संजय सक्सेना
देश की राजनीति में इन दिनों एक ही शब्द गूंज रहा है, वोट चोर, गद्दी छोड़। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बहाने विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा करने का अभियान छेड़ रखा है, जिसमें मोदी सरकार पर आरोप लगाया जाता है कि वोट चोरी मोदी सरकार के संरक्षण में हो रही है। वोट चोरी के नारे सड़क से संसद तक गूंज रहे हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस हैं, यात्राएं हैं और सोशल मीडिया पर आरोपों की झड़ी है। इस हंगामे के सबसे आगे राहुल गांधी चल रहे हैं। वहीं विपक्ष की नजर में एक राहुल की लगातार हार की हताशा है, पर इस शोर के बीच एक सीधा सवाल बार-बार लौटता है, सबूत कहाँ हैं? लोकतंत्र में आरोप लगाना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन आरोप की गंभीरता के अनुपात में प्रमाण देना उसकी जिम्मेदारी भी है। वोट चोरी कोई मामूली आरोप नहीं है। यह उस पूरी चुनावी प्रक्रिया की वैधता पर प्रश्नचिह्न है, जिसके जरिए करोड़ों लोग अपनी सरकार चुनते हैं। ऐसे आरोप के लिए ठोस आंकड़े, विधानसभा या बूथवार सूचियां, प्रभावित मतदाताओं के नाम और शपथपत्र चाहिए। आलोचकों का कहना है कि इन मोर्चों पर विपक्ष की झोली लगभग खाली है।सत्ता पक्ष के समर्थकों का तर्क है कि घटनाक्रम खुद इसकी गवाही देता है। बताया गया कि करीब एक साल से आरोप लगा रहे विपक्षी नेता जब राष्ट्रपति को ज्ञापन देने पहुंचे, तो ज्ञापन के साथ कोई प्रमाण नहीं था। कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति ने प्रमाण लाने को कहा और विपक्ष ने जल्द सबूत सौंपने का वादा किया, पर अब तक कुछ सामने नहीं आया। राहुल गांधी और उनके सहयोगियों ने प्रधान न्यायाधीश से मिलने का समय भी मांगा, पर वह मुलाकात नहीं हुई। इस तर्क के अनुसार, जो नेता हर मंच से सबूत होने का दावा करते हैं, वे संवैधानिक संस्थाओं के सामने उन्हें रखने से कतराते हैं।
सबसे विरोधाभासी तस्वीर यह है कि जिस मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सड़क पर नारे लगाए जा रहे हैं, उनसे आमने-सामने बैठकर बात करने में विपक्ष की दिलचस्पी नहीं दिखती। आयोग के पास दावे-आपत्ति की औपचारिक व्यवस्था है। मतदाता सूची के प्रारूप प्रकाशित होते हैं, आपत्तियां दर्ज की जाती हैं और सुनवाई होती है। कानून की भाषा में बात करने का रास्ता खुला है। आलोचक पूछते हैं कि जब चुनाव आयोग के दरवाजे और अदालतें खुली हैं, तो विपक्ष शिकायतों को दस्तावेज की शक्ल देने के बजाय माइक पर क्यों उतारता है।तमाम किंतु-परंतु के बीच एसआईआर की मूल अवधारणा पर भी गौर करना चाहिए। मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण कोई नई बात नहीं है। देश में पहले भी ऐसे पुनरीक्षण होते रहे हैं। शहरों की ओर पलायन, शादी के बाद स्थानांतरण, मृत्यु और एक से अधिक जगह नाम दर्ज होने जैसे कारणों से सूचियों में गड़बड़ियां आम हैं। सूची की सफाई का मकसद यही है कि हर वैध मतदाता का नाम रहे और हर अवैध प्रविष्टि हटे। इस नजरिए से देखें तो नाम कटने की हर खबर चोरी नहीं होती। उसका एक बड़ा हिस्सा सूची के शुद्धिकरण का नतीजा हो सकता है।यहीं वह लाख टके का सवाल आता है, जो आलोचक उठाते हैं। विपक्ष यह मानकर क्यों चल रहा है कि जिनके नाम कटे हैं, वे उसी के वोटर हैं? मतदाता सूची में मृत व्यक्ति, स्थान बदल चुके लोग और दोहरी प्रविष्टियां हर दल के समर्थकों में होती हैं। मतदाता अपनी पसंद बताकर वोट नहीं डालता, इसलिए किसी सूची से हटे नाम का राजनीतिक रंग तय करना खुद एक अप्रमाणित धारणा है। अगर विपक्ष के पास ऐसा कोई विश्लेषण है, जो दिखाए कि कटे नाम किसी खास समुदाय या पार्टी के समर्थकों के हैं, तो उसे सार्वजनिक करना चाहिए।
