कृषि बजट 2025 और किसान : क्या घावों पर मरहम लगेगा?

Agriculture Budget 2025 and Farmers: Will the wounds heal?

(डॉ. राजाराम त्रिपाठी : ग्रामीण अर्थशास्त्र एवं कृषि मामलों के विशेषज्ञ तथा राष्ट्रीय-संयोजक, अखिल भारतीय किसान महासंघ ‘आईफा’)

हर वर्ष की तरह, आगामी बजट 2025 से भी किसानों को ढेरों उम्मीदें हैं। “उत्तम खेती मध्यम बान, अधम चाकरी भीख निदान” जैसी कालजयी कहावतें, भले ही आज किसानों की कठिन स्थिति पर व्यंग्य सी लगें, परंतु इनके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। पराशर ऋषि के ग्रंथ ‘कृषि पराशर’ में वर्णित, “कृषिर्धन्या कृषिर्मेध्या जन्तूनां जीवनं कृषि”, यह सत्य आज भी अटल है कि कृषि ही जीवन का आधार है। परंतु विडंबना यह है कि देश के नीति निर्माता किसानों और उनकी समस्याओं को सुनने तक का समय नहीं निकालते। इसे “आईसीयू” में कहकर हाशिये पर डालने का चलन ही बन गया है।

हर बजट के पहले देश के वित्त मंत्री वाणिज्य मंत्री विभिन्न व्यापारिक संगठनों जैसे कि सीआईआई, एसोचैम, चैंबर ऑफ़ कॉमर्स को चाय पर आमंत्रित करके इन संगठनों की बजट से व्यापारियों और उद्योगों की अपेक्षाओं पर पर चर्चा की जाती है और उनकी मांगो का बजट में समुचित ध्यान रखा जाता है। परंतु किसान संगठनों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों नहीं किया जाता? क्या देश के 61% जनसंख्या के रोजगार और 100% लोगों की भोजन की थाली का मुद्दा इतना गौण है? विडंबना यह है कि किसान संगठनों के पत्र और सुझाव या तो रद्दी की टोकरी में फेंक दिए जाते हैं या उन पर चर्चा करना भी उचित नहीं समझा जाता। क्या यही “सुधार” की नीति है?

देश में हर दिन किसानों की आत्महत्याओं की घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि जिस भूमि पर किसानों के बूते कभी सोने की चिड़िया का साम्राज्य था, वह अब किसानों के लिए एक दु:स्वप्न बन चुकी है। क्या इस बजट में सरकार किसानों को उनका खोया हुआ सम्मान लौटा पाएगी?

पृथक कृषि-बजट : कब मिलेगी “कृषि मूलम जगत सर्वम” को पहचान ?
श्रीमद्भगवद्गीता में उल्लेखित, “कृषि मूलम जगत सर्वम” यह उक्ति भारतीय कृषि के महत्व को सर्वोच्च स्थान देती है। आज, जब रेल बजट को अलग पेश किया जा सकता है, तो कृषि के लिए पृथक बजट क्यों नहीं?

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहां अधिकांश आबादी खेती पर निर्भर है, वहां कृषि के लिए पृथक बजट की मांग स्वाभाविक है। डॉ. राजाराम त्रिपाठी और उनके संगठन पिछले 30 वर्षों से इस मुद्दे को उठा रहे हैं। रेल बजट को पृथक करने का कारण उसकी व्यापकता है, तो फिर कृषि जैसे बड़े और महत्वपूर्ण क्षेत्र के लिए अलग बजट क्यों नहीं हो सकता?

कृषि महज खेती तक सीमित नहीं है। कहावत है कि ‘हाथी के पांव में सबका पांव’ , उसी तरह कृषि में पशुपालन, डेयरी, उद्यानिकी, सिंचाई, खाद्य प्रसंस्करण, वेयरहाउसिंग, और लॉजिस्टिक्स जैसे कई महत्वपूर्ण उपक्षेत्र शामिल हैं। भारत के अधिकांश उद्योग, चाहे वे खाद्य प्रसंस्करण हों, वस्त्र हों, या दवा उद्योग, कच्चे माल के लिए कृषि पर निर्भर हैं। फिर भी, कृषि को प्राथमिकता देने में उदासीनता क्यों?

चाणक्य के अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार, यदि मूल आधार मजबूत नहीं होगा, तो साम्राज्य टिक नहीं सकता।

कृषि और जीडीपी की गणना का असंतुलन :
भारत की जीडीपी गणना की नीति अमेरिका से प्रभावित रही है। अमेरिका की रणनीति रही है कि कृषि पर निर्भरता कम करके उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए, क्योंकि उसे देश की जनसंख्या, उपलब्ध संसाधनों और विशाल भू भाग के अनुपात को देखते हुए निर्धारित की गई थी। परंतु डेढ़ अरब की जनसंख्या वाले भारत जैसे देश में जहां कृषि मुख्य रोजगार प्रदाता है, यह नीति कितनी व्यावहारिक है? पिछले बजट में कृषि क्षेत्र के लिए लगभग 1.25 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था, जो कि कुल बजट का एक बहुत ही छोटा हिस्सा था। इसलिए कृषि क्षेत्र की स्थिति दयनीय बने रहना कोई आश्चर्य का विषय नहीं होना चाहिए।।

