
ललित मोहन बंसल, अमेरिका से
‘बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले’, यह कहावत किस प्रसंग में की गई है, इसपर चर्चा की बजाए यह बात जान लेना जरूरी है कि व्हाइट हाउस में फिजा बदल गई है। यहाँ तेज तर्रार डोनाल्ड ट्रम्प का पदार्पण हो चुका है। इस के ओवल कक्ष में सूट-बूट में राष्ट्रनेता आते हैं बॉस की मर्जी से और जाते भी बॉस की मर्जी से! यूक्रेन के मौजूदा राष्ट्रपति व्लोदिमीर ज़ेलेंस्की के साथ व्हाइट हाउस में शुक्रवार को जो कुछ हुआ, उसे दुनिया भर ने अमेरिकी मीडिया और सीधे प्रसारण में टीवी पर देखा। ट्रम्प ने पोर्च में जेलेंस्की का हाथ बढ़ा कर स्वागत करते हुए टिप्पणी की कि ‘देखिए, जेलेंस्की सूट में हैं।’ दुनिया के सर्वशक्तिशाली राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रम्प और एक हारे हुए ