निर्मल रानी
हमारे देश की वर्तमान सरकार स्वयं को धर्म के अभिरक्षक के रूप में प्रचारित करती है। परन्तु इसे संयोग कहें या प्रयोग कि इसी सरकार के कार्यकाल में ऐसे अनेक क़िस्से सुनाई दे रहे हैं जिन्हें सुनकर देश के भोले भाले आस्थावान लोग स्वयं को ठगा हुआ सा महसूस कर रहे हैं। कहीं चढ़ावे,चंदे व दान की चोरी व लूट हो रही है तो कहीं देसी घी के नाम पर मिलावटी प्रसाद भक्तों को वितरित किया जा रहा है। भगवान् के दरबार में वी आई पी संस्कृति का विरोध तो आम भक्तजन दशकों से करते ही आ रहे हैं। दान,चढ़ावा या चंदे का जो पैसा मंदिर के रखरखाव,श्रद्धालुओं की सुख सुविधा उनके लंगर व खानपान आदि पर ख़र्च होना चाहिए वह पैसे धर्मस्थलों की व्यवस्था में लगे कुछ गिने चुने लोगों द्वारा बंदर बाँट किये जा रहे हैं। इसतरह का सबसे बड़ा मामला जून 2026 में अयोध्या के राम मंदिर में सामने आया जब मंदिर के काउंटिंग रूम में श्रद्धालुओं द्वारा भेंट किये गए चढ़ावे और नक़दी की सुनियोजित तरीक़े से हेराफेरी किए जाने का ख़ुलासा हुआ। इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान पिछले दिनों सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि सीसीटीवी फ़ुटेज की तकनीकी जांच में दान चोरी की कुल 105 घटनाएं क़ैद हैं। दान पात्रों से निकले कैश और आभूषणों की जब गिनती होती थी, तो व्यवस्था में लगे कर्मचारी नोटों की गड्डियों में चोरी से नोट निकालकर अलग कर उन्हें बाहर ले जाते थे। चोरी किए गए पैसों से आरोपियों ने अयोध्या और आसपास के इलाक़ों में ज़मीन, महंगी गाड़ियां और अन्य संपत्तियां ख़रीदी थीं। इस साज़िश में शामिल 8 मुख्य आरोपियों को जेल भेजा जा चुका है। जांच एजेंसियों ने आरोपियों के ठिकानों से अब तक लगभग ₹79.85 लाख नक़द, सोने के आभूषण, विदेशी मुद्रा और चोरी के पैसों से ख़रीदी गई संपत्तियों के दस्तावेज़ बरामद किए हैं। इस घटना के बाद अब पूर्व सैन्य अधिकारी जितेन्द्र मिश्रा को मंदिर ट्रस्ट का नया सीईओ नियुक्त किया गया है।
इसी तरह भारत के और भी कई बड़े और प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में समय-समय पर दान, चंदे और चढ़ावे की चोरी या वित्तीय कुप्रबंधन के बड़े व गंभीर मामले सामने आते रहे हैं। जैसे कि मुंबई के सबसे प्रसिद्ध श्री सिद्धिविनायक गणपति मंदिर में दान के प्रबंधन को लेकर अगस्त 2026 में एक बड़ा विवाद सामने आया। एक संगठन द्वारा मंदिर में हर साल लगभग ₹18 करोड़ की हेराफेरी का आरोप लगाया गया। मंदिर के ट्रस्ट बोर्ड ने स्वीकार भी किया कि दान संग्रह और गिनती की प्रक्रिया में कुछ कमियां थीं। इस मामले में 9 कर्मचारियों को गिरफ़्तार किया गया और 46 कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया। इसी तरह महाराष्ट्र में ही अहमदनगर ज़िले के प्रसिद्ध शनि शिंगणापुर मंदिर ट्रस्ट में जुलाई 2025 में एक बहुत बड़े और अनोखे घोटाले का पर्दाफ़ाश हुआ। शातिर लुटेरों ने मंदिर के नाम पर 15 से अधिक फ़र्ज़ी मोबाइल ऐप्स और वेबसाइट्स बना रखी थीं। भक्तों से ‘रिमोट दर्शन’ और ‘विशेष पूजा’ के नाम पर ₹1,800 प्रति व्यक्ति तक वसूला जाता था। बताया जाता है कि यह ऑनलाइन दर्शन घोटाला क़रीब ₹36 करोड़ से ₹500 करोड़ के बीच का था। मंदिर प्रशासन के कुछ लोगों ने काग़ज़ों पर सैकड़ों फ़र्ज़ी कर्मचारियों के नाम दर्ज कर रखे थे और उनके नाम पर आने वाली तनख़्वाह ख़ुद हड़प रहे थे। मिसाल के तौर पर मंदिर के अस्पताल में 327 कर्मचारी दिखाए गए थे, जबकि वहां केवल 4 डॉक्टर और 10 स्टाफ़ मौजूद था। एक ऐसे बग़ीचे के रखरखाव के नाम पर जो वहां था ही नहीं,80 कर्मचारियों की तनख़्वाह उठाई जा रही थी।