वित्त वर्ष 2024 में भारत की जीडीपी में कृषि का योगदान लगभग 15-17% था, जबकि 61% जनसंख्या इस क्षेत्र पर निर्भर है। यह विरोधाभास स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि नीति निर्माण में कृषि को वह स्थान नहीं मिल रहा जो मिलना चाहिए।

बजट 25: एक और घाव या मरहम : पिछले कुछ वर्षों में किसानों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर गारंटी कानून सहित कई मांगों को लेकर आंदोलन किए। परंतु सरकार का रवैया अधिकतर निराशाजनक ही रहा। वर्ष 2022-23 में फसल उत्पादन में वृद्धि के बावजूद किसानों को उचित मूल्य नहीं मिला। क्या यही “आत्मनिर्भर भारत” की परिभाषा है?

सरकार ने 2024 के बजट में फसल बीमा योजना के तहत 15,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। परंतु यह योजना भी किसानों तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंची। कृषि अवसंरचना विकास कोष का उपयोग भी सीमित रहा।

बजट 25 : समाधान की और कुछ जरूरी कदम:-

  1. पृथक कृषि बजट : कृषि क्षेत्र की जटिलताओं को समझते हुए इसे पृथक कृषि-बजट की आवश्यकता है। इससे न केवल कृषि, बल्कि उद्योग और निर्यात क्षेत्र को भी गति मिलेगी।
  2. न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी : किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य सुनिश्चित करना आवश्यक है। इसके लिए किसान संगठनों से मिल बैठकर किसने की प्रत्येक फसल को शत प्रतिशत MSP दिलाना सुनिश्चित करने हेतु सक्षम गारंटी कानून लाना होगा।
  3. लॉजिस्टिक्स और वेयरहाउसिंग : फसल भंडारण और परिवहन के लिए बेहतर बुनियादी ढांचे की आवश्यकता है। हर वर्ष लगभग लाखों टन अनाज तथा 2 लाख करोड़ का साग-सब्जी और फल इन सुविधाओं के अभाव में बर्बाद होता है, जो कि देश और किसानों की शुद्ध आर्थिक हानि और किसान के श्रम का बहुत बड़ा अपमान है।
  4. कृषि-उद्योग सहयोग : कृषि और उद्योगों के बीच सामंजस्य स्थापित कर कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण और निर्यात बढ़ाया जा सकता है।
  5. देश के उपेक्षित पड़े ‘केविके’ के कर्मियों की समस्या को हल करते हुए देते हुए सभी केवीके को सुविधा संपन्न बनाकर मजबूत करते हुए इसका विकासखंड स्तर तक विस्तार किया जाना चाहिए ।
    6- कृषि-शोध पर बजट का कटौती के सिलसिले को तत्काल विराम लगाते हुए शोध , नवाचारों के लिए पर्याप्त राशि मुहैया कराई जाए।
    7- जैविक खेती को जीरो-बजट जैसे जुमलों-जंजालों और झुनझुनों से मुक्त कर दीर्घकालिक जैविक कृषि नीति तथा रोडमेप बनाते हुए इस अभियान के लिए पर्याप्त बजट आबंटित किया जाना चाहिए।
    8-कृषि में सिंचाई तथा अधोसंरचना विकास हेतु समुचित नीति बनाकर इस क्षेत्र में दीर्घकालिक निवेश को प्रोत्साहित किया जाना बेहद जरूरी है।
    9- कृषि-बजट सकल बजट का कम से कम 10% होना चाहिए।
    10 . तत्काल ‌पर्याप्त अधिकार संपन्न ‘किसान कल्याण आयोग’ का गठन किया जाना चाहिए। जिसमें वास्तविक किसानों की शत-प्रतिशत इसी भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

बजट 25: मलहम या मिर्च :-
खेती-किसानी की वर्तमान स्थिति देखकर, “कृषि मूलम जगत सर्वम” और “उत्तम खेती मध्यम बान” जैसी कहावतें व्यंग्यात्मक प्रतीत होती हैं। यदि सरकार इस बार भी किसानों की अनदेखी करती है, तो यह न केवल उनके घावों पर नमक छिड़कने जैसा होगा, बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करेगा।

यह बजट किसानों के घावों पर मरहम लगाएगा या उनकी उम्मीदों पर पानी फेर देगा, यह तो 1 फरवरी को ही स्पष्ट होगा। परंतु यह तय है कि किसान अब और अनदेखी सहन नहीं करेंगे। क्या सरकार इस बार उनकी ओर ध्यान देगी? या फिर वही पुराना “आईसीयू में कृषि” का पुराना राग अलापते हुए ‘असाध्य बीमारी से ग्रसित बच्चे’ के इलाज से मुंह मोड़ने और कतराने वाला रवैया इस बजट में भी जारी रहेगा, यह जानने के लिए 1 फरवरी तक का इंतजार करना पड़ेगा।