उन्नत तकनीक के दौर में शीर्ष सेनापतियों की घटती भूमिका

The Diminishing Role of Top Generals in the Era of Advanced Technology

महेन्द्र तिवारी

युद्ध का स्वरूप समय के साथ निरंतर बदलता रहा है। प्राचीन काल में जहां शारीरिक बल और बड़ी सेनाओं का महत्व था, वहीं आज के आधुनिक युग में युद्ध पूरी तरह से उन्नत तकनीक और विज्ञान पर निर्भर हो गया है। इसी दिशा में अमेरिकी रक्षा विभाग ने एक ऐसा ऐतिहासिक और अभूतपूर्व निर्णय लिया है जो आने वाले समय में वैश्विक सैन्य रणनीतियों को पूरी तरह से बदल कर रख देगा। देश की सेना ने अपने ढांचे में एक बड़ा और व्यापक बदलाव करते हुए शीर्ष सेनापतियों और नौसेनाध्यक्षों की संख्या में 20 प्रतिशत की भारी कटौती करने का ऐलान किया है। इस कटौती का सीधा प्रभाव सेना के निर्णय लेने की प्रक्रिया और उसके जमीनी कामकाज पर पड़ेगा। इस कठोर कदम के पीछे का मुख्य उद्देश्य सैन्य बल को लालफीताशाही और अनावश्यक नौकरशाही से मुक्त करना है। जब सेना में बहुत अधिक उच्चाधिकारी होते हैं, तो किसी भी बड़े फैसले को लागू करने में काफी समय लगता है जो युद्ध जैसी गंभीर और आपातकालीन स्थिति में राष्ट्र के लिए बहुत नुकसानदेह साबित हो सकता है।

आधुनिक युद्धक्षेत्र में हर पल अहम होता है और फैसले पलक झपकते ही लेने होते हैं। लंबे समय से यह महसूस किया जा रहा था कि सैन्य ढांचा ऊपर से बहुत अधिक भारी हो गया था। शीर्ष अधिकारियों की भरमार के कारण आदेशों के पालन में अनावश्यक देरी होती थी और जमीनी स्तर पर लड़ रहे सैनिकों तक त्वरित दिशा निर्देश नहीं पहुंच पाते थे। इस 20 प्रतिशत की कटौती से आदेशों की श्रृंखला छोटी और अधिक प्रभावी हो जाएगी। अधिकारियों की संख्या कम होने से सीधे तौर पर जवाबदेही भी बढ़ेगी और सेना का पूरा ध्यान व्यर्थ की वैचारिक बहसों से हटकर केवल और केवल विशुद्ध युद्ध कौशल तथा राष्ट्रीय सुरक्षा पर केंद्रित होगा। यह बदलाव केवल कुछ पदों की कटौती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी सैन्य संस्कृति को पुनर्जीवित करने का एक बहुत ही गंभीर प्रयास है जिससे सशस्त्र बल को अधिक फुर्तीला और त्वरित मारक बनाया जा सके।

इस बड़े संगठनात्मक बदलाव के साथ ही सेना ने एक और अत्यंत महत्वपूर्ण दिशा में कदम बढ़ाया है। अब सैन्य बलों का ध्यान विशाल मानव क्षमता की जगह पूरी तरह से स्वचालित यंत्रों, उन्नत प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर केंद्रित होगा। भविष्य के युद्ध बड़ी संख्या में सैनिकों को सीमाओं पर भेजकर नहीं लड़े जाएंगे। आने वाले समय का युद्धक्षेत्र आकाश, जमीन, समुद्र और अभौतिक साइबर दुनिया में फैले स्वचालित हथियारों का होगा। मानव सैनिकों की जगह अब मानवरहित विमान, स्वचालित पनडुब्बियां और यंत्रमानव युद्ध के मैदान में अग्रिम पंक्ति की जिम्मेदारी संभालेंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से चलने वाले ये आधुनिक हथियार बिना किसी मानवीय थकान, भय या भूख के अत्यंत सटीक और घातक हमले करने में पूरी तरह से सक्षम हैं। रक्षा विभाग ने इस कड़वी सच्चाई को भलीभांति समझ लिया है कि भविष्य में सैन्य सर्वोच्चता उसी देश के पास होगी जिसके पास सबसे उन्नत और सटीक स्वचालित प्रणालियां होंगी।

दशकों तक पारंपरिक हथियारों जैसे बड़े लड़ाकू विमानों, विशालकाय युद्धपोतों और भारी युद्धक वाहनों पर निर्भर रहने के बाद अब रणनीति में यह भारी बदलाव किया जा रहा है। इन पारंपरिक युद्ध प्रणालियों को बनाने में बहुत अधिक धन और कई वर्षों का अमूल्य समय लगता है। इसके अलावा युद्ध के दौरान इनके नष्ट होने से भारी आर्थिक नुकसान होता है और सबसे बढ़कर मानवीय जीवन की हानि होती है, जिसकी भरपाई किसी भी कीमत पर नहीं की जा सकती। इसके ठीक विपरीत स्वचालित यंत्र और मानवरहित विमान बनाना काफी सस्ता होता है। इन्हें बहुत कम समय में बड़ी संख्या में कारखानों में तैयार किया जा सकता है। युद्ध के दौरान दुश्मन की उच्च स्तरीय निगरानी प्रणालियों को चकमा देने के लिए इन छोटे लेकिन घातक यंत्रों के विशाल झुंड का एक साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि मारकाट के बीच इनमें से कुछ नष्ट भी हो जाएं, तो सेना को कोई बड़ा नुकसान नहीं होता और न ही किसी भी सैनिक की जान जाती है।

