एनएचआरसी क़ा महिला कैदियों और मासूम बच्चों के लिए 10 मोर्चों पर सुधार का शंखनाद!

NHRC calls for reforms on 10 fronts for women prisoners and innocent children!

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

वैश्विक स्तरपर भारत में नारी को शक्ति, ममता, त्याग और सृजन का प्रतीक माना जाता है। आधुनिक भारत की आर्थिक प्रगति, डिजिटल क्रांति, प्रशासन विज्ञान,शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन में महिलाओं की भूमिका लगातार मजबूत हुई है।लेकिन एक सवाल आज भी हमारी व्यवस्था के सामने खड़ा है,जब कोई महिला जेल की सलाखों के पीछे पहुंच जाती है,तो क़्या उसके साथ उसकी मानवीय गरिमा,स्वास्थ्य,मातृत्व और सम्मान के अधिकार भी कैद हो जाते हैं? क़्या किसी अपराध के लिए कानून के अनुसार दंड भुगतने का अर्थ यह है कि महिला को स्वच्छ शौचालय,मासिक धर्म के दौरान आवश्यक सुविधाओं पर्याप्त भोजन, स्वास्थ्य सेवाओं और अपने बच्चों के सुरक्षित भविष्य जैसी बुनियादी जरूरतों से भी वंचित रहना पड़े? इन्हीं गंभीर सवालों के बीच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने 28 अक्टूबर 2026 को महिला कैदियों और उनके बच्चों के मानवाधिकारों के संरक्षण पर जारी अपनी महत्त्वपूर्ण परामर्श संबंधी प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से देश की जेल व्यवस्था के सामने सुधार का व्यापक एजेंडा रखा है।आयोग ने नौ केंद्रीय मंत्रालयों तथा सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के संबंधित शीर्ष अधिकारियों से सिफारिशों पर कार्रवाई करने और दो महीने के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है।यह पहल केवल जेलोंकी भौतिक परिस्थितियों का प्रश्न नहीं,बल्कि न्याय, संवैधानिक गरिमा, महिला सशक्तीकरण और बाल अधिकारों की सटिकता से कसौटी भी है।

साथियों बात अगर हमक्या सजा के साथ मानवीय गरिमा भी छिन जानी चाहिए?इसको समझने की करें तो जेल का उद्देश्य कानून के अनुसार दंड देना,समाज की सुरक्षा करना और जहां संभव हो, व्यक्ति को सुधार तथा पुनर्वास का अवसर देना है। लेकिन यदि किसी महिला को अस्वच्छ शौचालय,पर्याप्त पानी की कमी,मासिक धर्म के दौरान जरूरी स्वच्छता सामग्री का अभाव,पौष्टिक भोजन की कमी या मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता के अभाव का सामना करना पड़े,तो यह व्यवस्था की गंभीर परीक्षा है। महिला कैदियों की आवश्यकताएं पुरुष कैदियों से कुछ मामलों में अलग होती हैं। गर्भावस्था,प्रसव, स्तनपान मासिक धर्म,प्रजनन स्वास्थ्य और बच्चों की देखभाल के लिए विशेष प्रबंध जरूरी हैं।इन जरूरतों की उपेक्षा केवल असुविधा नहीं,बल्कि स्वास्थ्य, सुरक्षा और गरिमा से जुड़े अधिकारों को प्रभावित कर सकती है।महिला कैदियों के सामने एक और गंभीर चुनौती सामाजिक कलंक है। जेल से रिहाई के बाद कई महिलाओं को रोजगार,परिवार में स्वीकार्यता, सामाजिक संबंधों और आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए सुधार की दृष्टि केवल जेल के दरवाजे तक सीमित नहीं रह सकती; उसे रिहाई के बाद के जीवन तक पहुंचना होगा।

