क्लिक के दलदल में फँसा समाज: गालियों से ग्रोथ, शोर से शोहरत

A society trapped in a quagmire of clicks: growth through abuse, fame through noise

(जहाँ सच सन्नाटा है, तमाशा उत्सव है — क्लिक की संस्कृति में खोता हुआ समाज और डिजिटल मंच पर किनारे पड़ा विवेक)

डॉ. सत्यवान सौरभ

डिजिटल दुनिया कभी ज्ञान, संवाद और रचनात्मकता की प्रयोगशाला मानी जाती थी। यह विश्वास था कि इंटरनेट लोकतंत्र को मज़बूत करेगा, हाशिये पर खड़े लोगों को आवाज़ देगा और असली प्रतिभा को पहचान दिलाएगा। लेकिन आज जब हम स्क्रीन पर उँगली चलाते हैं, तो एक अलग ही सच सामने आता है। यहाँ हुनर से ज़्यादा हंगामा बिकता है, विचार से ज़्यादा विवाद और मेहनत से ज़्यादा मीम। Facebook और Instagram जैसे मंचों पर ‘वायरल’ होना सफलता की कसौटी बन चुका है। सवाल यह नहीं कि लोग मशहूर क्यों हो रहे हैं, सवाल यह है कि हम किस तरह की मशहूरी को पुरस्कार बना रहे हैं।

डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का पूरा ढांचा ध्यान के व्यापार पर टिका है। जितनी देर आप स्क्रीन पर टिके रहेंगे, उतना अधिक मुनाफ़ा पैदा होगा। इस गणित में शोर सबसे सस्ता और असरदार हथियार है। ऊँची आवाज़, उग्र भाषा, भड़काऊ हावभाव और अति-नाटकीयता — यही वह मुद्रा है जिसे एल्गोरिद्म सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं। जो व्यक्ति ठहराव से, तर्क से और संयम से बात करता है, वह भीड़ में गुम हो जाता है, जबकि तमाशा करने वाला मंच के बीचोंबीच बैठा होता है।

यह केवल कंटेंट की समस्या नहीं है, बल्कि प्रोत्साहन की है। जब प्लेटफ़ॉर्म वही दिखाते हैं जो क्लिक दिलाता है, तो रचनाकार भी वही बनाने को मजबूर होता है। इस दौड़ में गुणवत्ता पीछे छूट जाती है और उत्तेजना आगे बढ़ती जाती है। धीरे-धीरे यह एक आदत बन जाती है, और आदत अंततः संस्कृति में बदल जाती है।

कभी हुनर का अर्थ था — अभ्यास, अनुशासन और धैर्य। आज हुनर का मतलब है ट्रेंड पकड़ लेना। कोई सड़क पर नाचकर मशहूर है, कोई गालियाँ देकर ‘बोल्ड’ कहलाता है, कोई निजी जीवन को सार्वजनिक तमाशा बनाकर ‘रियल’ होने का दावा करता है। असली प्रश्न यह नहीं कि ये लोग क्यों देखे जा रहे हैं, बल्कि यह है कि समाज किस तरह के आदर्श गढ़ रहा है।

यह नया मापदंड युवाओं के मन में एक खतरनाक संदेश बैठा रहा है — कि शॉर्टकट ही सफलता है। अगर आप शांत हैं, तो आप उबाऊ हैं। अगर आप गहरे हैं, तो आप अप्रासंगिक हैं। यह सोच न केवल कला और ज्ञान का अपमान है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी ज़हरीली है। युवा खुद को लगातार तुलना के आईने में देखने को मजबूर है, जहाँ आत्मसम्मान लाइक्स और व्यूज़ की संख्या से तय होता है।

डर इस बात का है कि आने वाली पीढ़ी किताबें ज्ञान के लिए नहीं, बल्कि कंटेंट के लिए पढ़े। इतिहास, साहित्य और दर्शन अब सीखने के साधन नहीं, बल्कि विवाद पैदा करने की सामग्री बनते जा रहे हैं। लंबी सोच, संदर्भ और नैतिकता — इन सबको ‘बोरिंग’ कहकर किनारे किया जा रहा है। जबकि सच यह है कि ज्ञान कभी त्वरित नहीं होता। वह समय मांगता है, धैर्य मांगता है और असहज सवालों से जूझने की ताक़त मांगता है।

आज सच बोलने वाले के पास अक्सर सन्नाटा होता है। उसकी बातों में सनसनी नहीं होती, उसके निष्कर्ष तुरंत तालियाँ नहीं बटोरते। दूसरी ओर, तमाशा करने वालों के पास मेला होता है — लाइक्स, शेयर, फॉलोअर्स और ब्रांड डील्स। यह असंतुलन खतरनाक है, क्योंकि समाज शोर से नहीं, संवाद से आगे बढ़ता है। जब संवाद की जगह शोर ले लेता है, तो बहस तमाशा बन जाती है और असहमति दुश्मनी।

युवावर्ग इस पूरे परिदृश्य में सबसे ज़्यादा उलझन में है। एक ओर रोज़गार की अनिश्चितता, दूसरी ओर डिजिटल चमक का झूठा वादा। उसे बताया जा रहा है कि पहचान पाने का सबसे तेज़ रास्ता विवाद है। मेहनत, अध्ययन और धैर्य — ये सब धीमे रास्ते हैं, जबकि दुनिया तुरंत नतीजे चाहती है। इस जल्दबाज़ी की कीमत युवा थकान, अकेलेपन और अंदरूनी खालीपन के रूप में चुका रहा है।

अक्सर यह मान लिया जाता है कि प्लेटफ़ॉर्म तटस्थ हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि एल्गोरिद्म नैतिक नहीं होते। वे केवल लक्ष्य देखते हैं, और लक्ष्य है — अधिक समय, अधिक ध्यान। इसलिए वे वही दिखाते हैं जो हमें बाँधे रखे, चाहे वह नफ़रत हो, झूठ हो या खोखला मनोरंजन। ऐसे में ज़िम्मेदारी केवल प्लेटफ़ॉर्म की नहीं, हमारी भी है। हम जो देखते हैं, वही बढ़ता है। हम जिसे साझा करते हैं, वही फैलता है।

इस सर्कस से बाहर निकलने का रास्ता कोई त्वरित समाधान नहीं है। यह एक धीमी लेकिन ज़रूरी क्रांति है। डिजिटल साक्षरता, गहरी सामग्री को सम्मान, ईमानदार रचनाकारों का समर्थन और अपने देखने-साझा करने के चुनावों के प्रति सजगता — यही वह रास्ता है जिससे दिशा बदली जा सकती है। असहमति को शालीनता के साथ जगह देना और तर्क को ट्रोलिंग पर तरजीह देना भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।

डिजिटल संसार का सर्कस बन जाना महज़ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि चेतावनी है। सर्कस मनोरंजन देता है, दिशा नहीं। समाज को दिशा चाहिए — ज्ञान से, विवेक से और नैतिक साहस से। अंततः सवाल युवाओं से ही है: आप इस मेले का हिस्सा बनना चाहते हैं, या उस सन्नाटे के गवाह — और वाहक — जो सच के लिए ज़रूरी है?

फैसला आज का है, असर आने वाले कल पर पड़ेगा। शोर आसान है, अर्थ गढ़ना कठिन। लेकिन इतिहास हमेशा उन लोगों को याद रखता है, जिन्होंने कठिन रास्ता चुना।

(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)