अशोक भाटिया
भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में जहां जन-कल्याण को शासन का मूलमंत्र माना जाता है, वहां स्वास्थ्य का क्षेत्र एक गंभीर संक्रमण काल से गुजर रहा है। बीमारियां जिस रफ्तार से बढ़ रही हैं, उससे कहीं अधिक तेजी से चिकित्सा के नाम पर इंसानी जिंदगियों से खिलवाड़ का एक भयावह और अनैतिक तंत्र विकसित हो चुका है। हाल ही में फार्मास्युटिकल क्षेत्र में मुनाफे की हवस और मरीजों के साथ हो रही धोखाधड़ी की गूंज देश की सबसे बड़ी अदालत में सुनाई दी है। न्याय के सर्वोच्च मंदिर ने दवा निर्माताओं, अस्पतालों और सरकारी नियामक संस्थाओं के रवैये पर जो तल्ख टिप्पणियां की हैं, उसने हमारे पूरे स्वास्थ्य तंत्र की रीढ़ को हिलाकर रख दिया है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ द्वारा एक मामले की सुनवाई के दौरान प्रयुक्त यह वाक्य—”यह तो सीधे तौर पर दिन-दहाड़े डकैती है”—महज एक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस लाचार भारतीय नागरिक की सामूहिक चीख का प्रतिनिधित्व करता है, जो बीमारी से पहले इलाज के खर्च और उसमें होने वाली जालसाजी से मर जाता है।
न्यायालय के समक्ष जो तथ्य उभरकर सामने आए हैं, वे किसी भी संवेदनशील समाज को स्तब्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। खासकर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझ रहे मरीजों के घावों पर जिस तरह मुनाफाखोरी का नमक छिड़का जा रहा है, वह अमानवीयता की पराकाष्ठा है। अदालत के संज्ञान में लाया गया कि कैंसर की एक आवश्यक जीवन रक्षक दवा, जिसकी कीमत निर्माता कंपनी द्वारा रिटेलर के लिए महज ₹2,700 तय की जाती है, उस पर अधिकतम खुदरा मूल्य पूरे ₹27,000 छाप दिया जाता है। यानी कि लागत और थोक मूल्य से ठीक दस गुना अधिक दाम पर उस दवा को बेचे जाने की खुली छूट दे दी गई। एक पीड़ित परिवार और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा दायर की गई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस अकल्पनीय मूल्य अंतर पर गहरी नाराजगी जताई। अदालत ने सीधे शब्दों में सवाल पूछा कि मरीजों को इस तरह बेदर्दी से लूटने की इजाजत व्यवस्था कैसे दे सकती है? निर्माता कंपनियां और बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट फार्मेसियां मिलकर मरीजों की जेब पर जो डाका डाल रही हैं, उस पर राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण और स्वास्थ्य मंत्रालय जैसी नियामक इकाइयां आंखें मूंदकर क्यों बैठी हैं?
यह मामला सिर्फ निजी क्षेत्र की लूट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के खजाने और टैक्सपेयर्स के पैसे में सेंधमारी का भी एक बड़ा घोटाला साबित हो रहा है। आज केंद्र सरकार ‘आयुष्मान भारत’, CGHS और DGHS जैसी लोक-कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से गरीब और मध्यम वर्ग के इलाज का खर्च उठाती है। निजी अस्पताल इन्हीं बढ़ी हुई और मनमानी एमआरपी पर दवाएं खरीदते हैं और बाद में सरकारी खजाने से उसका शत-प्रतिशत रीइम्बर्समेंट क्लेम करते हैं। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि चंद दवा माफियाओं और निजी अस्पतालों की तिजोरियां भरने के लिए आम जनता के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को पानी की तरह बहाया जा रहा है। करदाताओं का पैसा जो देश के बुनियादी ढांचे और लोक-कल्याण में लगना चाहिए था, वह दवा कंपनियों की साठगांठ की भेंट चढ़ रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस ओर ध्यान दिलाते हुए इसे ‘स्पष्ट रूप से देश और जनता के साथ एक बड़ा फ्रॉड’ करार दिया है। इस संदर्भ में एक अहम सुझाव यह भी आया कि क्यों न देश की सभी जीवन रक्षक दवाओं को एक एकीकृत मूल्य-नियंत्रण के दायरे में ला दिया जाए, जिससे जेनेरिक और ब्रांडेड दवाओं का यह पूरा कृत्रिम भ्रम ही समाप्त हो जाए और दवाएं समान दाम पर उपलब्ध हो सकें।
एक तरफ जहां दवाओं के नाम पर यह संस्थागत और कानूनी लूट जारी है, वहीं दूसरी तरफ ‘नकली दवाओं’ का एक समानांतर और अंडरग्राउंड अंडरवर्ल्ड चल रहा है, जो सीधे मौत का व्यापार कर रहा है। हाल ही में बेंगलुरु में विशेष जांच दल और औषधि नियंत्रण विभाग द्वारा संयुक्त छापेमारी में एक बहुत बड़े अंतरराज्यीय नकली कैंसर दवा रैकेट का भंडाफोड़ हुआ है। जांच में जो तथ्य सामने आए, वे रोंगटे खड़े करने वाले हैं। वीरेश कुमार जैन नामक एक फार्मासिस्ट की मुख्य संलिप्तता वाले इस गिरोह ने करीब 90 से अधिक प्रतिष्ठित अस्पतालों और क्लीनिकों में पिछले पांच वर्षों से नकली तथा एक्सपायर्ड हो चुकी कैंसर और आईसीयू दवाओं की धड़ल्ले से आपूर्ति की। ये अपराधी एक्सपायर हो चुकी दवाओं को दोबारा प्रोसेस करते थे, उन्हें चमचमाते नए डिब्बों में पैक करते थे, नामचीन अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय फार्मा ब्रांडों के नकली होलोग्राम और लेबल लगाते थे और अस्पतालों के परचेजिंग डिपार्टमेंट को आकर्षित करने के लिए पचास प्रतिशत तक के भारी डिस्काउंट का लालच देते थे। पांच साल तक, यानी कि 1,800 से अधिक दिनों तक अस्पतालों के खरीद तंत्र ने बिना किसी लैब टेस्टिंग या प्रामाणिकता की जांच किए, सिर्फ मुनाफे के लालच में इन नकली दवाओं को खरीदा और उन लाचार मरीजों के जिस्म में कीमोथेरेपी के नाम पर जहर के रूप में उतार दिया जो अपनी जिंदगी की आखिरी उम्मीद लेकर वहां आए थे।
