ा करना पड़ता है, जिसमे ट्रैफ़िक पुलिस की कार्यवाही का भय बना रहता है। खैर हमें अनाधिकृत स्थान का सहारा लेना पड़ा। दो घंटे की लाइन में लगकर लालबाग के राजा का वैभव देखकर थकान जाती रही। यहाँ बैठे स्वयं सेवक से लालबाग़ सार्वजनिक गणेश उत्सव मंडल द्वारा विराजित श्री गणेश की महत्ता जानने का प्रयास किया तो उन्होंने बताया। पहली बार 1934 में लालबाग के राजा की स्थापना की गयी थी। जिसके पीछे का मुख्य कारण 1932 में यहाँ स्थित पेरू की चाल बाजार बंद हो जाने के बाद स्थानीय व्यापारियों, मछूआरो ने स्थाई बाजार के लिए भगवान गणेश से मनोकामना की, मन्नत पूरी होने पर आभार व्यक्त किया एवं 1934 में यहाँ लालबाग के राजा की मूर्ति स्थापित की गयी, जो जबसे अब तक 92 सालो से निरंतर क्रम जारी है। समय के साथ लालबाग के राजा सार्वजनिक गणेश उत्सव मंडल द्वारा पांडाल को आकर्षक एवं सोने चांदी की साज सज्जा से चमकदार और आकर्षक रूप प्रदान किया जाता रहा है। मान्यता है, लालबागचा राजा के सामने पवित्र मन से मांगी मन्नत पूर्ण होती है।
मुंबई में गणेश उत्सव का जूनून सवार है, हर कोई गणेश उत्सव की मस्ती में मस्त दिखाई दे रहा था। यहाँ परिवारों द्वारा डेढ़ दिन, तीन दिन, पांच दिन, सात दिन में गणेश जी की प्रतिमा को विसर्जित किये जाने की परम्परा है। गणेश प्रतिमा के विसर्जन का क्रम जारी था। ढ़ोल ताशों के साथ महिला पुरुष धूमधाम से गणनायक के विसर्जन में व्यस्त दिखाई दिए।
हमारी मुंबई यात्रा में रात में मुंबई की चमक दमक देखने की ललक भी शामिल थी। रात की मुंबई का एक स्याहा चेहरा भी दिखाई दिया। स्थानीय रहवासी ने बताया यहाँ हुक्का बार और डांस बार का चलन आम है। पाश्चात संस्कृति से प्रभावित युवक, युवतियाँ देर रात इन क्लबो डांस बार में समय बिताते है। खैर अपना विषय सिर्फ जानना था, वहाँ जाना नहीं। मुंबई की चमचमाती सड़को पर समुद्र पर बने सी लिंक पर रफ़्तार से गुजरते हुए मुंबई की आलिशान ईमारतें जो विधुत तारो सी जगमगा रही थी। इनका फोटो विडिओ बनाने के लिए अपने साइड की खिड़की को खोलकर मोबाइल को हाथ में मजबूती से थामने की आवश्यकता होती है। हर दृश्य को कैमरे में कैद करने का मन करता है। सी लिंक की का निर्माण भी आधुनिक इंजिनियरिंग का कमाल ही जाना चाहिए। देर रात घूमते हुए हमने ताज के सामने स्थित अरब सागर के दर्शन किये जैसा की हमारी संस्कृति में सागर को देवता मानने की परम्परा है तो समुद्र देव को नमन किया। यहाँ गेटवे ऑफ इण्डिया पर कुछ लोग ही थै, बताता गया की गेटवे ऑफ इण्डिया पर नौका विहार बंद होने के कारण रात की अपेक्षा दिन में अधिक जन समूह दिखाई देता है। यहीं गेटवे ऑफ इण्डिया के सामने मुंबई का प्रसिद्ध ताज़ महल प्लेस होटल स्थित है। ताज महल प्लेस की अपनी कहानी है। इसका निर्माण 16 दिसम्बर 1903 में उद्योगपती जमशेदजी टाटा द्वारा करवाया गया था. इसके पीछे यह कहानी प्रचलित है की जमशेदजी टाटा को ब्रिटिश काल में होटल वाटसन में प्रवेश करने से रोक दिया था, क्योंकि उसमे केवल गोरे अंग्रेजो को जाने की अनुमति थी। ताज़ महल प्लेस होटल की शान भी देखते बनती है।
भारत की शान वाह ताज देखते हुए हम मरीन ड्रॉइव पहुँचे यहाँ रात के चार बजे खडे रहने की जगह नहीं थी। इसका कारण यह बताया गया की शनिवार रविवार-अवकाश होना है। एक मुंबई के रहवासी से भीड़ का कारण पूछने पर उसने बताया की मुंबई में लोग सप्ताह में 6 दिन बदन तोड़ मेहनत करते है। शनिवार और रविवार परिवार के साथ बिताते है। अवकाश और गणेश उत्सव दोनों ही मरीन ड्राइव की भीड़ का कारण बताए गए। मरीन ड्राइव पर तीन से चार किमी समुद्र की पाल पर लोगो का जमावड़ा बना हुआ था। यहाँ आसपास खाने पिने की दुकानों पर इतनी भीड़ की नम्बर लगने में आधा घंटे से अधिक समय लग रहा था।
मुंबई बहुत बड़ा है, इसे देखने और समझने में महीनों लग जाते है। 1956 की एक फ़िल्म है, सीआईडी इस फ़िल्म का बहु चर्चित गाना है,’ऐ दिल मुश्किल जीना यहाँ, जरा हट के जरा बच के ये है बॉम्बे मेरी जा। गीत के आगे की कढ़ी कहीं बिल्डिंग कहीं ट्रामें कहीं मोटर कहीं मिल, मिलता है यहाँ सबकुछ इक मिलता नहीं दिल। फ़िल्म का गीत है मुंबई के उस दौर के चित्र को प्रस्तुत कर रहा है। मुंबई को समझने के लिए एक दो दिन नहीं एक दो बरस भी कम है। किंतु गायकों, लेखकों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से मुंबई के जिस चित्र को उकेरा है। लालबाग के राजा के दर्शन के बहाने जैसी मुंबई दिखी बताने की कोशिश की है। भारत का प्रमुख शहर मुंबई फ़िल्म क्लाकारों के बिना अधूरा है जिसका मैंने कोई जिक्र नहीं किया है, अगली मुंबई यात्रा फ़िल्म सिटी और कलाकारों को देखने समझने की कोशिश में लगाने होंगे।