साथियों बात अगर हम एनएचआरसी की पहल की पृष्ठभूमि: पहले भी उठ चुका है सवाल किसको समझने की करें तो,इस विषय में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि आयोग ने महिला कैदियों की कठिनाइयों को पहली बार नहीं उठाया है। एनएचआरसी की आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, 8 अप्रैल 2025 को आयोग ने देश की विभिन्न जेलों में कैदियों, विशेषकर महिला कैदियों और उनके बच्चों की कठिनाइयों पर स्वतः संज्ञान लिया था। उस समय जेलों में क्षमता से अधिक भीड़, बुनियादी सुविधाओं और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, अपर्याप्त शौचालय, सैनिटरी नैपकिन तथा स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता से जुड़ी समस्याएं सामने रखी गईथीं।गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं में कुपोषण बच्चों की शिक्षा के अवसरों की कमी तथा कानूनी सहायता,कौशल प्रशिक्षण और पुनर्वासकार्यक्रमों के क्रियान्वयन को लेकर भी चिंता जताई गई थी।आयोग ने तब राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों से संबंधित आंकड़ों सहित चार सप्ताह में रिपोर्ट मांगी थी।इस पृष्ठभूमि में 28 अक्टूबर 2026 का परामर्श एक व्यापक नीतिगत कदम के रूप में महत्त्वपूर्ण है।हालांकि, तथ्यात्मक स्पष्टता जरूरी है: 28 अक्टूबर 2026 की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में नए परामर्श की घोषणा की गई है;इसे उसी दिन महिला कैदियों के मुद्दे पर पहलीबार स्वतः संज्ञान लेने वाला सटीकता से आदेश कहना सही नहीं होगा।

साथियों बात अगर हम आदेश या परामर्श?तारीख, क्रमांक और आधिकारिक स्थिति को समझने की करें तो इस विषय पर रिपोर्टिंग करते समय एक महत्त्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना आवश्यक है।एनएचआरसी की आधिकारिक वेबसाइट के अदर एडवाइजरीज अनुभाग में एडवाइजरी ऑन द प्रोटेक्शन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स ऑफ़ फीमेल इनमेंट्स एंड देयर चिल्ड्रन को क्रम संख्या 1 पर सूचीबद्ध किया गया है, जिसकी तारीख 23 अक्टूबर 2026 दर्ज है।वहीं,आयोग की इसे जारी किए जाने की प्रेस विज्ञप्ति 28 अक्टूबर 2026 की है। इस प्रकार परामर्श की सूचीबद्ध तारीख और प्रेस विज्ञप्ति की तारीख अलग- अलग हैं। उपलब्ध आधिकारिक विवरण में इस परामर्श के लिए कोई अलग न्यायालयीन वाद संख्या अथवा आदेश क्रमांक प्रदर्शित नहीं होता। इसलिए इसे किसी न्यायालय के बाध्यकारी फैसले के रूप में नहीं, बल्कि एनएचआरसी की सुधार संबंधी सिफारिशों वाले आधिकारिक परामर्श के रूप में सटीकता से प्रस्तुत करना उचित होगा।

