तनवीर जाफ़री
इन दिनों जहाँ देश के विभिन्न भागों में अनेक मुद्दों पर होने वाले आन्दोलनों का विस्तार होता जा रहा है वहीं इन आंदलनों के बीच सरकार की ओर से भी विपक्ष को कोई न कोई ऐसे नये मुद्दे ‘परोस ‘ दिए जाते हैं जिससे आंदोलन की आग शांत होने के बजाये और भी भड़क उठती है। उसके बाद जब विपक्ष इन मुद्दों को ‘लपकता’ है तो सत्ताधारी यह विलाप करने लगते हैं कि ‘विपक्ष यह सब कुछ केवल सत्ता हासिल करने के लिए कर रहा है’। आज के सत्ताधारी यह भूल जाते हैं कि गुजरात से लेकर दिल्ली तक की सत्ता में आने के लिए इन्होंने आख़िर कौन से हथकंडे नहीं अपनाये ? साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण,दंगे फ़साद,जातिवाद,लोभ लालच,यू पी ए की सरकार को बदनाम करने के लिये उनपर झूठे आरोप मढ़ना ,देश की जनता से झूठे वादे करना, कभी मंहगाई को लेकर तो कभी भ्रष्टाचार को लेकर संसद से लेकर सड़कों तक जमकर हंगामा करना,संसद को चलने में बाधा डालना,अन्ना आंदोलन का पिछले दरवाज़े से समर्थन कर सत्ता झटकने का षड़यंत्र रचना,कांग्रेस व पार्टी के अनेक बड़े नेताओं को बदनाम करना व उनपर झूठे लांछन लगाना, चंद पूंजीपतियों से सांठ गाँठ कर चुनावी लाभ लेना आदि क्या नहीं किया गया यू पी ए से सत्ता लेने के लिये। मनमोहन सिंह जैसे विश्व स्तरीय नेता व कांग्रेस नेताओं जवाहरलाल नेहरू से लेकर सोनिया गाँधी व राहुल गाँधी तक के लिये कैसी कैसी घटिया बातें की गयीं।
परन्तु जब आज देश इनकी हक़ीक़त समझ चुका है,इनके शासनकाल में देश के युवाओं,आम लोगों व महिलाओं को अपना भविष्य असुरक्षित नज़र आ रहा है और वही वर्ग किसी न किसी जायज़ मांग को लेकर आंदोलनरत है और विपक्ष ख़ासकर कांग्रेस व इण्डिया गठबंधन उन आंदोलनों को समर्थन दे रहा है तो इन्हीं सत्तधारियों को तकलीफ़ हो रही है। आज अगर प्रशांत भूषण जैसे व्यक्ति के मुंह से एक पत्रकार सम्मलेन में यह निकलता है कि हम ‘रेजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन चाहते हैं तो इन्हें यह शब्द इतने बुरे लगे कि हंगामा बरपा कर दिया। भाजपा ने आरोप लगाया कि प्रशांत भूषण के इस बयान से साफ़ हो गया है कि राहुल गांधी का पूरा ‘इको सिस्टम’ देश में अराजकता फैलाने और लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने की साज़िश में लगा हुआ है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि इस बयान ने प्रदर्शनकारियों और विपक्ष के असली “एजेंडे को पूरी तरह स्पष्ट” कर दिया है। सत्ताधारियों की तरफ़ से आये इसतरह के बयान के बाद सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर भी तीखी बहस छिड़ गई और सरकार के समर्थकों द्वारा ‘India Needs Modi’ जैसे हैशटैग ट्रेंड कराए जाने लगे। परन्तु जब नरेंद्र मोदी जनसभा में यू पी ए की सत्ता उखाड़ फेंकने के लिये जनता को उकसायें तो कोई बात नहीं ? या मोदी जब कांग्रेस मुक्त भारत की बात करें तो वह सब ठीक है ?
