बाढ़ का बदलता स्वरूप आपदा प्रबंधन को राहत और बचाव से आगे ले जाकर पूर्व तैयारी त्वरित प्रतिक्रिया और प्रभावी राहत व्यवस्था से जोड़ने की मांग करता है। बिहार में बाढ़ का हालिया अनुभव बताता है कि अभूतपूर्व संकट के बीच भी समन्वित और तकनीक आधारित प्रबंधन से प्रभावित लोगों तक सहायता पहुंचाई जा सकती है।
प्रेम प्रकाश
बाढ़ का संकट अब केवल अत्यधिक बारिश या नदियों के उफान का परिणाम नहीं रह गया है। बदलती जलवायु, अनियोजित शहरीकरण, प्राकृतिक जलनिकासी तंत्र के सिकुड़ने, नदियों के बाढ़ क्षेत्र में बढ़ते निर्माण और जलग्रहण क्षेत्रों में बदलाव ने इसके खतरे को कहीं व्यापक बना दिया है। हर मानसून इसका नया भूगोल और तबाही का नया पैमाना सामने आता है। इस साल सात राज्य बाढ़ से प्रभावित हुए और केंद्र को राहत तथा त्वरित प्रतिक्रिया के लिए 2,117.85 करोड़ रुपये की अग्रिम सहायता जारी करनी पड़ी। बिहार में 23 सितंबर तक 50.49 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित बताए गए। ऐसे में चुनौती सिर्फ बाढ़ के बाद राहत और बचाव तक सीमित नहीं रह सकती। सवाल यह है कि क्या हमारा आपदा प्रबंधन बढ़ते जोखिम का पहले से आकलन कर, उसके असर को कम करने और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप तैयारी करने में सक्षम है।
फैलते शहर और बदलते मौसम का जटिल मेल
बाढ़ की भयावहता केवल पानी की ऊंचाई या डूबे गांवों से नहीं मापी जा सकती। इसके पीछे आबादी, गरीबी, बदलते भू उपयोग, नदी तंत्र में हस्तक्षेप, फैलते शहर और बदलते मौसम का जटिल मेल है। विश्व बैंक से जुड़े एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया में करीब 1.81 अरब लोग महत्वपूर्ण बाढ़ जोखिम वाले क्षेत्रों में रहते हैं। इनमें 1.24 अरब दक्षिण और पूर्वी एशिया में हैं तथा चीन और भारत अकेले वैश्विक जोखिम के एक तिहाई से अधिक से जुड़े हैं। भारत में बाढ़ का स्वरूप भी एक जैसा नहीं है। हिमालयी नदियों की बाढ़, मैदानी इलाकों का जलभराव, शहरी बाढ़ और तटीय संकट इसके अलग अलग रूप हैं। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार देश में 21.213 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ प्रभावित रहा है।
राहत और पुनर्वास का एकीकृत चक्र
इसलिए आपदा प्रबंधन को राहत तक सीमित रखने के बजाय जोखिम पहचान, पूर्व चेतावनी, त्वरित प्रतिक्रिया और पुनर्वास के एकीकृत चक्र में बदलना होगा। नई चुनौती अब केवल यह अनुमान लगाना नहीं है कि कितनी बारिश होगी, बल्कि यह जानना है कि उसका प्रभाव कहां, कितना और किन समुदायों पर पड़ेगा। मौसम विभाग ने जिला स्तर पर प्रभाव आधारित पूर्वानुमान और रंग आधारित चेतावनी प्रणाली को मजबूत किया है। जुलाई में ऊपरी असम के लिए सात दिन पहले भारी और बहुत भारी बारिश का पूर्वानुमान इसका उदाहरण है। लेकिन चेतावनी तभी जीवन बचाती है जब उसके साथ निकासी, संचार, राहत केंद्र, चिकित्सा और प्रशिक्षित स्थानीय तंत्र पहले से तैयार हो।
भारत में बाढ़ और नदी का रिश्ता
भारत में बाढ़ का एक बड़ा हिस्सा ऐसी नदियों से जुड़ा है, जिनका जलग्रहण क्षेत्र दूसरे राज्यों या दूसरे देशों में है। गंगा बेसिन इसका बड़ा उदाहरण है। हिमालयी नदियों में बारिश, ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र की स्थिति और जल प्रवाह का असर दूर तक मैदानी इलाकों में दिखाई देता है। इसलिए नदी को प्रशासनिक सीमाओं में बांटकर समाधान खोजना अधूरा प्रयास होगा। रियल टाइम आंकड़ों का साझा इस्तेमाल, जलाशयों का समन्वित संचालन, नदी प्रवाह की निगरानी और भारत तथा नेपाल के बीच सूचनाओं का तेज आदान प्रदान बाढ़ प्रबंधन का अनिवार्य हिस्सा बनना चाहिए।
इस वर्ष बाढ़ का अभूतपूर्व संकट