साथियों बात अगर हम दस प्रमुख क्षेत्र: जेल सुधार की व्यापक कार्ययोजना को समझने की करें तो (1) गिरफ्तारी से जेल में प्रवेश तक संवेदनशील प्रक्रिया। महिला की गिरफ्तारी,हिरासत और जेल में प्रवेश के दौरान कानूनीसुरक्षा उपायों तथा मानवीय संवेदनशीलता का पालन जरूरी है। प्रवेश के समय उसकी विशेष जरूरतों, स्वास्थ्य और सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। (2) प्रवेश अभिलेख और बच्चों का उचित दस्तावेजीकरण। जेल में बंद महिला के साथ रहने वाले बच्चों तथा उससे अलग रह रहे बच्चों की जानकारी व्यवस्थित रूप से दर्ज करना महत्त्वपूर्ण है। इससे बच्चों की पहचान, देखभाल, स्वास्थ्य और कल्याण संबंधी जरूरतों पर उचित ध्यान दिया जा सकता है। (3) स्वास्थ्य, चिकित्सा और मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं। महिला कैदियों को आवश्यक चिकित्सकीय जांच, नियमित स्वास्थ्य सेवाएं और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता मिलनी चाहिए। गर्भवती महिलाओं, प्रसव के बाद की अवस्था में रहने वाली माताओं और स्तनपान कराने वाली महिलाओं की जरूरतों को विशेष प्राथमिकता देना आवश्यक है। पोषण और समय पर चिकित्सा सहायता की कमी को दूर करना भी इसी सुधार का हिस्सा है। (4) रहने की स्थिति, स्वच्छता और कल्याण। महिला बैरकों में पर्याप्त जगह, साफ शौचालय, स्नान की सुविधाएं, स्वच्छ पेयजल और मासिक धर्म के दौरान आवश्यक स्वच्छता सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है। जेल प्रशासन के कर्मचारियों को भी महिला कैदियों की विशेष आवश्यकताओं और सम्मानजनक व्यवहार के प्रति संवेदनशील बनाया जाना चाहिए। (5) माँ के साथ रहने वाले या उससे अलग बच्चों के अधिकार। छोटे बच्चों के मामले में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि वे जेल में हैं या बाहर। उनके सर्वोत्तम हित, पोषण, स्वास्थ्य, सुरक्षित देखभाल, खेल और आयु के अनुरूप शिक्षा को महत्त्व देना होगा। मां के कारावास के कारण किसी बच्चे का भविष्य अनिश्चित नहीं होना चाहिए।

साथियों (6) परिवार से संवाद और मुलाकात। परिवार के सदस्यों और बच्चों से नियमित संपर्क महिला कैदियों के मानसिक स्वास्थ्य तथा सामाजिक संबंधों के लिए महत्त्वपूर्ण है। उचित नियमों के अंतर्गत मुलाकात और संचार की सुविधाएं उपलब्ध कराने से पारिवारिक रिश्तों को बनाए रखने में मदद मिल सकती है। (7) जेल प्रशासन, कानूनी सहायता और न्याय तक पहुंच। महिला कैदियों को निःशुल्क कानूनी सहायता की उपलब्धता, अपने मामले की स्थिति की जानकारी और न्यायिक प्रक्रिया तक प्रभावी पहुंच मिलनी चाहिए। विचाराधीन कैदियों के मामलों में अनावश्यक देरी की समीक्षा भी जरूरी है।याद रहे, विचाराधीन होना दोषसिद्ध होना नहीं है; कानून के अनुसार दोष सिद्ध होने तक व्यक्ति निर्दोषता की धारणा का हकदार है। (8) अदालत में पेशी के दौरान विशेष सुविधाएं। महिला कैदियों को जेल से अदालत ले जाने और वापस लाने की प्रक्रिया में सुरक्षा, स्वास्थ्य तथा गरिमा का ध्यान रखा जाना चाहिए। आवश्यक सुविधाओं और संवेदनशील व्यवहार का अभाव न्यायिक प्रक्रिया में उनकी भागीदारी को प्रभावित नहीं करना चाहिए। (9) रिहाई के बाद पुनर्वास और सामाजिक पुनर्समावेशन। कौशल प्रशिक्षण, रोजगार के अवसर, आवश्यक परामर्श और सामाजिक सहायता महिलाओं को सम्मानपूर्वक जीवन दोबारा शुरू करने में मदद कर सकते हैं।

समाज को भी पूर्व कैदियों के प्रति अंधे भेदभाव और स्थायी कलंक से बचना चाहिए। सुधार का वास्तविक परिणाम तभी सामने आएगा, जब महिला जेल से बाहर निकलकर सुरक्षित और आत्मनिर्भर जीवन जी सके।(10) विदेशी महिला कैदियों की विशेष जरूरतें। विदेशी नागरिक महिलाओं को भाषा, परिवार से दूरी, कांसुलर संपर्क और कानूनी प्रक्रिया समझने जैसी अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।उनकी परिस्थितियों के अनुरूप आवश्यक सहायता और अधिकारों की रक्षा पर ध्यान देना भी परामर्श के दायरे में शामिल है।