अंतरराष्ट्रीय भूराजनीति और शक्ति संतुलन के दृष्टिकोण से भी यह ढांचागत बदलाव अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रशांत महासागर क्षेत्र और एशिया में लगातार बढ़ती सैन्य चुनौतियों को देखते हुए इस पश्चिमी शक्ति को अपनी युद्ध नीति में यह आक्रामक बदलाव करना ही पड़ा है। कुछ प्रमुख एशियाई देश पिछले 1 दशक से लगातार अपनी सैन्य उत्पादन क्षमता और स्वचालित हथियारों में भारी धन का निवेश कर रहे हैं। वे बहुत तेजी से नई तकनीक विकसित कर रहे हैं और पारंपरिक सेना के आकार को कम करके उन्नत हथियारों पर सारा जोर दे रहे हैं। इन तेजी से उभरती हुई भूराजनीतिक चुनौतियों का सामना करने के लिए यह पश्चिमी महाशक्ति केवल अपनी पुरानी युद्ध प्रणालियों पर निर्भर नहीं रह सकती थी। राष्ट्र को एक ऐसी सेना की परम आवश्यकता है जो आकार में भले ही छोटी हो, लेकिन मारक क्षमता और तकनीकी दृष्टि से दुनिया में सबसे तेज और अभेद्य हो। यह नई रणनीति अपने सभी वैश्विक प्रतिद्वंद्वियों से 2 कदम आगे रहने की एक बहुत ही सोची समझी दूरगामी योजना का ही हिस्सा है।

सैन्य निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता का गहरा एकीकरण इस नए बदलाव का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा है। पहले युद्ध के मैदान से मिलने वाली जानकारी और असंख्य आंकड़ों को विभिन्न स्तरों के अधिकारियों द्वारा बारीकी से विश्लेषित किया जाता था, जिसमें काफी समय बर्बाद होता था। लेकिन अब उन्नत संगणक प्रणालियां और जटिल तकनीकी प्रक्रियाएं पल भर में दुनिया भर से मिलने वाले आंकड़ों का सटीक विश्लेषण करके सबसे सुरक्षित रणनीति सुझा सकती हैं। जब मशीनें इतनी तेजी से काम कर रही हों, तो मानव अधिकारियों की कई परतों की आवश्यकता अपने आप खत्म हो जाती है। यह तकनीकी एकीकरण सेना को किसी भी अप्रत्याशित संकट का जवाब कुछ ही मिनटों में देने में पूरी तरह सक्षम बनाएगा। इसके साथ ही एक नई विशेष सैन्य कमान का गठन भी किया जा रहा है जिसका पूरा ध्यान केवल इन नए स्वचालित हथियारों के विकास, परीक्षण और संचालन पर होगा।

स्वचालित हथियारों और यंत्रमानवों के इस अंधाधुंध बढ़ते उपयोग ने युद्ध की नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय नियमों पर भी एक नई और गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। जब जीवन और मृत्यु का निर्णय लेने का परम अधिकार मशीनों को सौंप दिया जाता है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि किसी भी गलती या निर्दोषों की जान जाने के लिए जवाबदेह कौन होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर आधारित हथियार भावनाओं, दया या मानवीय संवेदनाओं से पूरी तरह से रहित होते हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य अपने तय लक्ष्य को नष्ट करना होता है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना एक बहुत बड़ी चुनौती होगी कि ये निर्दयी मशीनें युद्ध के अंतरराष्ट्रीय नियमों और मानवीय कानूनों का कड़ाई से पालन करें। कई वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों का यह स्पष्ट रूप से मानना है कि मारक प्रणालियों से मानव नियंत्रण को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता और न ही ऐसा किया जाना चाहिए। किसी भी मारक प्रणाली में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार हमेशा एक जिम्मेदार इंसान के पास ही होना चाहिए।

हालांकि इन सभी गंभीर नैतिक चिंताओं के बावजूद तकनीकी प्रगति के इस विशाल पहिए को अब पीछे की तरफ घुमाना किसी भी देश के लिए संभव नहीं रह गया है। उन्नत हथियारों की यह नई दौड़ पुराने शीत युद्ध के तनावपूर्ण दौर की याद दिलाती है, जहां हर महाशक्ति एक दूसरे से अधिक मारक क्षमता हासिल करने की अंधी होड़ में लगी रहती थी। अंततः यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि शीर्ष सेनापतियों और नौसेनाध्यक्षों की संख्या में 20 प्रतिशत की यह ऐतिहासिक कटौती केवल एक सामान्य प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि यह युद्ध के भविष्य की एक बहुत ही स्पष्ट और खौफनाक झलक है। नई सदी की तकनीक को पूरी तरह से अपनाने की यह आक्रामक तैयारी भविष्य में होने वाले किसी भी युद्ध का अंतिम परिणाम तय करेगी। यह भारी ढांचागत बदलाव संपूर्ण वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल देगा और दुनिया के अन्य सभी देशों को भी विवश करेगा कि वे अपनी सैन्य नीतियों और हथियारों के आधुनिकीकरण पर बहुत गंभीरता से पुनर्विचार करें।