शशांक त्यागी
- कोंडागांव से कोल्हापुर तक काली मिर्च और हर्बल खेती के विस्तार की नई शुरुआत
- मां दंतेश्वरी हर्बल समूह का राष्ट्रीय स्तर पर तेजी से विस्तार
- सफल नवाचारी किसान सुधाकर, प्रतिराज तानाजी के नेतृत्व में महाराष्ट्र के किसानों का संगठित जुड़ाव
- कोल्हापुर महाराष्ट्र की जलवायु में काली मिर्च की सफल खेती से नई संभावनाएं
- काली मिर्च MDBP-16 से कम सिंचाई में चार गुना तक उत्पादन संभव
कोंडागांव : देश में जैविक एवं औषधीय खेती के क्षेत्र में कार्यरत मां दंतेश्वरी हर्बल समूह का किसान परिवार निरंतर राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार कर रहा है। इसी क्रम में महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले से जुड़े किसानों के एक बड़े समूह ने मां दंतेश्वरी हर्बल समूह के साथ औपचारिक रूप से जुड़ने का संकल्प लिया है, जिससे संगठन की सामूहिक शक्ति और किसान नेटवर्क में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इस विस्तार की कड़ी में हाल ही में कोल्हापुर महाराष्ट्र से प्रगतिशील किसान सुधाकर, प्रतिराज, तानाजी कोंडागांव स्थित मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म एवं रिसर्च सेंटर पहुंचे, जहां उन्होंने समूह द्वारा विकसित प्राकृतिक खेती, बहुफसली प्रणाली एवं औषधीय पौधों पर आधारित मॉडल का प्रत्यक्ष अवलोकन किया। प्रगतिशील किसान सुधाकर द्वारा अपने क्षेत्र में काली मिर्च की सफल खेती कराए जाने के अनुभव ने इस दौरे को विशेष महत्व प्रदान किया। उन्होंने कोल्हापुर की जलवायु परिस्थितियों में फल-फूल से लदी काली मिर्च की बेलों के वीडियो एवं फोटोग्राफ साझा किए, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि यह उच्च मूल्य फसल अब महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों में भी व्यावसायिक रूप से पूरी तरह संभव है।
इस सफलता के बाद कोल्हापुर क्षेत्र में ऑस्ट्रेलियन टीक के साथ ‘मां दंतेश्वरी काली मिर्च-16 (MDBP-16)’ को बड़े पैमाने पर लगाने की तैयारी प्रारंभ हो गई है। भारत सरकार द्वारा पंजीकृत यह विशेष किस्म गर्म क्षेत्रों, कम सिंचाई, कम उपजाऊ भूमि तथा सीमित संसाधनों में भी उत्कृष्ट उत्पादन देने में सक्षम मानी जा रही है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यह किस्म पारंपरिक फसलों की तुलना में तीन से चार गुना तक अधिक उत्पादन क्षमता रखती है, जिससे किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
फार्म भ्रमण के दौरान इन किसानों ने ऑस्ट्रेलियन टीक पर विकसित वर्टिकल काली मिर्च खेती, प्लांटेशन के मध्य खाली भूमि में अपनाई गई अंतर्वर्ती फसल प्रणाली तथा हल्दी, सफेद मूसली, गिलोय, स्टीविया, इंसुलिन प्लांट जैसी औषधीय फसलों की अंतरराष्ट्रीय जैविक पद्धति से की जा रही खेती को गहराई से देखा और समझा।
उन्होंने इस “कोंडागांव मॉडल” को महाराष्ट्र में किसानों के बीच बड़े स्तर पर लागू करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की, जिससे खेती को कम जोखिम, अधिक लाभ और स्थायी आय का आधार मिल सके। विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह रहा कि प्रगतिशील सुधाकर ने जीवन के अत्यंत कठिन दौर से गुजरते हुए गंभीर बीमारी एडवांस स्टेज कैंसर को पराजित किया और उसके बाद पूरी ऊर्जा के साथ खेती में नए प्रयोग प्रारंभ किए। कोल्हापुर में काली मिर्च के अलावा उन्होंने अपने घर के टेरिस पर धान की सफलतापूर्वक खेती करते हुए अच्छा उत्पादन लेकर एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया है। उनकी यह संघर्ष यात्रा अब अनेक किसानों के लिए आत्मविश्वास और प्रेरणा का स्रोत बन रही है।
इस अवसर पर मां दंतेश्वरी हर्बल समूह के अध्यक्ष दशमति नेताम तथा निदेशक अनुराग त्रिपाठी के नेतृत्व में सुधाकर का सम्मान अंगवस्त्र भेंट कर किया गया। साथ ही उन्हें फार्म में उत्पादित अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता वाली गोल्डन सफेद मूसली का विशेष पैकेट भी प्रदान किया गया। कार्यक्रम के दौरान अनुराग कुमार, शंकर नाग, कृष्णा नेताम, माधुरी देवांगन, ऋषिराज सहित अनेक किसान प्रतिनिधि उपस्थित रहे।
महाराष्ट्र के किसानों के इस संगठित जुड़ाव के साथ अब मां दंतेश्वरी हर्बल समूह छत्तीसगढ़ से आगे बढ़कर पश्चिम भारत में भी जैविक एवं औषधीय खेती के मजबूत मंच के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है।
यह पहल केवल संगठन विस्तार नहीं, बल्कि भारतीय खेती को कम लागत, अधिक उत्पादन और टिकाऊ मॉडल की दिशा में आगे ले जाने का एक ठोस प्रयास मानी जा रही है।





