गोपेन्द्र नाथ भट्ट
नई दिल्ली में सम्पन्न चार दिवसीय वैश्विक एआई सम्मेलन की सफलता ने भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के क्षेत्र में एक उभरती महाशक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित किया है। यह सम्मेलन केवल तकनीकी विशेषज्ञों की एक बैठक भर नहीं था, बल्कि नीति,अर्थव्यवस्था, कूटनीति और सामाजिक सरोकारों के संगम का मंच भी बना।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सम्मेलन को “एआई फॉर ऑल” की अवधारणा को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि भारत तकनीक को समावेशी विकास के साधन के रूप में देखता है। उनका संदेश स्पष्ट था कि एआई का उद्देश्य मानव क्षमताओं को सशक्त करना है, न कि उन्हें प्रतिस्थापित करना। यह दृष्टिकोण पश्चिमी देशों के केवल औद्योगिक-उन्मुख मॉडल से अलग दिखाई देता है, जहाँ एआई मुख्यतः उत्पादकता और लाभ वृद्धि से जुड़ा रहा है।
नीति और नियमन: संतुलन की चुनौती
सम्मेलन में सबसे अधिक चर्चा एआई के नियामक ढांचे पर हुई। वैश्विक स्तर पर एआई को लेकर डेटा सुरक्षा, गोपनीयता, एल्गोरिदमिक पारदर्शिता और दुरुपयोग की आशंकाएँ बढ़ रही हैं। ऐसे में भारत ने संतुलित नियमन की वकालत की न तो अत्यधिक नियंत्रण, जिससे नवाचार बाधित हो, और न ही पूर्ण स्वतंत्रता, जिससे दुरुपयोग का खतरा बढ़े।
यह दृष्टिकोण भारत को एक “मध्य मार्ग” अपनाने वाले देश के रूप में प्रस्तुत करता है। यूरोप का सख्त नियामक मॉडल और अमेरिका का अपेक्षाकृत उदार ढांचा इन दोनों के बीच भारत का मॉडल विकासशील देशों के लिए उदाहरण बन सकता है।
एआई सम्मेलन का एक प्रमुख आयाम आर्थिक भी था। भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम तेजी से बढ़ रहा है और एआई आधारित समाधान स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा और वित्तीय सेवाओं में क्रांतिकारी बदलाव ला रहे हैं। सम्मेलन के दौरान कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में अनुसंधान एवं विकास (आर & डी) केंद्र स्थापित करने में रुचि दिखाई।
भारत के पास विशाल डेटा संसाधन, युवा प्रतिभा और मजबूत आईटी आधारभूत संरचना है। यही कारण है कि एआई के क्षेत्र में निवेश के लिए भारत एक आकर्षक गंतव्य बनता जा रहा है। यदि सरकार कौशल विकास और अनुसंधान को प्रोत्साहन देती रही, तो आने वाले वर्षों में एआई भारत की अर्थव्यवस्था का प्रमुख चालक बन सकता है।
हालाँकि एआई के प्रसार से रोजगार पर संभावित प्रभाव को लेकर चिंताएँ भी सामने आईं। स्वचालन (ऑटोमेशन) के कारण पारंपरिक नौकरियों पर दबाव बढ़ सकता है। सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि भारत को “री-स्किलिंग” और “अप-स्किलिंग” पर विशेष ध्यान देना होगा।
यदि शिक्षा प्रणाली में तकनीकी प्रशिक्षण को शामिल किया जाए और डिजिटल साक्षरता बढ़ाई जाए, तो एआई रोजगार छीनने के बजाय नए अवसर भी सृजित कर सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में एआई आधारित कृषि पूर्वानुमान, टेलीमेडिसिन और ऑनलाइन शिक्षा जैसे प्रयोग इस दिशा में सकारात्मक संकेत देते हैं।
नई दिल्ली में यह सम्मेलन भारत की वैश्विक कूटनीति के लिए भी महत्वपूर्ण रहा। एआई आज केवल तकनीक नहीं, बल्कि रणनीतिक शक्ति का प्रतीक बन चुका है। जिस देश के पास उन्नत एआई क्षमता होगी, वह रक्षा, साइबर सुरक्षा और वैश्विक व्यापार में बढ़त हासिल करेगा।भारत ने इस मंच का उपयोग विकासशील देशों की आवाज़ उठाने के लिए भी किया। यह संदेश दिया गया कि एआई के लाभ केवल विकसित देशों तक सीमित न रहें, बल्कि वैश्विक दक्षिण को भी समान अवसर मिलें। इस पहल ने भारत की छवि एक जिम्मेदार और समावेशी वैश्विक नेता के रूप में सुदृढ़ की है।
सम्मेलन का साझा घोषणा-पत्र मानव-केंद्रित एआई पर आधारित रहा। एल्गोरिदम में पूर्वाग्रह को कम करने, डेटा सुरक्षा सुनिश्चित करने और पारदर्शिता बढ़ाने पर जोर दिया गया। यह संकेत है कि भारत केवल तकनीकी प्रगति ही नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों को भी समान महत्व देता है।
नई दिल्ली में सम्पन्न एआई सम्मेलन भारत के लिए तकनीकी, आर्थिक और कूटनीतिक दृष्टि से एक मील का पत्थर साबित हुआ है। यह आयोजन दर्शाता है कि भारत केवल एआई उपभोक्ता नहीं, बल्कि नीति-निर्माता और वैश्विक नेतृत्वकर्ता बनने की दिशा में अग्रसर है।यदि सरकार नियामक संतुलन बनाए रखते हुए नवाचार, कौशल विकास और निवेश को प्रोत्साहित करती रही, तो आने वाले दशक में भारत एआई क्रांति का प्रमुख केंद्र बन सकता है। नई दिल्ली का यह सम्मेलन इसी भविष्य की ठोस आधारशिला के रूप में देखा जा सकता है।





