डॉ राजाराम त्रिपाठी
भारत का किसान आज केवल मौसम से नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति से लड़ रहा है। खेती के लिए सबसे जरूरी आवश्यकता उर्वरक , बीज , कीटनाशक दवाइयां और डीजल के लिए वह खतरनाक हद तक दूसरे देशों पर निर्भर है। इसलिए खेत में बीज डालते समय वह बादलों की ओर कम और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों की ओर अधिक देख रहा है, क्योंकि अब उसकी खेती का गणित मानसून से कम और युद्ध से अधिक तय हो रहा है। यह स्थिति केवल विडंबना नहीं, बल्कि हमारी कृषि नीति की गहरी कमजोरी का आईना है।
इन दिनों कैमरून में विश्व व्यापार संगठन (WTO ) का 14-वाँ मंत्रिस्तरीय सम्मेलन चल रहा है, जहाँ कृषि व्यापार के पुराने नियमों को बदलने की चर्चा हो रही है। पर भारत में किसान आज भी उसी पुराने ढाँचे में फंसा है, जहाँ उत्पादन की जिम्मेदारी उसकी, जोखिम उसका, पर खाद बीज दवाई डीजल सभी इनपुट्स के साथ ही, किसान के उत्पाद के मूल्य पर भी संपूर्ण नियंत्रण बाहरी शक्तियों का है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को जिस तरह तोड़ा, उसने पहली बार यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय कृषि कितनी गहराई तक आयात पर निर्भर हो चुकी है।
भारत अपनी डीएपी आवश्यकता का 65 से 70 प्रतिशत आयात करता है। 2021-22 में लगभग 10 से 11 मिलियन टन डीएपी आयात हुआ। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद इसकी कीमत 450 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 900 डॉलर प्रति टन तक पहुँच गई। परिणामस्वरूप, 2022-23 में उर्वरक सब्सिडी का बोझ 2.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया। यह राशि बताती है कि हम समस्या का समाधान नहीं कर रहे, बल्कि उसे वित्तीय बोझ से ढकने का प्रयास कर रहे हैं।
अब पश्चिम एशिया में ईरान को लेकर बढ़ता तनाव इस संकट को और गहरा कर रहा है। यदि ईरान भी आपूर्ति शृंखला से प्रभावित होता है, जैसा कि होता दिखाई दे रहा है, तो भारत के पास विकल्प और सीमित हो जाएंगे। यह केवल आयात का संकट नहीं होगा, बल्कि रणनीतिक असुरक्षा का संकेत होगा। स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि देश में प्रतिवर्ष लगभग 500 लाख टन यूरिया, 100 लाख टन डीएपी और 40 लाख टन ‘म्यूरेट आफ पोटाश’ (MOP) की खपत होती है। इस विशाल मांग में थोड़ी सी भी कमी सीधे उत्पादन और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है।
उर्वरकों के साथ अब कीटनाशकों का संकट भी तेजी से उभर रहा है। उद्योग जगत पहले ही संकेत दे चुका है कि कीमतों में 25 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि लगभग तय है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने पेट्रोकेमिकल उत्पादों को 25 से 30 प्रतिशत तक महंगा कर दिया है, पैकेजिंग लागत 15 से 30 प्रतिशत तक बढ़ी है, और सल्फर जैसे कच्चे माल के दामों में भारी उछाल आया है। चीन, जो इन रसायनों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है, उसने निर्यात में कटौती कर दी है। इसके साथ ही रुपया डॉलर के मुकाबले 93 के स्तर को पार कर चुका है, जिससे आयात और महंगा हो गया है। शिपिंग और बीमा लागत में वृद्धि ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।
भारत हर साल 5.5 अरब डॉलर से अधिक के एग्रोकेमिकल्स का निर्यात करता है, पर विडंबना यह है कि उसका कच्चा माल बड़े पैमाने पर चीन से आता है। यह एक ऐसी संरचना है, जहाँ हम निर्यातक भी हैं और निर्भर भी। यानी कि कच्चे माल काआयात नहीं होगा तो निर्यात भी नहीं होगा। क्रॉपलाइफ इंडिया ने भी कीमतों में 25 प्रतिशत तक वृद्धि की आशंका जताई है।
और चौंकाने वाली बात यह है कि कीटनाशकों की कीमतों पर सरकार का कोई प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं है, जिससे यह पूरा बोझ सीधे किसान पर आता है। उर्वरकों तथा कीटनाशकों की गुणवत्ता भी बड़ा मुद्दा है। देश के विभिन्न भागों में नकली खाद तथा नकली दवाइयों की जिस तरह भरमार की खबरें आ रही हैं, अच्छी गुणवत्ता की दवाइयां और खाद बनाने वाली इमानदार कंपनियां बाजार में संघर्ष कर रही हैं, इन हालातों को देखकर हम कह सकते हैं कि यही हाल जारी रहा तो ये नकली सिक्के धीरे-धीरे असली सिक्कों को बाजार से ही बाहर कर देंगे, और देश की खेती और खेतों का, दोनों का ही सर्वनाश हो जाएगा।