आंध्र प्रदेश के विश्व के सबसे अमीर मंदिरों में से एक तिरुपति वेंकटेश्वर मंदिर या तिरुमला तिरुपति देवस्थानम में भी सीधे दान पात्र से चोरी के कई छोटे-बड़े मामले सामने आते रहे हैं। मंदिर में ‘विशेष प्रवेश’ और वीआईपी दर्शन टिकटों की कालाबाज़ारी के कई रैकेट पकड़े जा चुके हैं, जहां फ़र्ज़ी सिफ़ारिशी पत्रों के आधार पर करोड़ों रुपये के टिकट ऊंचे दामों पर बेचे गए। इसी मंदिर के ‘परकामनी’ में जहां दानपेटी के पैसे गिने जाते हैं, तैनात कुछ कर्मचारियों और चालकों को कई बार अपने जूतों, कपड़ों और अंडरगारमेंट्स में नोट और सोने के सिक्के छिपाकर ले जाते हुए रंगे हाथों पकड़ा जा चुका है। इसी तरह तिरुवनंतपुरम के ऐतिहासिक श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के गुप्त तहख़ानों में लाखों करोड़ रुपये का ख़ज़ाना मिलने के बाद इसके वित्तीय प्रबंधन पर सवाल उठे थे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त तत्कालीन न्याय मित्र गोपाल सुब्रमण्यम की रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि मंदिर से भारी मात्रा में सोना और चढ़ावा ग़ायब हुआ है, और दान की रसीदों व सोने के शुद्धिकरण के बही-खातों में भारी विसंगतियां थीं। महाकाल मंदिर, उज्जैन और काशी विश्वनाथ ,वाराणसी में भी सीधे दान पेटी लूटने जैसी बड़ी घटनाएं तो कम हैं, लेकिन ‘रसीद और टिकट घोटाला’ समय-समय पर उजागर होता रहा है। गर्भगृह में प्रवेश और उज्जैन में विशेष भस्म आरती, या कशी में सुगम दर्शन के नाम पर फ़र्ज़ी रसीदें काटने वाले गिरोह पकड़े गए हैं। ये गिरोह काउंटर के समानांतर अपनी फ़र्ज़ी खिड़की या दलाल सक्रिय रखते थे, जिससे भक्तों द्वारा दिया गया पैसा सीधे मंदिर ट्रस्ट के खाते में जाने के बजाय इन दलालों की जेब में चला जाता था। इन सभी मामलों में एक बात समान रही है कि जहां भी कैश की गिनती मानवीय स्तर पर होती है या जहां डिजिटल प्रणालियों पर निगरानी कमज़ोर होती है, वहां सुरक्षा एजेंसियां और अंदरूनी स्टाफ़ मिलकर इस तरह की लूट को अंजाम देते हैं।
तिरुपति मंदिर के प्रसिद्ध लड्डू प्रसादम में मिलावटी देसी घी प्रयोग करने की घटना भी देश के सबसे बड़े खाद्य घोटालों और धार्मिक आस्था से जुड़े विवादों में से एक बन चुकी है। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम को सप्लाई किए जाने वाले घी में भारी मिलावट की गई थी। सी बी आई,एस आई टी व ई डी जैसी जांच एजेंसियों ने जब इस सिंडिकेट की परतों को खोला, तो एक बहुत बड़ा सिंथेटिक घी और वित्तीय धोखाधड़ी का नेटवर्क सामने आया। ई डी के अनुसार, साल 2019 से 2024 के बीच देवस्थानम को क़रीब ₹230 करोड़ मूल्य का मिलावटी घी सप्लाई किया गया था। घी में असली दूध की मलाई या गाय के शुद्ध घी की जगह रिफ़ाइंड पाम ऑयल, पाम कर्नेल ऑयल, पामोलीन और गाढ़ा करने वाले ख़तरनाक सिंथेटिक केमिकल्स जैसे कि एम जी -90, मोनोग्लिसराइड्स, मायवेसिट सॉफ्ट 400 और एसिटिक एसिड एस्टर का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा था। इस पूरी रासायनिक मिलावट को ‘एगमार्क स्पेशल ग्रेड गाय घी’ के फ़र्ज़ी लेबल के तहत मंदिर में सप्लाई किया जाता था। एस आई टी के अनुसार, मुख्य आरोपी कंपनियों में से एक ‘भोले बाबा ऑर्गेनिक डेयरी’ ने 5 सालों के भीतर कहीं से भी दूध या मक्खन नहीं ख़रीदा, लेकिन फिर भी लगभग 68 लाख किलो नक़ली घी बनाकर मंदिर ट्रस्ट को बेच दिया। धर्म और आस्था के नाम पर की जा रही इस तरह की लूट यह सोचने को मजबूर करती है कि यह धर्म नहीं बल्कि धंधा है।





