अशोक भाटिया
भारतीय लोकतंत्र का सबसे मजबूत खंभा उसकी निष्पक्ष चुनाव प्रणाली रही है। वैश्विक पटल पर जब भी भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता की मिसाल दी जाती है, तो निर्वाचन सदन यानी भारत निर्वाचन आयोग की भूमिका को अग्रिम पंक्ति में रखा जाता है। किंतु, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर वर्तमान में जो अभूतपूर्व राजनीतिक और संवैधानिक गतिरोध पैदा हुआ है, उसने इस प्रतिष्ठित संस्था की निष्पक्षता को इतिहास के सबसे गंभीर दोराहे पर ला खड़ा किया है। देश की राजनीति इस समय इस सवाल को लेकर सुलग रही है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांगना कांग्रेस और समूचे विपक्ष की एक सैद्धांतिक लड़ाई है, या फिर यह उनकी सोची-समझी राजनीतिक विवशता और नैरेटिव सेट करने की मजबूरी का हिस्सा है? केरल विधानसभा द्वारा देश के इतिहास में पहली बार किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए प्रस्ताव पारित करना और कांग्रेस द्वारा सड़कों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मोर्चा खोलना यह दर्शाता है कि यह विवाद महज एक प्रशासनिक विसंगति नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक संग्राम का रूप ले चुका है।
इस विवाद की शुरुआत ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक खोजी रिपोर्ट से हुई, जिसने निर्वाचन आयोग के भीतर के बंद दरवाजों के मतभेदों को सार्वजनिक कर दिया। रिपोर्ट के अनुसार, मतदाता सूची के व्यापक पुनरीक्षण यानी ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ को लेकर आयोग के भीतर ही गहरा बिखराव था। दावा किया गया कि अन्य दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों में मतदाता सूची से नाम हटाने, नए नाम जोड़ने और डेटा प्रबंधन की प्रक्रियाओं पर करीब 14 बार औपचारिक और लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं। लोकतंत्र का स्थापित नियम और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस यह स्पष्ट करती हैं कि निर्वाचन आयोग में कोई भी निर्णय बहुमत या सर्वसम्मति से होना चाहिए। विपक्ष का सीधा आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अन्य आयुक्तों की चिंताओं और आपत्तियों को दरकिनार करते हुए एकतरफा फैसले लिए। जब किसी संवैधानिक संस्था के भीतर ही इस स्तर का आंतरिक असंतोष और अविश्वास सतह पर आ जाए, तो उसकी साख पर उंगलियां उठना स्वाभाविक है।
विपक्ष के इस उग्र आंदोलन के केंद्र में ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ की प्रक्रिया है। इस कवायद के तहत देश के 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों से लगभग 13.30 करोड़ नामों को हटा दिया गया है, जो भारत के कुल मतदाता वर्ग का लगभग 13 प्रतिशत है। चुनाव आयोग का तर्क है कि यह प्रक्रिया बोगस, दोहरे और अपात्र मतदाताओं को हटाने तथा सूची को शुद्ध करने के लिए की गई वैधानिक प्रशासनिक कार्रवाई है। इसके विपरीत, कांग्रेस के संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इसे “कृत्रिम हेरफेर” और “वोट चोरी” की संज्ञा दे रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए जानबूझकर एक निश्चित वर्ग और विपक्ष के पारंपरिक झुकाव वाले मतदाताओं के नाम काटे गए हैं ताकि आगामी चुनावों के परिणामों को प्रभावित किया जा सके। राहुल गांधी का दिल्ली की सड़कों पर प्रदर्शन, police द्वारा उन्हें हिरासत में लिया जाना और शशि थरूर जैसे नेताओं द्वारा संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाने की चेतावनी यह स्पष्ट करती है कि विपक्ष इस मुद्दे को तार्किक परिणति तक ले जाने के लिए आमादा है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प और सूक्ष्म पहलू यह है कि आखिर कांग्रेस ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर इस कदर क्यों अड़ी है? क्या ज्ञानेश कुमार का पद से हट जाना ही इस समस्या का अंतिम समाधान है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस आक्रामक रुख के पीछे कांग्रेस की रणनीतिक और राजनीतिक मजबूरियां छिपी हुई हैं। लगातार चुनावी चुनौतियों और कई राज्यों में सत्ता से बाहर रहने के बाद, कांग्रेस के लिए अपने कार्यकर्ताओं के भीतर यह विश्वास जगाना जरूरी है कि उनकी वैचारिक या सांगठनिक कमजोरी के कारण पराजय नहीं हो रही है। ज्ञानेश कुमार पर सीधा और तीखा हमला करके राहुल गांधी देश के मानस में यह नैरेटिव सेट करने में सफल हो रहे हैं कि “हम चुनाव मैदान में परास्त नहीं हो रहे, बल्कि सरकारी मशीनरी और चुनाव आयोग के तंत्र का दुरुपयोग करके हमें जानबूझकर हरवाया जा रहा है”। यदि भविष्य में ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दे देते हैं, तो विपक्ष इसे अपनी बहुत बड़ी नैतिक जीत बताएगा और यह साबित करने की कोशिश करेगा कि पूरी चुनावी प्रक्रिया ही दूषित थी।
