अशोक भाटिया
मानसून की विदा होना कभी भारत के ग्रामीण और शहरी जीवन के लिए उत्सव और आने वाली फसलों की उम्मीद लेकर आता था। लेकिन इस साल मानसून की रवानगी अपने पीछे एक ऐसी खामोश और भयावह चेतावनी छोड़ गई है, जिसे अनदेखा करना आत्मघाती होगा। आसमान से बरसने वाली बूंदों की बेरुखी और जमीन के भीतर सदियों से संचित भूजल के अंधाधुंध दोहन ने आज देश को एक ऐसे चौराहे पर खड़ा कर दिया है, जहां भविष्य पूरी तरह प्यासा नजर आ रहा है। देश के बड़े हिस्से में इस साल कमज़ोर मानसून और अल नीनो के प्रभाव ने सूखे जैसे हालात पैदा कर दिए हैं। यह केवल पर्यावरणविदों की चिंता का विषय नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, नागरिक सुरक्षा और हमारे अस्तित्व के संकट का सायरन है। इस संकट की सबसे ताज़ा और जीवंत बानगी महाराष्ट्र में देखने को मिल रही है, जिसने पूरे देश के लिए खतरे की घंटी बजा दी है।महाराष्ट्र सरकार द्वारा राज्य के सभी शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों में न्यूनतम 10 प्रतिशत पानी की कटौती लागू करने का फैसला कोई सामान्य प्रशासनिक आदेश नहीं है। यह इस बात की आधिकारिक स्वीकारोक्ति है कि हमारे जल संसाधन अब हमारे अनियंत्रित उपभोग का बोझ उठाने में सक्षम नहीं रह गए हैं। राज्य सरकार ने जो उपयोग-वार जल नियोजन तैयार किया है, वह यह दिखाता है कि आने वाले महीने कितने कठिन होने वाले हैं। जब सरकार को पीने के पानी और मवेशियों के चारे को आरक्षित करने के लिए सिंचाई और नकदी फसलों पर प्रतिबंध लगाने पड़ रहे हों, तो समझना चाहिए कि पानी की एक-एक बूंद को लेकर युद्ध जैसी स्थिति बन चुकी है। महाराष्ट्र के 358 तालुकों में से 265 तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित किया जा चुका है। मराठवाड़ा के छत्रपति संभाजीनगर से लेकर पुणे, ठाणे और नागपुर जैसे महानगरों तक, हर जगह पानी को लेकर हाहाकार की स्थिति बन रही है। ठाणे में बांधों के घटते स्तर के कारण साप्ताहिक तालाबंदी शुरू हो चुकी है, तो वहीं पुणे में सप्ताह में एक दिन पानी की आपूर्ति पूरी तरह ठप की जा रही है।
यह संकट केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के आर्थिक इंजन कहे जाने वाले मुंबई जैसे महानगर की बुनियादी कमजोरियों को भी उजागर करता है। मुंबई को पानी देने वाली झीलों का जलस्तर मानसून के अंत में भी अपनी पूर्ण क्षमता तक नहीं पहुंच पाया है। आज स्थिति यह है कि मायानगरी कहे जाने वाले मुंबई और उसके आसपास के इलाकों को पानी की भारी किल्लत और लंबे शटडाउन का सामना करना पड़ रहा है। मुंबई जैसे शहरों में हर दिन पाइप लीक और अवैध कनेक्शनों के कारण लाखों लीटर पानी बर्बाद हो जाता है। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि अगर इस लीकेज को ही रोक लिया जाए, तो किसी नए बांध को बनाने की जरूरत ही न पड़े। लेकिन हमारी शहरी प्रशासनिक व्यवस्था लीकेज सुधारने जैसे दीर्घकालिक कदमों के बजाय सीधे नागरिकों के नलों पर पानी की कटौती का हथौड़ा चलाने को आसान मानती है।
शहरी भारत की इस प्यास का सीधा संबंध हमारे उस अदृश्य खजाने से है, जिसे हमने अपनी लालच की सुइयों से पूरी तरह खोखला कर दिया है—यानी हमारा भूजल । भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा शोषक है। हम अमेरिका और चीन के संयुक्त उपभोग से भी अधिक भूजल हर साल जमीन के सीने से खींच लेते हैं। देश के ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी की 85 प्रतिशत और कृषि की 60 प्रतिशत से अधिक जरूरतें इसी भूजल से पूरी होती हैं। लेकिन आज नीति आयोग और केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि देश के 256 से अधिक जिलों में भूजल स्तर खतरनाक रूप से नीचे जा चुका है। नागपुर जैसे जिलों में नए बोरवेल खोदने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना पड़ा है, जो इस बात का सबूत है कि पाताल की तिजोरी अब खाली हो चुकी है। हम जमीन से पानी निकाल तो रहे हैं, लेकिन कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो चुके हमारे शहरों के पास बारिश के पानी को वापस जमीन के भीतर भेजने का कोई ठोस विज़न नहीं है।
