ललित गर्ग
कोलकाता में दुर्गापूजा के दौरान चोरबागान के सार्वजनिक पूजा पंडाल में हुई भगदड़ और उसमें 19 लोगों की मौत तथा 25 से अधिक लोगों के घायल होने की खबर ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। यह केवल एक हादसा नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक संवेदनहीनता, प्रशासनिक लापरवाही और धार्मिक आयोजनों के प्रति गैर-जिम्मेदार दृष्टिकोण पर लगा एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। जिन पंडालों में लोग श्रद्धा, भक्ति, उल्लास और आध्यात्मिक शांति की तलाश में पहुंचते हैं, वहां यदि उन्हें जीवन की सुरक्षा का भरोसा भी न मिले, तो इससे बड़ी विडंबना क्या होगी? मां दुर्गा की आराधना शक्ति, साहस और अन्याय के विनाश का प्रतीक है, लेकिन उसी आराधना के बीच निर्दोष लोगों की सांसें थम जाएं, तो हमें अपने आयोजन, अपनी व्यवस्थाओं और अपनी प्राथमिकताओं पर गंभीरता से विचार करना ही होगा। आखिर आस्था के इस सैलाब में इंसानी जिंदगियां कब तक बहती रहेंगी? सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि हादसा कैसे हुआ, बल्कि यह है कि हादसे होने ही क्यों दिए जाते हैं? देश में धार्मिक मेलों, मंदिरों, तीर्थस्थलों, उत्सवों और राजनीतिक रैलियों में भगदड़ की घटनाएं बार-बार सामने आती रही हैं। हर बार कुछ परिवारों के घरों के चिराग बुझ जाते हैं, बच्चों के सिर से माता-पिता का साया उठ जाता है, किसी मां की गोद सूनी हो जाती है और किसी जीवनसाथी का संसार उजड़ जाता है। कुछ समय तक शोक, संवेदना, मुआवजे और जांच की खबरें सुर्खियों में रहती हैं, फिर सब कुछ सामान्य होने लगता है। व्यवस्थाएं जस की तस बनी रहती हैं और अगली त्रासदी का इंतजार शुरू हो जाता है। क्या हमारी व्यवस्था की संवेदनशीलता केवल हादसे के बाद जागने तक सीमित रह गई है? क्या मानवीय जीवन का मूल्य किसी आर्थिक सहायता या सरकारी घोषणा से चुकाया जा सकता है? आखिर सनातन की गौरवमय संस्कृति को धुंधलाने की इन त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण घटनाओं के लेकर हम कब चेतेंगे?
किसी भी हादसे में मृतकों के परिजनों को आर्थिक सहायता देना आवश्यक है। संकट की घड़ी में सरकार का सहयोग प्रभावित परिवारों को संबल देता है, लेकिन मुआवजा किसी की जिंदगी वापस नहीं ला सकता। एक परिवार की आर्थिक क्षति की भरपाई संभवतः धन से हो जाए, मगर उस मां के आंसुओं का मूल्य कौन चुकाएगा, जिसने अपने जवान बेटे को खो दिया? उस बच्चे के भय और खालीपन को कौन भरेगा, जिसने भीड़ में अपने माता-पिता को हमेशा के लिए खो दिया? इसलिए सरकारों की जिम्मेदारी केवल राहत राशि घोषित करना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियां पैदा होने से पहले रोकना है, जिनमें नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़े। मृत्यु के बाद मुआवजा देना शासन का मानवीय दायित्व है, लेकिन मृत्यु से पहले सुरक्षा सुनिश्चित करना उसका अनिवार्य कर्तव्य है। धार्मिक आयोजनों की भव्यता और लोकप्रियता के साथ एक अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी बढ़ती दिखाई देती है। विशाल पंडाल, आकर्षक सजावट, भव्य प्रतिमाएं, रोशनी, प्रचार और अधिकाधिक श्रद्धालुओं की उपस्थिति को आयोजन की सफलता का पैमाना मान लिया जाता है। लेकिन क्या किसी आयोजन की सफलता का मूल्यांकन केवल वहां उमड़ने वाली भीड़ से होना चाहिए? क्या आयोजकों और समितियों को यह नहीं समझना चाहिए कि श्रद्धालुओं की संख्या जितनी अधिक होगी, उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होगी? संकरी गलियों, सीमित निकास द्वारों, अवरुद्ध रास्तों और अपर्याप्त सुरक्षा व्यवस्थाओं के बीच हजारों लोगों को प्रवेश देना उत्सव की सफलता नहीं, बल्कि एक संभावित त्रासदी को आमंत्रण देना है।
कोलकाता की घटना ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि भीड़ प्रबंधन कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि जीवन रक्षा की अनिवार्य व्यवस्था है। किसी भी बड़े धार्मिक आयोजन से पहले स्थल की क्षमता का वैज्ञानिक आकलन होना चाहिए। प्रवेश और निकास के रास्ते अलग-अलग तथा पर्याप्त चौड़े हों, आपातकालीन निकास स्पष्ट रूप से चिह्नित हों, भीड़ की आवाजाही एक दिशा में नियंत्रित की जाए और प्रशिक्षित कर्मियों की पर्याप्त तैनाती हो। सीसीटीवी, सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली, चिकित्सा सहायता, एंबुलेंस तथा अग्निशमन सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। बारिश, बिजली