संयम की कसौटी पर नेताओं की फिसलती जुबान

Slipping tongue of leaders on the test of restraint

अजय कुमार

अक्सर जब राजनीतिक मंचों पर शब्दों की मर्यादा टूटती है, तो बहस विकास और नीतियों से भटककर सिर्फ व्यक्तिगत छींटाकशी पर आ टिकती है। हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ दिया गया बयान एक बार फिर इसी पुरानी और बीमार होती राजनीतिक संस्कृति को केंद्र में ले आया है। बिहार के पटना में डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की जयंती के कार्यक्रम के दौरान जब खड़गे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में अनियमितताओं का गंभीर मुद्दा उठा रहे थे, तब भीड़ से उठी एक टिप्पणी के जवाब में उन्होंने कह दिया कि ‘मोदी का बाप भी जाएगा।’ इस एक वाक्य ने चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और धांधली जैसे बड़े और जरूरी सवालों को पीछे धकेल दिया और पूरा राजनीतिक गलियारा सिर्फ भाषा की शालीनता पर बहस करने लगा। यह पहली बार नहीं है जब खड़गे के बयानों पर इस तरह का सियासी तूफान खड़ा हुआ हो, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में उनके कई बयानों ने राजनीतिक पारे को लगातार गर्माया है।

यदि हम पिछले बयानों के आंकड़ों और तारीखों पर गौर करें, तो खड़गे की शब्दावली अक्सर तीखे विवादों के घेरे में रही है। इसी साल 21 अप्रैल 2026 को चेन्नई की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने पीएम मोदी को ‘आतंकवादी’ तक कह दिया था, हालांकि बाद में सफाई देते हुए उन्होंने कहा था कि उनका आशय प्रधानमंत्री के काम करने के तरीके और लोगों को डराने की शैली से था। इसी तरह, 6 अप्रैल 2026 को असम के करीमगंज में एक जनसभा के दौरान उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना सीधे ‘जहरीले सांप’ से कर दी थी, जिसके लिए उन्होंने कुरान के एक उदाहरण का हवाला भी दिया था। इससे पहले 5 अप्रैल 2026 को केरल के इडुक्की में चुनावी रैली के दौरान उन्होंने गुजरात के लोगों को लेकर भी एक विवादित टिप्पणी की थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि मोदी और विजयन गुजरात या अन्य जगहों के अनपढ़ लोगों को बेवकूफ बना सकते हैं, लेकिन केरल के समझदार लोगों को नहीं।

इतना ही नहीं, साल 2025 के पन्नों को पलटें तो 7 जुलाई 2025 को रायपुर में छत्तीसगढ़ के एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का नाम लेते समय उनकी जुबान फिसल गई थी और उन्होंने उन्हें ‘मुर्मा जी’ कह दिया था, तथा पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का नाम लेते समय वे ‘कोविड’ बोल गए थे। 20 मई 2025 को कर्नाटक के होसपेट में उन्होंने भारत की सैन्य कार्रवाई और पाकिस्तान के साथ संघर्ष को ‘छुटपुट युद्ध’ करार दिया था, जिस पर देश की सेना के शौर्य और बलिदान को कम करने का आरोप लगाते हुए भाजपा ने तीखा विरोध जताया था। साल 2025 के शुरुआती महीनों में भी ऐसे कई मौके आए; जैसे 27 जनवरी 2025 को महू की रैली में उन्होंने महाकुंभ में नेताओं के गंगा स्नान पर सवाल उठाते हुए तंज कसा था कि क्या गंगा में डुबकी लगाने से गरीबी दूर होती है। और अगर हम थोड़ा और पीछे जाएं, तो 12 अक्टूबर 2024 को कलबुर्गी में उन्होंने बीजेपी को सीधे तौर पर ‘आतंकवादी पार्टी’ कहा था, 27 अप्रैल 2023 को कर्नाटक चुनाव के प्रचार के दौरान उन्होंने पीएम मोदी को ‘जहरीला सांप’ कहा था, तथा 29 नवंबर 2022 को गुजरात चुनाव के दौरान अहमदाबाद में उन्होंने प्रधानमंत्री की तुलना ‘100 सिर वाले रावण’ से कर डाली थी।