जिस सरकार के नेताओं को ‘सत्ता परिवर्तन’ जैसे शब्द इतने बुरे लगे उसे यह भी सोचना चाहिए कि धरना प्रदर्शन रोकने के लिये ट्रेन,मेट्रो,स्कूल कॉलेज,बसें आदि बंद करने व जनता को इससे होने वाली परेशानियों पर क्या विपक्ष अपनी आँखें मूंदकर बैठा रहे ? सरकार की पुलिस निहत्थे लोगों को सिर्फ़ इसलिये बर्बरता से पीटे कि वे लोकतान्त्रिक देश में अपने हक़ की आवाज़ क्यों बुलंद कर रहे हैं तो क्या विपक्ष तमाशाई बना रहे ? परीक्षा के पेपर लीक पर लीक होते रहें, बच्चों का भविष्य अंधकार में डूबा रहे और विपक्ष कुछ न बोले ? पैलेट गन चलाकर प्रदर्शनकारियों की जान से खिलवाड़ किया जाये और दोषी व्यक्ति के विरुद एफ़ आई आर भी न हो तो क्या विपक्ष ख़ामोश रहे ? वोट चोरी के सुबूत पर सुबूत पेश किये जा रहे हैं,चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। ऐसे में सत्ता तो भ्रष्ट चुनाव आयोग के समर्थन में खड़ी हो जाये परन्तु यदि विपक्ष कुछ बोले या सत्ता व चुनाव आयोग नेटवर्क को बेनक़ाब करे तो कहा जाये कि यह विपक्ष सत्ता हासिल करने के लिए कर रहा है या विपक्ष अराजकता फैला रहा है? एस आई आर के बहाने 13 करोड़ से अधिक लोगों के नाम मतदाता सूची से काट दिये जायें और विपक्ष तालियां बजाता रहे, यह आख़िर कैसे हो सकता है? सत्ता समर्थक गुंडे बदमाश सादे लिबास में या बिना पहचान की पुलिस की वर्दी में प्रदर्शनकारियों को पीटें अपमानित करें बहनों की इज़्ज़त से खिलवाड़ करें और विपक्ष ख़ामोश रहे ? यह कैसे संभव है। धरने प्रदर्शन से भयभीत सरकार, विरोध प्रदर्शनों को सत्ता के दरवाज़े यानी जंतर मंतर से दूर करने की साज़िश करे और सरकार जंतर मंतर पर प्रदर्शन प्रबंधित कर दे परन्तु विपक्ष कुछ न बोले यह कैसे हो सकता है ? दिल्ली का जंतर-मंतर ही नहीं बल्कि लंदन का पार्लियामेंट स्क्वायर या अमेरिका का ला फ़ायेट स्क्वायर तथा और भी दर्जनों लोकतान्त्रिक देशों में प्रदर्शन स्थल सत्ता के केंद्र से बिलकुल क़रीब इसी लिये बनाये जाते हैं ताकि वहां लोग इकट्ठा होकर अपने हक़ की बात करते हुये सत्ता के ख़िलाफ़ अपना विरोध दर्ज करा सकें।
और सरकार ने बेशर्मी की हद तो पिछले दिनों उस समय पार कर दी जबकि उसने आर एस एस के एक नेता दुष्यंत कुमार गौतम की सिक्किम के राज्यपाल पद पर नियुक्ति कर डाली। यह दुष्यंत कुमार गौतम वही व्यक्ति है जिसका नाम 2022 में उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी की हत्या के मामले में उस वी आई पी के रूप में सामने आया था जिसके साथ रात गुज़ारने से अंकिता भंडारी ने इंकार कर दिया था। जिसके बाद उसकी लाश एक नहर में फंसी हुई मिली थी। इसी मामले में बीजेपी नेता विनोद आर्य के बेटे पुलकित आर्य को उम्र क़ैद भी हुई थी । हालांकि पुलिस ने तो वी आई पी के रूप में किसी का नाम उजागर नहीं किया परन्तु स्वयं बीजेपी के अपने नेताओं ने ही पिछले साल दुष्यंत गौतम का नाम उजागर कर दिया। उस समय भी पूरे उत्तराखंड में जनता सड़कों पर उतर आई थी । उसी समय यानी जनवरी 2026 में सी बी आई जांच की घोषणा की गई। लेकिन दस महीने बाद भी जांच आगे नहीं बढ़ी। बल्कि 12 अक्टूबर को दुष्यंत गौतम को सिक्किम का राज्यपाल बना कर जाँच के दायरे से बाहर कर दिया। क्योंकि राज्यपाल को संवैधानिक प्रतिरक्षा प्राप्त होती है और सी बी आई या एस आई टी उनसे पूछताछ नहीं कर सकती है। लिहाज़ा उसे राज्यपाल बनाने के लिए गृह मंत्रालय और आई बी ने दुष्यंत गौतम को चुपचाप क्लीन चिट भी दे दी। अंकिता भंडारी के ग़रीब व दुखी मां बाप सरकार से यही पूछने दिल्ली आये कि उसकी बेटी की हत्या का मुख्य कारण बने व्यक्ति को राज्यपाल कैसे बना दिया गया ? सिक्किम के लोग भी उसे गवर्नर बनाये जाने का विरोध करते हुए सड़कों पर उतरे हुए हैं। परन्तु पुलिस ने पूरी ‘मुस्तैदी ‘ दिखते हुये अंकिता के मां बाप को इण्डिया गेट से सुबह 4 बजे गिरफ़्तार कर लिया। क्या उस पीड़ित परिवार के साथ कांग्रेस का या राहुल प्रियंका या अन्य कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का खड़े होना गुनाह है ? दरअसल सत्ता की ओर से किये जा रहे इस तरह के अत्याचार और तानाशाही अपने आप में सत्ता परिवर्तन के ही लक्षण हैं।