बाधित होने, अचानक अफवाह फैलने या किसी अप्रत्याशित घोषणा से भीड़ का व्यवहार बदल सकता है। इसलिए हर आयोजन में आपातकालीन योजना, नियमित अभ्यास और त्वरित प्रतिक्रिया की व्यवस्था होनी चाहिए। सुरक्षा की तैयारी हादसे के बाद नहीं, आयोजन की योजना बनाते समय शुरू होनी चाहिए। इस पूरे परिदृश्य में प्रशासन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। पुलिस और स्थानीय प्रशासन को केवल अनुमति जारी करने अथवा आयोजन के दौरान औपचारिक निरीक्षण करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अनुमति से पहले स्थल का निरीक्षण, भीड़ की संभावित संख्या का आकलन, सुरक्षा मानकों की जांच और निकास मार्गों की उपलब्धता का सत्यापन अनिवार्य होना चाहिए। निर्धारित क्षमता से अधिक लोगों को प्रवेश देने पर तत्काल रोक लगाई जाए। नियमों का उल्लंघन करने वाले आयोजकों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो और यदि जांच में अधिकारियों की लापरवाही सामने आए, तो उनकी जवाबदेही भी तय की जाए। किसी समिति का प्रभाव, किसी आयोजक की प्रतिष्ठा या किसी उत्सव की लोकप्रियता कानून और नागरिक सुरक्षा से ऊपर नहीं हो सकती। जवाबदेही के बिना सुरक्षा केवल कागजी घोषणा बनकर रह जाती है।
साथ ही यह मान लेना भी उचित नहीं कि हर भगदड़ का कारण केवल प्रशासनिक विफलता है। कई बार अफवाह, धक्का-मुक्की, अचानक आगे बढ़ने की प्रवृत्ति और दूसरों की सुरक्षा की चिंता किए बिना स्वयं निकलने की कोशिश भी स्थिति को भयावह बना देती है। इसलिए आम नागरिकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। धार्मिक स्थल पर पहुंचकर संयम बनाए रखना, निर्धारित मार्गों का पालन करना, धक्का न देना, बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखना तथा आधिकारिक निर्देशों को सुनना आवश्यक है। यदि भीड़ असामान्य रूप से घनी हो जाए, तो आगे बढ़ने की जिद करने के बजाय सुरक्षित स्थान पर रुकना और निर्देशों का पालन करना चाहिए। आयोजकों को भी श्रद्धालुओं के बीच जागरूकता फैलानी चाहिए कि भक्ति का अर्थ अव्यवस्था नहीं, बल्कि अनुशासन और दूसरों के जीवन के प्रति सम्मान है। हमारे धर्म और संस्कृति का मूल संदेश करुणा, अहिंसा, सेवा और जीवन के प्रति आदर है। पूजा-पाठ का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक है, जब हमारी आस्था मानवता की रक्षा का माध्यम बने। यदि किसी धार्मिक आयोजन में सुरक्षा की अनदेखी होती है, तो वह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि उन मूल्यों से विचलन भी है, जिनका उत्सव मनाने का दावा किया जाता है। देवी की आराधना करने वाले समाज को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी श्रद्धालु की जान अव्यवस्था के कारण न जाए। श्रद्धा का अर्थ आंखें बंद करके भीड़ का हिस्सा बन जाना नहीं, बल्कि विवेक, संयम और जिम्मेदारी के साथ अपने धर्म का निर्वाह करना है।
अब समय आ गया है कि हर ऐसी त्रासदी को एक स्वतंत्र जांच, स्पष्ट जवाबदेही और ठोस सुधारों से जोड़ा जाए। जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हो, दोषियों पर समयबद्ध कार्रवाई हो और भविष्य के आयोजनों के लिए लागू किए जाने वाले सुरक्षा मानकों की नियमित समीक्षा हो। केंद्र और राज्य सरकारों को बड़े धार्मिक आयोजनों के लिए एक समान न्यूनतम सुरक्षा मानक विकसित करने चाहिए। आयोजक समितियों, प्रशासन, पुलिस, स्वास्थ्य सेवाओं और स्वयंसेवकों के बीच समन्वय को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। इन व्यवस्थाओं का पालन केवल कागजों में नहीं, जमीन पर दिखाई देना चाहिए। कोलकाता की त्रासदी हमें चेतावनी दे रही है कि उत्सव की चमक के पीछे छिपी लापरवाही कभी भी अंधकार बनकर उतर सकती है। मृतकों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि केवल शोक व्यक्त करना या उनके परिजनों को सहायता देना नहीं, बल्कि यह संकल्प लेना है कि ऐसी दुर्घटनाएं दोबारा न हों। सरकार जागे, प्रशासन अपनी जिम्मेदारी समझे, आयोजक अपनी प्रतिष्ठा से पहले लोगों की सुरक्षा को रखें और नागरिक अपनी आस्था के साथ विवेक को भी स्थान दें। आखिर कितने हादसों के बाद हम सीखेंगे? कितने परिवारों के उजड़ने के बाद हमारी व्यवस्थाएं बदलेंगी? और कितनी जिंदगियों की कीमत पर हम समझेंगे कि कोई भी उत्सव, कोई भी आयोजन और कोई भी धार्मिक आस्था मनुष्य के जीवन से बड़ी नहीं हो सकती। आस्था का सच्चा सम्मान तभी होगा, जब हर श्रद्धालु उत्सव में सुरक्षित प्रवेश करे और सकुशल अपने घर लौटे।