इन तमाम पुराने और नए बयानों का यह लंबा सिलसिला इस बात का गवाह है कि खड़गे जैसे वरिष्ठ, अनुभवी और दशकों लंबा राजनीतिक सफर तय करने वाले नेता से जिस विवेक और संयम की उम्मीद की जाती है, वह कई बार राजनीतिक आवेश की भेंट चढ़ जाता है। मल्लिकार्जुन खड़गे दक्षिण भारत से आते हैं और हिंदी उनकी मातृभाषा नहीं है, इसलिए कई बार भाषाई चूक या क्षेत्रीय लहजे के अंतर को एक हद तक समझा जा सकता है। लेकिन किसी शब्द के गलत उच्चारण और किसी टिप्पणी के आशय के आपत्तिजनक हो जाने में जमीन-आसमान का फर्क होता है। सवाल हिंदी के व्याकरण या ज्ञान का नहीं है, बल्कि उस मानसिक स्थिति का है जहां विरोधी के तीखे तंज या भीड़ से आई किसी टिप्पणी के जवाब में आत्मनियंत्रण खो बैठना आज की राजनीति की अनिवार्य प्रवृत्ति बन चुका है। नेताओं को यह गलतफहमी हो चली है कि यदि वे तुरंत और बेहद तीखा पलटवार नहीं करेंगे, तो समर्थकों के बीच उनकी आक्रामकता और राजनीतिक वजूद कमजोर पड़ जाएगा।

इस पूरी घटना पर भारतीय जनता पार्टी और अन्य दलों की प्रतिक्रियाएं भी सियासत के उसी दोहरे चरित्र को बेनकाब करती हैं जहां नैतिकता के पैमाने सुविधा के अनुसार तय होते हैं। पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्री दिलीप घोष ने खड़गे के इस ताज़ा बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए यहां तक कह दिया कि अब उनकी उम्र राजनीति से संन्यास लेने की हो चुकी है और लगातार चुनावों में हार की हताशा के कारण कांग्रेस नेता इस तरह के व्यक्तिगत और अमर्यादित हमलों का सहारा ले रहे हैं। घोष ने सोनिया गांधी के पुराने बयानों का हवाला देते हुए यह भी दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ जितनी अधिक व्यक्तिगत बयानबाजी की जाएगी, उसका राजनीतिक नुकसान अंततः कांग्रेस पार्टी को ही उठाना पड़ेगा क्योंकि देश और दुनिया में पीएम मोदी के नेतृत्व का सम्मान किया जाता है। दूसरी तरफ, कांग्रेस के भीतर से भी अभिषेक मनु सिंघवी जैसे नेताओं ने भाजपा पर दोहरे मानदंडों का आरोप लगाते हुए यह सवाल उठाया है कि जब सत्ता पक्ष के नेता विपक्ष के खिलाफ अनर्गल टिप्पणियां करते हैं, तब नैतिकता की यह दुहाई देने वाले लोग चुप्पी साध लेते हैं।

यह सच है कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना, सरकार की नीतियों की आलोचना करना और चुनावी धांधलियों या प्रशासनिक कमियों पर तीखे सवाल उठाना विपक्ष का बुनियादी अधिकार ही नहीं, बल्कि उसका सबसे बड़ा दायित्व भी है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण जैसी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की मांग करना एक ठोस राजनीतिक मुद्दा है जिस पर सत्ता पक्ष को घेरना कांग्रेस का काम था। लेकिन जब विरोध की यह गाड़ी पटरी से उतरकर सीधे व्यक्तिगत अपमान और तुच्छ शब्दावली की पटरियों पर दौड़ने लगती है, तो असली मुद्दा कहीं पीछे छूट जाता है। मीडिया की सुर्खियां और जनता की बहस एसआईआर की खामियों पर केंद्रित होने के बजाय मल्लिकार्जुन खड़गे के शब्दों और भाजपा के पलटवार पर सिमट जाती हैं। यह विपक्ष की अपनी रणनीति की एक बड़ी कमजोरी है जो अनजाने में ही सही, लेकिन विरोधियों को बैटिंग करने का पूरा मौका दे देती है।

राजनीति केवल तात्कालिक तालियां बटोरने का मंच नहीं है, यह जनता के भविष्य को संवारने और एक सुसंस्कृत वैचारिक दिशा देने का माध्यम है। आज आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही तरफ के नेता अपनी भाषा की लक्ष्मण रेखा को पहचानें। हर बात का जवाब उसी सेकंड और उसी आक्रामक भाषा में देना अनिवार्य नहीं होता। कई बार राजनीतिक जीवन में ठहरना, सामने वाले की बात को पूरी गंभीरता से सुनना और सोच-समझकर संतुलित प्रतिक्रिया देना सबसे बड़ी कूटनीतिक और राजनीतिक ताकत साबित होती है। खड़गे जैसे बुजुर्ग और परिपक्व नेता यदि इस बात को समझ लें, तो उनके लंबे राजनीतिक अनुभव और दलित समाज के उत्थान के लिए किए गए उनके संघर्षों की चमक इस तरह के बयानों के शोर में कभी फीकी नहीं पड़ेगी। लोकतंत्र को आज शोर मचाने वाले और एक-दूसरे पर व्यक्तिगत कीचड़ उछालने वाले राजनेताओं की नहीं, बल्कि ऐसे संयमित और विवेकशील नेतृत्व की सबसे ज्यादा दरकार है जो असहमति के कठिन तूफानों के बीच भी अपनी वैचारिक गरिमा और शालीनता को पूरी मजबूती के साथ बचाकर रख सके।