अशोक भाटिया
संवैधानिक मर्यादाओं, लोकतांत्रिक मूल्यों और ‘जनता के, जनता द्वारा, जनता के लिए’ शासन के संकल्प से निर्मित हमारा गणतंत्र आज एक गंभीर आंतरिक संकट के दौर से गुजर रहा है। यह संकट किसी बाहरी शत्रु का नहीं, बल्कि व्यवस्था की रगों में फैल चुके उस अदृश्य विष का है जिसे हम ‘भ्रष्टाचार’ कहते हैं। गणतंत्र की नींव लोक-कल्याण, समानता और न्याय पर टिकी होती है, लेकिन जब इस नींव को भ्रष्टाचार रूपी घुन अंदर ही अंदर चाटने लगे, तो लोकतंत्र का भव्य ढांचा बाहर से जितना भी मजबूत दिखाई दे, भीतर से वह खोखला होने लगता है। भ्रष्टाचार केवल धन का अवैध लेन-देन या आर्थिक अपराध नहीं है; यह वास्तव में एक नैतिक पतन है जो आम नागरिक के अधिकारों का हनन करता है और राज्य की संप्रभुता व साख को सीधे तौर पर चुनौती देता है। वैश्विक स्तर पर देखें तो ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में भारत भले ही ९१वें पायदान पर पहुंच गया हो, लेकिन १०० में से ३9 का स्कोर यह साफ दर्शाता है कि हमारा गणतंत्र अभी भी एक गंभीर खतरे के साए में है। जब एक आम नागरिक को अपने मौलिक अधिकारों, बुनियादी सुविधाओं और न्याय के लिए भी रिश्वत या रसूख का सहारा लेना पड़े, तो समझ लेना चाहिए कि गणतंत्र की आत्मा लहूलुहान हो रही है।
आजादी के बाद से हमने एक ऐसे कल्याणकारी राज्य की कल्पना की थी, जहां समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक विकास की किरणें पहुंचेंगी। किंतु, धरातल की सच्चाई आज भी इसके विपरीत खड़ी दिखाई देती है। हाल ही में सामने आए बड़े वित्तीय अपराधों ने इस बात की पुष्टि की है कि भ्रष्टाचार ने अब एक नया और डिजिटल रूप अख्तियार कर लिया है। भारतीय रिजर्व बैंक की हालिया रिपोर्ट के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि बैंकिंग क्षेत्र में धोखाधड़ी और घोटालों के मामले १०,००० के पार जा चुके हैं, जिनमें ४८,०२१ करोड़ रुपये से अधिक की जनता की गाढ़ी कमाई दांव पर लगी है। यह आंकड़े केवल बैंकिंग धोखाधड़ी के नहीं हैं, बल्कि यह उस भरोसे का कत्ल है जो एक आम आदमी देश के वित्तीय तंत्र पर करता है। प्रशासनिक तंत्र में व्याप्त लालफीताशाही और बड़ी कॉर्पोरेट साठगांठ ने एक समानांतर व्यवस्था खड़ी कर दी है, जहां नीतिगत भ्रष्टाचार के जरिए देश के संसाधनों की खुली लूट हो रही है।
लोकतंत्र के सबसे बड़े स्तंभ यानी चुनाव प्रणाली की शुचिता भी आज तीखे राजनीतिक आरोपों के घेरे में है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने हाल ही में (२४ सितंबर, २०२६) एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से चुनावी सूचियों में बड़े पैमाने पर हेरफेर का आरोप लगाते हुए इसे “वोट चोरी” करार दिया है। राहुल गांधी का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग द्वारा विपक्षी समुदायों, दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के नाम जानबूझकर मतदाता सूचियों से हटाए जा रहे हैं और उन्होंने इसे सीधे तौर पर “संविधान के खिलाफ बड़ा अपराध और देशद्रोह” बताया है। हालांकि, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए राहुल गांधी को “भ्रम फैलाने का उस्ताद” कहा है और इन दावों को बिना किसी पुख्ता सबूत के राजनीति से प्रेरित बताया है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने यूपीआई ट्रांजैक्शन पर लगने वाले शुल्कों और डिजिटल पेमेंट्स को लेकर भी सरकार पर “अमेरिकी कंपनियों के दबाव में काम करने” और आम जनता को लूटने के नीतिगत भ्रष्टाचार के आरोप मढ़े हैं। इस प्रकार के गंभीर आरोप-प्रत्यारोप और संस्थागत विश्वसनीयता पर उठते सवाल इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि तंत्र के भीतर गहरा अविश्वास पनप रहा है।
भ्रष्टाचार का सबसे भयावह रूप हमारे लोकतांत्रिक संस्थानों और बुनियादी अधिकारों से जुड़े विभागों में देखने को मिलता है। जब शिक्षा, भर्ती और खेल आयोजनों जैसे पवित्र क्षेत्रों में भी भ्रष्टाचार का वायरस घुस जाए, तो गणतंत्र का भविष्य ही दांव पर लग जाता है। पश्चिम बंगाल के बहुचर्चित स्कूल सेवा आयोग भर्ती घोटाले जैसी घटनाएं इसका ज्वलंत उदाहरण हैं, जहां मेधावी छात्र सड़कों पर न्याय के लिए भीख मांगते रहे और अयोग्य लोगों को पैसों के दम पर नौकरियां बांट दी गईं। इतना ही नहीं, खेल जगत से लेकर वित्तीय संस्थानों तक जांच एजेंसियों द्वारा देश के प्रतिष्ठित वित्तीय संस्थानों जैसे एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस से जुड़े ₹१,३२२ करोड़ के कथित ऋण घोटाले की हालिया जांच यह साबित करती है कि बड़ी मछलियां आज भी कानून की नाक के नीचे देश के संसाधनों को खोखला कर रही हैं। जब देश की संपदा और युवाओं का भविष्य भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है, तो देश के समग्र विकास की गति अवरुद्ध होना अनिवार्य है।
