दिलीप कुमार पाठक
हाल ही में अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क ने मुकेश अंबानी को संबोधित करते हुए भारत के प्रधानमंत्री पद पर तंज कसा। ऊपर से देखने में यह दो बड़े कारोबारियों के बीच की सामान्य बातचीत लग सकती है, लेकिन असल में यह भारत के सर्वोच्च लोकतांत्रिक पद की गरिमा पर किया गया एक गैर-जिम्मेदाराना हमला है। जब विदेश का कोई बिजनेसमैन भारत के शीर्ष नेतृत्व को लेकर इस तरह की हल्की टिप्पणी करता है, तो बात केवल एक व्यक्ति की नहीं रह जाती। यह सीधे तौर पर हमारे देश के सम्मान और उसकी संप्रभुता से जुड़ जाती है।
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद देश में एक बहस छिड़ गई है कि क्या भारत के प्रधानमंत्री को खुद सामने आकर ऐसे बयानों का जवाब देना चाहिए? इसका सीधा और साफ जवाब है – बिल्कुल नहीं। भारत 140 करोड़ से ज्यादा आबादी वाला देश है, दुनिया की सबसे पुरानी महान सभ्यताओं में से एक है और आज एक बड़ी आर्थिक ताकत है। ऐसे देश के प्रधानमंत्री का पद बहुत जिम्मेदारी और व्यस्तता वाला होता है। उनका काम देश चलाना है, न कि किसी विदेशी बिजनेसमैन या सोशल मीडिया स्टार के तंज पर रोज़ सफाई देना या उनके साथ बहस में उलझना।
लेकिन यहाँ असली सवाल यह उठता है कि अगर प्रधानमंत्री खुद जवाब नहीं दे रहे हैं, तो क्या इसका मतलब यह है कि पूरा देश चुप बैठ जाए? अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जब आप किसी टिप्पणी पर बिल्कुल चुप रह जाते हैं, तो लोग उसे आपकी कमजोरी या सहमति मान लेते हैं। यहीं पर हमारे विदेश मंत्रालय और दूसरे मंत्रियों की बड़ी लापरवाही सामने आती है। सच यह है कि पिछले कुछ समय से हमारा कूटनीतिक तंत्र काफी सुस्त और ज़रूरत से ज़्यादा दबकर काम कर रहा है। चाहे अमेरिकी नेताओं के उटपटांग बयान हों या डोनाल्ड ट्रंप की बिन-मांगे दी गई सलाह – हमारा विदेश मंत्रालय हर बार ‘संयम’ और ‘मर्यादा’ के नाम पर चुप्पी साध लेता है या फिर बहुत ढीला-ढाला जवाब देकर पल्ला झाड़ लेता है। हद से ज़्यादा संयम दिखाना भी सही नहीं होता, क्योंकि जब आप बार-बार चुप रहते हैं, तो सामने वाला आपकी शराफत को आपकी झिझक समझने लगता है। विदेश मंत्रालय की इसी ढिलाई का नतीजा है कि आज एलन मस्क जैसे उद्योगपतियों की भी इतनी हिम्मत हो गई कि वे भारत के पीएम पद पर तंज कसने लगे।
कूटनीति का मतलब सिर्फ बड़े-बड़े दौरों पर जाना या औपचारिक प्रेस नोट जारी करना नहीं होता। कूटनीति का असली काम देश के मान-सम्मान की रक्षा करना है। विदेश मंत्रालय और हमारे मंत्रियों को मस्क को तुरंत और सख्त लहजे में यह याद दिलाना चाहिए था कि वे सिर्फ एक बिजनेसमैन हैं, किसी देश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री नहीं। अपनी सीमा में रहकर बात करना ही उनके और उनके बिजनेस के लिए अच्छा है। बिजनेस करने और किसी देश की राजनीति पर तंज कसने के बीच एक दायरा होता है, और किसी भी धनकुबेर को वह दायरा लांघने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। अमेरिका को भी यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि भारत के साथ रिश्ते बराबरी और सम्मान के दम पर ही आगे बढ़ सकते हैं। कोई भी बिजनेसमैन कितना भी अमीर क्यों न हो, उसे किसी दूसरे देश के लोकतांत्रिक पदों का मज़ाक उड़ाने का हक नहीं मिल जाता।
निष्कर्ष बहुत सीधा है – भारत को हर उकसावे और हर तंज का मुंहतोड़ जवाब देना ही होगा। लेकिन इस काम के लिए हर बार पीएम ही सामने आएं, यह बिल्कुल ज़रूरी नहीं है। इसके लिए हमारे पास पूरा विदेश मंत्रालय है और कई ज़िम्मेदार मंत्री हैं। हमारे मंत्रियों को अपनी इस सुस्ती को छोड़ना होगा और आगे आकर मस्क जैसे लोगों को साफ और कड़े शब्दों में समझाना होगा कि वे उद्योगपति हैं, तो उद्योगपति बनकर ही रहें। जब तक हमारा शासन तंत्र हर स्तर पर अपनी बात मजबूती से नहीं रखेगा, तब तक दुनिया के मंचों पर ऐसे गैर-जिम्मेदाराना बयानों का सिलसिला रुकने वाला नहीं है।