साथियों बात अगर हम नौ केंद्रीय मंत्रालयों से राज्यों तक जवाबदेही की कसौटी को समझने की करें तो एनएच आरसी ने यह परामर्श नौ केंद्रीय मंत्रालयों, सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों अथवा प्रशासकों तथा संबंधित पुलिस महानिदेशकों को भेजा है। इसका उद्देश्य केवल समस्या की पहचान करना नहीं, बल्कि संबंधित प्राधिकारियों को अपने-अपने दायित्वों के अनुसार सुधार की दिशा में कार्रवाई के लिए प्रेरित करना है।आयोग ने दो महीने के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट (एक्शन टेकन रिपोर्ट ) प्रस्तुत करने का आग्रह किया है, ताकि उसे सिफारिशों के क्रियान्वयन की प्रगति की जानकारी मिलती रहे। यह समय-सीमा जवाबदेही का महत्त्वपूर्ण अवसर है।हालांकि रिपोर्ट मांगे जाने और सभी सिफारिशों के वास्तव में लागू हो जाने में अंतर है। असली परीक्षा यह होगी कि संबंधित विभाग क्या कदम उठाते हैं, किन कमियों को दूर करते हैं और जमीन पर क्या बदलाव दिखाई देते हैं।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि जेल की सलाखें स्वतंत्रता रोक सकती हैं, इंसान की गरिमा नहीं!भारत में महिला सशक्तीकरण का अर्थ केवल महिलाओं को शिक्षा रोजगार, राजनीति और डिजिटल अर्थव्यवस्था में आगे बढ़ाना नहीं है।इसका वास्तविक अर्थ उन महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना भी है, जो किसी कारणवश जेल में बंद हैं और जिनकी आवाज सामान्य सामाजिक जीवन से दूर होने के कारण कमजोर पड़ सकतीहै। कानून के अनुसार दंड भुगतने वाली महिला भी स्वास्थ्य, स्वच्छता, सुरक्षा, सम्मान और न्यायपूर्ण व्यवहार की अधिकारी है। उसके साथ रहने वाले बच्चे तो किसी भी स्थिति में मां के कारावास के कारण उपेक्षा, असुरक्षा और भविष्य की अनिश्चितता का बोझ उठाने के लिए जिम्मेदार नहीं हैं।एनएचआरसी का 28अक्टूबर 2026 का परामर्श इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल है। लेकिन सवाल अब केवल सिफारिशों का नहीं, उनके प्रभावी क्रियान्वयन का है। क्या जेलों में स्वच्छ शौचालय, पर्याप्त सैनिटरी नैपकिन, पौष्टिक भोजन, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाएं, बच्चों की शिक्षा और प्रभावी कानूनी सहायता वास्तव में सुनिश्चित होगी? क्या रिहाई के बाद महिलाओं को सम्मानजनक जीवन का अवसर मिलेगा? इन प्रश्नों के उत्तर आने वाले महीनों की कार्रवाई से सामने आएंगे।जेल केवल सजा भुगतने की जगह नहीं, बल्कि सुधार, पुनर्वास और मानवीय गरिमा की रक्षा का केंद्र भी होनी चाहिए। यदि दो महीने की समय-सीमा के भीतर संबंधित अधिकारी ठोस कदम उठाते हैं और उनकी नियमित निगरानी होती है, तो यह पहल भारतीय जेल व्यवस्था को अधिक संवेदनशील, न्यायपूर्ण और मानवीय बनाने की दिशा में सार्थक परिवर्तन ला सकती है। क्योंकि किसी सभ्य समाज की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि वह स्वतंत्र नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है, बल्कि इससे भी होती है कि वह अपनी हिरासत में मौजूद सबसे कमजोर व्यक्ति के अधिकारों की कितनी रक्षा करता है।