इसके साथ ही, विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के भीतर समय-समय पर क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के बीच वैचारिक और सीटों के बंटवारे को लेकर अंतर्विरोध उभरते रहते हैं। ऐसे समय में भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक साझा, राष्ट्रीय और भावनात्मक रूप से संवेदनशील मुद्दे की आवश्यकता होती है। ‘मतदाता के अधिकार’ और ‘वोट की चोरी’ एक ऐसा संवेदनशील विषय है, जिस पर वामपंथी दलों, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक और आम आदमी पार्टी समेत पूरा विपक्ष आंख मूंदकर एक सुर में खड़ा हो सकता है। कांग्रेस के लिए इस आंदोलन का नेतृत्व करना गठबंधन के भीतर अपनी धुरी वाली भूमिका को बनाए रखने की विवशता भी है।
इसके अतिरिक्त, राहुल गांधी ने 2023 में पारित उस कानून (मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023) की धारा 16 को विशेष रूप से निशाने पर लिया है, जो चुनाव आयुक्तों को उनकी सेवा के दौरान और बाद में किसी भी कानूनी जांच या अदालती कार्यवाही से पूर्ण उन्मुक्ति (ब्लैकेट इम्युनिटी) प्रदान करता है। विशेषज्ञों ने भी सवाल उठाए हैं कि ऐसा संरक्षण तो राष्ट्रपति या सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को भी प्राप्त नहीं है। कांग्रेस इस सुरक्षा कवच को लोकतांत्रिक जवाबदेही के सिद्धांत के खिलाफ बताकर सरकार की मंशा पर सीधे सवाल उठा रही है।
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और सरकार ने विपक्ष के इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे ‘हार के डर से पैदा हुई हताशा’ करार दिया है। भाजपा का तर्क है कि चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है, जहां विचारों की भिन्नता और आंतरिक आपत्तियां एक स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र का प्रमाण हैं, न कि किसी साजिश का हिस्सा। लाखों बूथ लेवल अधिकारियों द्वारा घर-घर जाकर किए गए सत्यापन को ‘वोट चोरी’ कहना उन जमीनी कर्मचारियों के परिश्रम का अपमान है।
इसके अलावा, संवैधानिक दृष्टिकोण से देखें तो मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाना कोई सरल खेल नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को (यानी संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से महाभियोग प्रस्ताव पारित करके)। वर्तमान संसद के संख्या बल को देखते हुए विपक्ष के लिए महाभियोग को तार्किक परिणति तक पहुंचाना व्यावहारिक रूप से असंभव है। इसके बावजूद, यदि विपक्ष सड़कों पर पुतले फूंक रहा है और संसद ठप करने की चेतावनी दे रहा है, तो उसका लक्ष्य ज्ञानेश कुमार को हटाना कम, बल्कि उनके बहाने सरकार को जन-अदालत में कटघरे में खड़ा करना ज्यादा है।
अब यह गंभीर और संवेदनशील विवाद देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल निलंबित करने के अंतरिम आदेश से तो इनकार कर दिया है, लेकिन केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। माननीय अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि आयोग के भीतर आम सहमति या बहुमत के नियमों की अनदेखी कर एकतरफा फैसले लेने के साक्ष्य मिलते हैं, तो न्यायालय उन फैसलों की समीक्षा करने या उन्हें वापस लेने पर विचार कर सकता है। यह रुख इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका इस संस्था की आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर गंभीर है।
अंततः, लोकतंत्र केवल संख्याओं, बहुमत के आंकड़ों या संसद की सीटों का जोड़-घटाव नहीं है। लोकतंत्र की आत्मा देश की संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और उन संस्थाओं के प्रति आम नागरिक के अटूट विश्वास में बसती है। यदि मुख्य चुनाव आयुक्त और मतदाता सूची की पूरी प्रक्रिया ही हर चुनाव से पहले संदेह के कोहरे में घिर जाएगी, तो जनता का इस पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था से ही भरोसा उठ जाएगा। ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा भले ही कांग्रेस के लिए चुनावी नैरेटिव की एक ‘मजबूरी’ हो, लेकिन चुनाव आयोग की आंतरिक शुचिता और पारदर्शिता को बहाल करना भारतीय लोकतंत्र की ‘महती आवश्यकता’ है। इस राजनीतिक संग्राम का निपटारा सड़कों के कोलाहल या राजनीतिक पुतले फूंकने से नहीं, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत में साक्ष्यों और संवैधानिक मर्यादाओं के दायरे में ही होना चाहिए, ताकि निर्वाचन आयोग की धवल चादर पर लगा यह दाग साफ हो सके।