इस साल असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा और बिहार समेत कई राज्यों में बाढ़ ने व्यापक असर डाला है। प्रभावित आबादी और संकट के भौगोलिक विस्तार के लिहाज से बिहार का अनुभव विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा है। करीब 50 लाख लोगों को प्रभावित करने वाली इस बाढ़ ने राज्य के सामने राहत और बचाव के साथ बड़े पैमाने पर प्रभावित परिवारों तक सहायता पहुंचाने की चुनौती रखी।
बाढ़ आपदा प्रबंधन का सम्राट मॉडल
बिहार का इस साल का अनुभव इस बदलते बाढ़ परिदृश्य की एक महत्वपूर्ण केस स्टडी है। प्रदेश में राहत व्यवस्था में डीबीटी, सामुदायिक रसोई, राहत शिविर, नावों के जरिए आवागमन और चिकित्सा सहायता के साथ एसडीआरएफ तथा एनडीआरएफ की तैनाती को जोड़ा गया। 15 सितंबर तक 8.27 लाख प्रभावित परिवारों को 579.23 करोड़ रुपये की सहायता सीधे बैंक खातों में भेजे जाने की जानकारी दी गई थी। केंद्र और राज्य के स्तर पर राहत तथा बचाव की समीक्षा भी साथ साथ चलती रही। इस अनुभव से उभरता बिहार का सम्राट मॉडल यह संकेत देता है कि बड़े पैमाने की बाढ़ में राहत केवल बचाव अभियान नहीं हो सकती।
शहरों पर बढ़ी बाढ़ की मार
बाढ़ का तेजी से बदलता स्वरूप शहरों को भी अपनी जद में ले रहा है। यहां नदी का उफान ही संकट का कारण नहीं होता। कम समय में अत्यधिक बारिश, नालों की सीमित क्षमता, जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण, कंक्रीट से ढकी जमीन और सिकुड़ते जल निकाय भी शहरों को जलभराव की स्थिति में पहुंचा देते हैं। केंद्र ने शहरी बाढ़ जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत 18 शहरों के लिए दो चरणों में कुल 5,520.07 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता मंजूर की है। इसमें पटना, लखनऊ, कानपुर, जयपुर और गुवाहाटी जैसे शहर शामिल हैं। अच्छी बात यह है कि यह बात नीति निर्माता भी अच्छी तरह से समझ रहे हैं कि शहरों की मास्टर प्लानिंग में प्राकृतिक जलधाराओं, जलाशयों और बाढ़ मैदानों की सुरक्षा को केंद्रीय स्थान देना होगा। वर्षा जल को जमीन में उतारने की क्षमता बढ़ानी होगी और बड़े निर्माणों के साथ उनके जल निकासी प्रभाव का आकलन जरूरी करना होगा। शहरी बाढ़ प्रबंधन को नगर नियोजन का स्थायी हिस्सा बनाना होगा।
भारत में बाढ़ नियंत्रण और प्रबंधन पर दशकों से काम हो रहा है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार 20.538 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र को विभिन्न बाढ़ प्रबंधन उपायों से संरक्षित किया गया है। इसके बावजूद जोखिम बना हुआ है। इसका अर्थ है कि केवल संरचनात्मक उपाय पर्याप्त नहीं हैं।
बाढ़ एक, चुनौती दो
दरअसल, भारत के सामने आज चुनौती दोहरी है। एक ओर अत्यधिक वर्षा और बदलते मौसम का जोखिम बढ़ रहा है, दूसरी ओर आबादी और आर्थिक गतिविधियां ऐसे क्षेत्रों में फैल रही हैं जहां प्राकृतिक बाढ़ का खतरा मौजूद है। इसलिए बाढ़ प्रबंधन को आपदा आने पर सक्रिय होने वाली व्यवस्था के बजाय विकास नीति का स्थायी हिस्सा बनाना होगा। हर संवेदनशील जिले के पास बाढ़ जोखिम मानचित्र, हर नदी बेसिन के लिए साझा आंकड़ा तंत्र और हर शहर के पास जल निकासी की वास्तविक क्षमता का आकलन होना चाहिए। समुदायों को केवल चेतावनी नहीं, बल्कि उसके बाद उठाए जाने वाले कदमों की स्पष्ट जानकारी भी मिलनी चाहिए। बाढ़ को पूरी तरह रोकना संभव नहीं, लेकिन उसके नुकसान को कम किया जा सकता है। इस मानसून का सबसे बड़ा सबक यही है कि तैयारी को राहत से आगे बढ़ाकर जोखिम न्यूनीकरण तक ले जाना होगा। पूर्व चेतावनी, स्थानीय तैयारी, त्वरित प्रतिक्रिया और पुनर्वास का एकीकृत तंत्र ही सुरक्षित और टिकाऊ विकास की आधारशिला बन सकता है।