इस घिनौने अपराध की जद सिर्फ बेंगलुरु तक सीमित नहीं है; इसके तार कर्नाटक से लेकर हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र तक फैले हुए हैं। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि नकली दवाओं का नेटवर्क देशव्यापी नेटवर्क बन चुका है। कुछ समय पूर्व नागपुर के सरकारी अस्पताल में भी एक ऐसा ही सनसनीखेज मामला सामने आया था, जहां मरीजों को दी जाने वाली गोलियों में मुख्य औषधीय साल्ट की जगह साधारण टेलकम पाउडर भरा हुआ था। जब किसी मरीज को एंटीबायोटिक या कैंसर रोधी दवाओं के नाम पर टेलकम पाउडर या चाक की गोलियां दी जाएंगी, तो उसका ठीक होना तो दूर, बीमारी और अधिक आक्रामक होकर उसकी जान ले लेगी। कानून के नजरिए से देखें तो यह धारा 302 यानी सीधे-सीधे हत्या का मामला बनता है, न कि केवल ट्रेडमार्क के उल्लंघन या मिलावट का। ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 में कहने को तो आजीवन कारावास और जब्त माल की कीमत का तीन गुना जुर्माने जैसे सख्त कानूनी प्रावधान शामिल किए गए हैं, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर अपराधियों को इसका कोई खौफ नजर नहीं आता। वजह साफ है—कमजोर लूपहोल्स का फायदा उठाकर अपराधी अक्सर जमानत पर बाहर आ जाते हैं और फिर से अपना वही खूनी कारोबार शुरू कर देते हैं।
यही कारण है कि देश की जनता और न्यायविदों को अब इस भयावह संकट से उबरने के लिए न्यायपालिका की ओर देखना पड़ रहा है। अब जब पानी सिर से ऊपर जा चुका है, तो अदालती हस्तक्षेप ही एकमात्र उम्मीद बची है। अदालतों में दायर हालिया याचिकाओं में यह मांग बिल्कुल जायज है कि नकली और अत्यधिक महंगी दवाओं के मामलों की जांच के लिए तीन महीने की सख्त समय-सीमा तय हो और फास्ट ट्रैक कोर्ट के माध्यम से एक वर्ष के भीतर दोषियों को फांसी या उम्रकैद जैसी नजीर बनने वाली सजाएं दी जाएं। साथ ही, इस धंधे से अर्जित की गई अपराधियों और उनके परिवारों की पूरी चल-अचल संपत्ति को तुरंत कुर्क किया जाना चाहिए। दवा उद्योग को आत्ममंथन करना होगा कि जब आबकारी विभाग अपनी शराब की बोतलों पर क्यूआर कोड और ट्रैक-एंड-ट्रेस मैकेनिज्म लागू करके एक-एक बूंद का हिसाब रख सकता है, तो ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया देश की जीवन रक्षक दवाओं के लिए वैसा ही अचूक और फुलप्रूफ डिजिटल बारकोडिंग सिस्टम देशव्यापी स्तर पर अनिवार्य क्यों नहीं कर पा रहा है? शीर्ष 300 ब्रांडों पर क्यूआर कोड का नियम लागू करना एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इसे देश की हर छोटी-बड़ी मेडिकल वाइल और टैबलेट स्ट्रिप पर अनिवार्य करना होगा।
दवाइयों के इस दोतरफा संकट—एक तरफ कृत्रिम रूप से बढ़ाई गई बेलगाम कीमतें और दूसरी तरफ नकली दवाओं का जानलेवा जाल—ने चिकित्सा पेशे की विश्वसनीयता को भी दांव पर लगा दिया है। जब तक सरकारें राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाएंगी और स्वास्थ्य को कॉर्पोरेट घरानों के मुनाफे का जरिया बनने से नहीं रोकेंगी, तब तक आम आदमी को न्याय नहीं मिल सकता। फार्मा लॉबी की ताकत के आगे सरकारी अमले की कथित और रहस्यमयी चुप्पी इस बात का संकेत है कि बिना अदालती हंटर के यह तंत्र सुधरने वाला नहीं है। २,७०० की दवा को २७,००० में बेचना अगर डकैती है, तो नकली दवाएं बेचना सीधे-सीधे नरसंहार है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीखें तय कर सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अदालत का यह सख्त रुख देश की नीति-नियंताओं की कुंभकर्णी नींद को तोड़ेगा। देश को अब भाषणों और आश्वासनों की नहीं, बल्कि एक ऐसे कठोर कानून और पारदर्शी मूल्य निर्धारण व्यवस्था की जरूरत है, जहां किसी भी मां, बहन या पिता को पैसे के अभाव में या नकली दवा के जहर के कारण तड़प-तड़प कर दम न तोड़ना पड़े। स्वास्थ्य हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, और इसे मुनाफाखोरों की मंडी बनने से बचाना ही आज के समय की सबसे बड़ी राष्ट्रीय चुनौती है।





