डॉ विक्रम चौरसिया
नवरात्र केवल शक्ति की पूजा नहीं, नारी की गरिमा को जीवन में उतारने का अवसर भी है।
नवरात्र आने वाले हैं। मंदिर सजेंगे, पंडाल रोशन होंगे, दीप जलेंगे और माँ दुर्गा के चरणों में श्रद्धा से शीश झुकेंगे। नौ दिनों तक शक्ति की आराधना होगी, कन्या पूजन होगा और हम माँ से सुख-शांति एवं रक्षा का आशीर्वाद माँगेंगे।लेकिन इसी श्रद्धा के बीच एक सवाल मन में उठता है जब कन्या में माँ का स्वरूप देखते हैं, तो किसी बेटी या स्त्री के साथ अन्याय होते समय उस भावना को क्यों भूल जाते हैं?माँ दुर्गा हमारे लिए शक्ति, साहस और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक हैं। नारी भी सृजन, संवेदना और शक्ति का स्वरूप है। वह माँ, बेटी, बहन या पत्नी होने से पहले एक स्वतंत्र मनुष्य है व मां दुर्गा का स्वरूप है ,अपने सपनों, अधिकारों और गरिमा के साथ।रामायण की कथा में रावण ने सीता मां का हरण कर उन्हें लंका ले गया। यह अधर्म था और अंततः उसका विनाश हुआ। भारतीय सांस्कृतिक चेतना में सीता नारी की गरिमा, धैर्य और सम्मान का महत्वपूर्ण प्रतीक हैं।आज प्रश्न यह है कि जिस संस्कृति ने स्त्री के सम्मान और मर्यादा का संदेश दिया, उस संदेश को हम अपने व्यवहार में कितना उतार पाए हैं?धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं वह हमारे आचरण और चरित्र में भी दिखाई देना चाहिए।नवरात्र में कन्या के चरणों में श्रद्धा से सिर झुकाते हैं, उसे भोजन कराते हैं और देवी का स्वरूप मानते हैं। फिर मन पूछता है,क्या यह सम्मान केवल नौ दिनों का है?
यदि नहीं, तो उसका उत्तर हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।
बेटी को शिक्षा दें, उसके अधिकारों की जानकारी दें और उसमें आत्मविश्वास पैदा करें। लेकिन केवल बेटी से यह कहना पर्याप्त नहीं कि“बाहर निकलते समय सावधान रहना।”बेटे से भी कहना होगा“तुम्हारा आचरण ऐसा हो कि किसी बेटी को तुम्हारे कारण डरना न पड़े।”बचपन से यह संस्कार देना होगा कि किसी स्त्री की इच्छा, स्वतंत्रता और गरिमा का सम्मान करना कमजोरी नहीं, बल्कि चरित्र की पहचान है।कानून अपराधी को दंड दे सकता है, संस्कार अपराधी बनने से रोकने की कोशिश करते है।
निर्भया की घटना को याद करते हुए उस दौर का सामाजिक आक्रोश आज भी स्मरण होता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से विरोध की आवाजें उठीं। महिलाओं की सुरक्षा और न्याय को लेकर गंभीर प्रश्न सामने आए और उसके बाद कानून तथा संस्थागत व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।फिर भी जब आज किसी महिला के साथ हिंसा या उत्पीड़न की खबर सामने आती है, तो एक प्रश्न उठता है क्या कानून के साथ हमारी सामाजिक सोच और जिम्मेदारी भी उतनी ही बदली है?कानून न्याय का माध्यम है, लेकिन अपराध की मानसिकता के विरुद्ध पहली लड़ाई घर और समाज के संस्कारों से शुरू होती है।महिषासुर जैसी प्रवृत्तियों के विरुद्ध माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर के अत्याचार का अंत अधर्म पर धर्म और अन्याय पर न्याय की विजय का प्रतीक है।आज भी समाज में ऐसी महिषासुर जैसी प्रवृत्तियाँ मौजूद हैं, जो स्त्री की गरिमा और सुरक्षा को चुनौती देती हैं। इनके विरुद्ध कानून आवश्यक है, लेकिन साथ ही परिवार में संस्कार, शिक्षा में संवेदना और समाज में जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है।माँ दुर्गा की शक्ति किसी को डराने के लिए नहीं, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के लिए है।
इस नवरात्र एक संकल्प आप लीजिए,इस नवरात्र माँ दुर्गा की पूजा के साथ घर में संस्कार का दीप भी जलाएँ।कन्या पूजन को केवल परंपरा न रहने दें। बेटी को अवसर दें और बेटे को सम्मान, संयम तथा जिम्मेदारी का संस्कार दें।क्योंकि असली परीक्षा तब होती है, जब सामने ऐसी स्त्री हो जिससे हमारा कोई पारिवारिक रिश्ता न हो और फिर भी उसकी गरिमा हमें उतनी ही पवित्र लगे।नवरात्र समाप्त होंगे। पंडाल उतरेंगे, रोशनियाँ बुझेंगी और माँ की प्रतिमा विदा हो जाएगी। लेकिन एक प्रश्न हमारे भीतर रहना चाहिए
क्या हमने माँ दुर्गा को केवल प्रतिमा में देखा, या अपने आसपास की हर स्त्री की गरिमा में भी उनकी शक्ति को पहचाना?शायद माँ दुर्गा की सबसे बड़ी आराधना यही है कि हम किसी की बेटी के रास्ते में अँधेरा न बनें।नारी में सम्मान देखें, माँ दुर्गा में शक्ति का दर्शन करें और अपने आचरण में उस शक्ति का संस्कार उतारें।
हर माँ पूजनीय है। हर बेटी सम्मान की अधिकारी है।माँ दुर्गा हम सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें, सबकी रक्षा करें और हमें ऐसी शक्ति दें कि कोई बेटी भय में नहीं, बल्कि अपने सपनों के साथ जीवन जी सके।जिस दिन किसी बेटी को अपने सपनों से पहले अपनी सुरक्षा की चिंता नहीं करनी पड़ेगी शायद उसी दिन माँ दुर्गा की आराधना अपने सबसे सुंदर अर्थ को पा लेगी।





