कृति आरके जैन
घर के भीतर सबसे गहरी खामोशी तब जन्म लेती है, जब माँ सामने होते हुए भी भीतर से अनुपस्थित होती है। बच्चा पास बैठा होता है, अपनी दुनिया खोलने को तैयार, पर माँ की आँखें किसी और चमकती दुनिया में भटकी रहती हैं। यह दूरी मीलों की नहीं, बस एक छोटी-सी स्क्रीन की है। यहीं से “स्क्रीन माँ” का जन्म होता है। यह किसी पर आरोप नहीं, बल्कि हमारे समय की निर्विवाद सच्चाई है। डिजिटल रोशनी में पली यह परवरिश बाहर से आधुनिक लगती है, भीतर से भावनात्मक सूखे की ओर बढ़ती है। बच्चे सवाल नहीं करते, वे धीरे-धीरे चुप रहना सीख लेते हैं।
डिजिटल समय ने माँ के जीवन के चारों ओर एक अदृश्य पिंजरा खड़ा कर दिया है। लगातार स्क्रॉल करना, तुरंत जवाब देना और हर पल साझा करना अब आदत नहीं, मजबूरी बन चुका है। माँ को लगता है वह बच्चे के पास है, पर सच यह है कि वह मानसिक रूप से अनुपस्थित रहती है। बच्चा बार-बार ध्यान खींचने की कोशिश करता है, पर हर बार हार जाता है। इसी हार में उसका आत्मविश्वास दरकने लगता है। स्क्रीन माँ के लिए लाइक और व्यूज़ प्राथमिक बन जाते हैं, जबकि बच्चे के लिए एक मुस्कान और एक नज़र ही सबसे बड़ा सहारा होती है।
बच्चे का भावनात्मक संसार माँ की प्रतिक्रिया से आकार ग्रहण करता है। जब माँ तुरंत देखती, सुनती और समझती है, तब बच्चा खुद को सुरक्षित महसूस करता है। स्क्रीन में डूबी माँ अनजाने में यह सुरक्षा छीन लेती है। बच्चा सीख लेता है कि उसकी बातों का इंतज़ार हो सकता है, भावनाएँ टाली जा सकती हैं। यही टलना आगे चलकर स्थायी चुप्पी में बदल जाता है। ऐसे बच्चे भीतर से बेचैन रहते हैं और बाहर से उदास दिखाई देते हैं। उनका विकास केवल शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक स्तर पर भी अधूरा रह जाता है।
समस्या केवल फोन की नहीं, हमारी सोच और प्राथमिकताओं की है। समाज ने मातृत्व को भी एक प्रदर्शन में बदल दिया है। सुंदर तस्वीरें, आदर्श क्षण और परफेक्ट दिनचर्या का दबाव हर माँ पर हावी है। इस दौड़ में असली पल धीरे-धीरे खो जाते हैं। स्क्रीन माँ खुद को साबित करने में लगी रहती है, जबकि बच्चा सिर्फ स्वीकार्यता खोजता है। वह सीखता है कि दिखावा ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है, सच्चाई कम। यही सीख धीरे-धीरे उसके रिश्तों में उतर जाती है और भावनात्मक ईमानदारी कमजोर पड़ने लगती है।
घरों के छोटे-छोटे दृश्य इस बड़े संकट की असली तस्वीर सामने रखते हैं। भोजन की मेज़ पर फोन रखा है, खेल के समय कैमरा पहले चल पड़ता है, और सोते वक्त भी नोटिफिकेशन चुप नहीं होते। बच्चा गिरता है, संभलता है, पर माँ की नज़र देर से पड़ती है। यही देर बच्चे के मन में स्थायी निशान छोड़ देती है। वह खुद को कम महत्त्वपूर्ण समझने लगता है। असली माँ की मौजूदगी में बच्चा गलतियाँ करके भी सुरक्षित रहता है, जबकि स्क्रीन माँ के साथ वह धीरे-धीरे चुप रहना और सह लेना सीख जाता है।
इस स्थिति का प्रभाव केवल क्षणिक नहीं, दूर तक जाने वाला है। ऐसे बच्चे अपनी भावनाएँ व्यक्त करने से डरने लगते हैं। वे या तो बेवजह आक्रामक हो जाते हैं या फिर पूरी तरह उदासीन। रिश्तों में जुड़ाव उन्हें कठिन लगने लगता है। माँ का स्पर्श, उसकी आवाज़ और उसका ध्यान उनके लिए भावनात्मक आधार होते हैं। जब यह आधार कमजोर पड़ता है, तो व्यक्तित्व भी डगमगाने लगता है। स्क्रीन माँ का असर सिर्फ बचपन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि युवावस्था और वयस्क जीवन में भी रिश्तों की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
समाधान तकनीक को पूरी तरह छोड़ने में नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं को नए सिरे से तय करने में है। यदि माँ तय समय पर फोन से दूरी बना सके, तो बदलाव संभव है। दिन के कुछ घंटे केवल बच्चे के नाम हों, जहाँ कोई स्क्रीन बीच में न आए। बातचीत, खेल और साथ बैठना साधारण लगता है, पर असर असाधारण होता है। असली माँ बनने के लिए अतिरिक्त परिश्रम नहीं, बल्कि सजग और सच्ची उपस्थिति चाहिए, जो बच्चे को यह भरोसा दे कि वह सबसे पहले है।
परिवार और समाज की भूमिका भी उतनी ही अहम है। यदि घर का वातावरण सहयोगी हो, तो माँ पर दबाव अपने आप कम हो जाता है। स्कूल और समुदाय यदि डिजिटल संतुलन पर खुलकर बात करें, तो जागरूकता बढ़ सकती है। तकनीक कंपनियों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे लत को बढ़ावा न दें। बच्चों को भावनात्मक शिक्षा मिले, ताकि वे अपने मन और भावनाओं को समझ सकें। यह सामूहिक प्रयास ही स्क्रीन माँ की जगह संवेदनशील और उपस्थित माँ को वापस ला सकता है।
यह सवाल केवल पालन-पोषण तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे भविष्य से जुड़ा है। माँ बच्चे की पहली शिक्षक होती है। यदि वही अनुपस्थित रहे, तो सीख अधूरी रह जाती है। भावनात्मक रूप से कमजोर पीढ़ी अंततः समाज को भी कमजोर बना देती है। फिर भी आशा शेष है। जब माँ एक पल ठहरकर बच्चे की ओर देखती है, तो टूटा हुआ संबंध फिर से जुड़ने लगता है। यही छोटा-सा ठहराव बड़े परिवर्तन की नींव बन सकता है।
“स्क्रीन माँ बनाम असली माँ” कोई टकराव नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी है। तकनीक उपयोगी हो सकती है, पर वह प्रेम का विकल्प कभी नहीं बन सकती। बच्चे को सबसे अधिक ज़रूरत माँ की आँखों की चमक, उसकी आवाज़ की गर्मी और उसकी बाहों की सुरक्षा की होती है। यदि माँ यह दे पाए, तो स्क्रीन अपने आप सीमित हो जाएगी। असली माँ की वापसी से ही भावनात्मक रूप से मजबूत बच्चे और संतुलित समाज का निर्माण संभव है।