अभी तक जो रखा गया है, वह निष्कर्ष ज्यादा है और प्रमाण कम।इस पर आलोचकों के मुताबिक, इसका जवाब राजनीति के गणित में छिपा है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, ममता बनर्जी की तृणमूल और लालू यादव का राजद, इन सबकी चुनावी सियासत में मुस्लिम मतदाता एक मजबूत स्तंभ हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कई सीटों के नतीजे इस वोट के रुझान पर निर्भर करते हैं। इस पक्ष का तर्क है कि एसआईआर पर हंगामे का असली मकसद इसी वोट बैंक को यह संदेश देना है कि हम तुम्हारे रहनुमा हैं और तुम्हारे नाम काटे जा रहे हैं। माहौल ऐसा बनाया जा रहा है, वे कहते हैं, मानो सूची से सिर्फ मुस्लिम नाम हटे हों और विपक्ष ही अकेला उनका संरक्षक हो। यानी यह लड़ाई मतदाता सूची की पारदर्शिता से ज्यादा मुस्लिम वोट बैंक की सियासत की है।चुनावी मौसम में उत्तर प्रदेश के संदर्भ में यह रणनीति और साफ दिखती है। सपा और कांग्रेस दोनों इसी वोट की साझा दावेदारी के लिए संघर्ष करती रहती हैं। जो भी इस समुदाय का भरोसा जीत ले, उसे सीटों का बड़ा लाभ मिल सकता है। ऐसे में आपका वोट खतरे में है का नारा एक भावनात्मक एकजुटता पैदा करने का औजार बन जाता है। आलोचकों का कहना है कि यही बयानबाजी आगे चलकर विधानसभा चुनावों में ध्रुवीकृत मतदान की जमीन तैयार करती है।
बिहार और बंगाल में भी यही कोशिश दिखती है।इस रणनीति की एक कीमत भी है। संवैधानिक संस्थाओं पर बार-बार बिना प्रमाण के हमला करने से उनकी साख को चोट पहुंचती है। अगर कल सचमुच कोई गड़बड़ी सामने आए, तब तक भेड़िया आया वाली कहानी का असर कमजोर हो चुका होगा। जिन मतदाताओं में डर बैठाया जा रहा है, उन्हें भी अंततः यही चाहिए कि उनका नाम सूची में रहे। इसके लिए जरूरी है कि राजनीतिक दल आगे बढ़कर बूथ स्तर पर फॉर्म भरवाने और आपत्तियां दर्ज कराने में मदद करें, न कि सिर्फ नारेबाजी करें।सवाल यह भी है कि अगर विपक्ष के पास वाकई प्रमाण हैं, तो वह उन्हें अदालत, आयोग या राष्ट्रपति के सामने क्यों नहीं रखता। देश की जनता अब नारों से ज्यादा तथ्य सुनना चाहती है। जिस दिन विपक्ष दस्तावेजों के साथ सामने आएगा, उस दिन बहस का स्तर बदलेगा। तब तक यह धारणा बनी रहेगी कि “वोट चोरी” का मुद्दा चुनावी सुधार से ज्यादा चुनावी समीकरण साधने का हथियार है। विपक्ष का कहना है कि सूचियों के आंकड़े और नाम कटने के पैटर्न चुनाव आयोग के पास हैं और वे पूरी मशीन-पठनीय सूचियां व पारदर्शिता मांग रहे हैं। उनका तर्क है कि इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाने की प्रक्रिया, दस्तावेज मांगने की शर्तें और कम समय सीमा से गरीब, प्रवासी और अल्पसंख्यक मतदाता ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं, और इस पर सवाल उठाना उनका लोकतांत्रिक हक है। कई मामले अदालतों में भी पहुंचे हैं। चुनाव आयोग इन आशंकाओं को खारिज करता है और कहता है कि प्रक्रिया नियमों के तहत और निष्पक्ष है। अंतिम तस्वीर अदालती फैसलों और ठोस आंकड़ों से ही साफ होगी।