कमज़ोर मानसून इस संकट को और अधिक गंभीर बना देता है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में मानसून का मिजाज पूरी तरह बदल चुका है। अब चार महीनों में समान रूप से बारिश होने के बजाय, कुछ ही दिनों में इतनी तीव्र बारिश होती है कि शहरों में बाढ़ आ जाती है और बाकी के दिन सूखे निकल जाते हैं। जब बारिश कम होगी, तो नदियों और जलाशयों में पानी कम होगा, और जब सतह पर पानी नहीं होगा, तो इंसानी आबादी अपनी प्यास बुझाने के लिए और गहरे बोरवेल खोदेगी। यह एक ऐसा दुष्चक्र है, जो अंततः पूरे देश को मरुस्थल की ओर धकेल रहा है।
विडंबना यह है कि हम एक तरफ तो ‘विश्वगुरु’ और बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का ख्वाब देखते हैं, लेकिन दूसरी तरफ हमारे पास अपने नागरिकों को चौबीसों घंटे पीने का साफ पानी देने का कोई ठोस इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। नीति आयोग की रिपोर्ट पहले ही चेतावनी दे चुकी है कि यदि जल संकट को समय रहते नहीं संभाला गया, तो साल 2050 तक देश की जीडीपी में 6 प्रतिशत की भारी गिरावट आ सकती है। पानी की कमी सीधे तौर पर हमारे औद्योगिक उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य बजट को प्रभावित करती है। महाराष्ट्र सरकार ने उद्योगों के लिए 30 प्रतिशत पानी को रीसायकल करना अनिवार्य किया है, जो एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इसे देशव्यापी नीति बनाना होगा।
समाधान की बात करें तो भारत को अब पानी के प्रति अपने नजरिए को ‘असीमित संसाधन’ से बदलकर ‘सीमित आर्थिक वस्तु’ के रूप में देखना होगा। इजराइल जैसे देश, जहां भारत से भी कम बारिश होती है, आज अपनी तकनीक और वॉटर रीसाइक्लिंग के बल पर जल-अधिशेष देश बन चुके हैं। वे अपने 90 प्रतिशत अपशिष्ट जल को साफ करके खेती और उद्योगों में इस्तेमाल करते हैं। भारत में भी नीति निर्माताओं को केवल नए बांध बनाने जैसी विशाल और खर्चीली परियोजनाओं के भरोसे रहने के बजाय, विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। हर घर में वर्षा जल संचयन को कागजों से निकालकर जमीनी हकीकत बनाना होगा। पारंपरिक जल स्रोतों जैसे तालाबों, कुओं और बावडियों का पुनरुद्धार करना होगा, जो कभी हमारे गांवों की लाइफलाइन हुआ करते थे।
महाराष्ट्र का वर्तमान संकट पूरे देश के लिए एक ‘केस स्टडी’ और गंभीर चेतावनी है। यदि आज हम जागृत नहीं हुए, तो आने वाले समय में पानी की कटौती 10 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। पानी का संकट किसी राजनीतिक दल, जाति या वर्ग की सीमा को नहीं मानता, यह सबको समान रूप से प्रभावित करता है। देश के हर नागरिक को समझना होगा कि पानी को बचाना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारे स्वयं के जीवित रहने की न्यूनतम शर्त है। अगर आज हमने अपनी नदियों को प्रदूषित होने से नहीं बचाया, अपने भूजल के अनियंत्रित दोहन पर खुद लगाम नहीं लगाई और मानसून की एक-एक बूंद को सहेजना नहीं सीखा, तो वह दिन दूर नहीं जब इतिहास हमें एक ऐसे समृद्ध समाज के रूप में याद करेगा जो तकनीक में तो बहुत आगे निकल गया था, लेकिन अपनी आने वाली पीढ़ी को एक गिलास साफ पानी देने में पूरी तरह नाकाम रहा। प्यास की ओर बढ़ते इस देश को रोकने का समय अब आ चुका है।