इस विकराल समस्या से निपटने के लिए हमारे पास वैधानिक अस्त्रों की कमी नहीं है, लेकिन चिंता का विषय उनका प्रभावी क्रियान्वयन है। भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुख्य कवच भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, १९८८ है, जिसमें समय के साथ कड़े बदलाव किए गए हैं। २०१८ के संशोधन के माध्यम से इस कानून को और अधिक धारदार बनाने का प्रयास किया गया, जिसके तहत अब केवल रिश्वत लेने वाले लोक सेवक ही नहीं, बल्कि रिश्वत देने वाले को भी सीधे तौर पर अपराधी माना गया है और उनके लिए ७ साल तक की कैद का प्रावधान है। इसके अलावा, लोक सेवकों की संपत्तियों की कुर्की और मुकदमों को निपटाने के लिए २ साल की समय-सीमा तय की गई है। इस कानून के साथ-साथ धन शोधन निवारण अधिनियम और बेनामी संपत्ति लेनदेन निषेध अधिनियम जैसे दंडात्मक प्रावधान भी मौजूद हैं। कानूनन, भ्रष्टाचार अब एक ऐसा संज्ञेय अपराध है जहां अपराधियों की आर्थिक रीढ़ तोड़ने और उन्हें सलाखों के पीछे भेजने की पूरी शक्ति राज्य के पास सुरक्षित है।
परंतु, इन कड़े वैधानिक प्रावधानों के बावजूद धरातल पर कानून का खौफ उम्मीद के मुताबिक दिखाई नहीं देता। इसका सबसे बड़ा कारण प्रशासनिक स्वीकृतियों की जटिलता और अदालती मुकदमों में होने वाली असीमित देरी है। सीबीआई के हालिया आंकड़ों के अनुसार, एजेंसी द्वारा जांच किए गए ७,२०० से अधिक भ्रष्टाचार के मामले अदालतों में लंबित हैं, जिनमें से ४०० से अधिक मामले तो पिछले दो दशकों से न्याय की बाट जोह रहे हैं। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा १७ए के तहत किसी लोक सेवक के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले सरकार से पूर्व मंजूरी लेने की अनिवार्यता अक्सर बड़ी मछलियों के लिए एक सुरक्षा कवच बन जाती है। नौकरशाही और राजनीतिक रसूख के कारण यह मंजूरी मिलने में महीनों या सालों लग जाते हैं, जिससे जांच की गोपनीयता और प्रभावशीलता दोनों प्रभावित होती हैं। न्याय में होने वाली यह अत्यधिक देरी और कानूनी पेचीदगियां समाज में यह गलत संदेश देती हैं कि ताकतवर लोग अपराध करके भी बच सकते हैं।
यदि हमें अपने गणतंत्र को वास्तव में अक्षुण्ण, मजबूत और प्रासंगिक बनाए रखना है, तो अब केवल सतही उपचार से काम नहीं चलेगा। हमें इस व्यवस्था की शल्य-चिकित्सा करनी होगी। इसके लिए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अनिवार्य पूर्व-मंजूरी की व्यवस्था को सुव्यवस्थित और पारदर्शी बनाना होगा ताकि कोई भी दोषी तकनीकी कमियों का फायदा न उठा सके। इसके साथ ही, भ्रष्टाचार निरोधक संस्थाओं जैसे लोकपाल, लोकायुक्त और केंद्रीय सतर्कता आयोग को बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप या दबाव के स्वायत्त रूप से काम करने की पूर्ण स्वतंत्रता देनी होगी। न्यायपालिका में विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों की संख्या बढ़ानी होगी ताकि भ्रष्टाचार के मुकदमों का निपटारा कानूनन तय समय-सीमा के भीतर हो और भ्रष्टाचारियों में कानून का वास्तविक खौफ पैदा हो।
दरअसल यह लड़ाई केवल सरकारों या कानूनों के भरोसे नहीं जीती जा सकती। यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक संग्राम है, जिसे देश के प्रत्येक नागरिक को लड़ना होगा। जब तक हम समाज के रूप में भ्रष्ट व्यक्तियों का सामाजिक बहिष्कार नहीं करेंगे और ईमानदारी को प्रतिष्ठा नहीं देंगे, तब तक व्यवस्था को साफ करना असंभव है। नागरिक चेतना और मजबूत कानून का समन्वय ही वह अचूक अस्त्र है जो लोकतंत्र को जीवंत रखती है। गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराना तभी सार्थक होगा, जब हम एक ऐसे भारत के निर्माण का संकल्प लें जहां व्यवस्था घुन से मुक्त हो, न्याय निष्पक्ष हो और हर नागरिक का सिर सम्मान से ऊंचा हो। समय आ गया है कि हम जागें, क्योंकि खोखला होता गणतंत्र केवल एक राजनीतिक आपदा नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का अंधकार है।