पिछले लंबे समय से किसानों को उनकी उपज का उचित न्यायकारी मूल्य नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में बढ़ती कृषि लागत उनके लिए दोहरी मार बन रही है। उत्पादन महंगा होता जा रहा है, जबकि आय स्थिर है, या घट रही है। यह असंतुलन किसी भी कृषि अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक संकट का संकेत है। अमर्त्य सेन का यह कथन कि “भूख केवल उत्पादन की कमी से नहीं, बल्कि नीतिगत विफलताओं से उत्पन्न होती है,* आज के संदर्भ में पूरी तरह प्रासंगिक प्रतीत होता है।
समस्या का समाधान आयात के नए स्रोत ढूंढने में नहीं, बल्कि निर्भरता कम करने में है। मोरक्को, जॉर्डन, सऊदी अरब या रूस से समझौते केवल अस्थायी राहत दे सकते हैं, स्थायी समाधान नहीं। इसके लिए कृषि प्रणाली को पुनर्गठित करना होगा।
रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करना अब पर्यावरणीय विकल्प नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता है।
प्राकृतिक खेती, जैविक उर्वरक और स्थानीय संसाधनों पर आधारित सफल मॉडल इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जितना अनुदान रासायनिक उर्वरक क्षेत्र को दिया जाता है उसका 10% भी यदि नए वैकल्पिक जैविक खाद बनाने वाले सफल नवाचारी किसानों को दिया जाता, उनका हौसला बढ़ाया जाता तो अब तक यह देश जैविक उर्वरकों, जैविक कीटनाशकों के मामले में आत्मनिर्भर हो गया होता। अब तक नक्सली समस्या के लिए जाने जाने वाले कोंडागांव बस्तर में विकसित पेड़ आधारित कृषि और नेचुरल ग्रीनहाउस जैसे बहुउपयोगी मॉडल, जहाँ पत्तियों से 1 एकड़ में 6 टन हरी खाद बनती है और मुफ्त में वायुमंडलीय नाइट्रोजन का प्रचुर स्थिरीकरण होता है, ₹2 लीटर में असर कारक जैविक कीटनाशक बनाए जाते हैं, वाटर हार्वेस्टिंग भी होती है इस संकट का दीर्घकालिक समाधान प्रस्तुत करते हैं। यदि देश के विभिन्न भागों में नवरी किसानों द्वारा विकसित किए गए प्रायोगिक रूप से सफल इन मॉडलों को नीतिगत तथा पूंजीगत समर्थन मिले, तो भारत अपनी उर्वरक निर्भरता में उल्लेखनीय कमी ला सकता है और शीघ्र ही आत्मनिर्भर भी बन सकता है।
इसके साथ ही वर्तमान उर्वरक और कीटनाशक वितरण प्रणाली में पारदर्शिता लाना आवश्यक है। भारी मात्रा में, संगठित तरीके से जारी कालाबाजारी , मिलावट और कृत्रिम कमी पर नियंत्रण के लिए तकनीकी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर सुधार जरूरी हैं। किसान संगठनों को भी केवल जिंदाबाद-मुर्दाबाद तथा विरोध के लिए विरोध की राजनीति से ऊपर उठकर वैकल्पिक सकारात्मक सहकारी मॉडल प्रस्तुत करने होंगे, तथा सक्रिय सकारात्मक सहभागिता की भूमिका भी निभानी होगी।
आज भारतीय कृषि एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ निर्णय की देरी संकट को और गहरा कर सकती है। यदि हमने अब भी अपनी दिशा नहीं बदली, तो आने वाले समय में यह प्रश्न नहीं होगा कि उर्वरक कितने महंगे हुए, बल्कि यह होगा कि खेती जारी रह भी पाएगी या नहीं? और यदि खेती ही अस्थिर हो गई, तो यह संकट केवल किसान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश की खाद्य सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संतुलन को गहरे संकट में डाल देगा। विश्व की सबसे ज्यादा आबादी लगभग डेढ़ अरब लोगों के देश की सर्वप्रथम चिंता तो अपने लोगों भोजन की थाली की होनी ही चाहिए। और चाहे आप जो चाहें कर लें, परंतु किन्हीं भी देशों से खाद्यान्न आयात करके आप 150 करोड़ लोगों का नियमित पेट नहीं भर सकते। इसलिए देश की खेती और किसानों को मजबूत तथा आत्मनिर्भर बनाना हमारी सर्वप्रथम प्राथमिकता होनी चाहिए। और इसके लिए अभूतपूर्व तेजी के साथ तत्काल बहुस्तरीय जरूरी नीतिगत निर्णय लेने होंगे वरना “का वर्षा जब कृषि सुखाने” या “अब पछताए होत का, जब चिड़िया चुग गई खेत।
डॉ राजाराम त्रिपाठी: कृषि एवं ग्रामीण अर्थशास्त्र विशेषज्ञ, राष्ट्रीय संयोजक : अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा)





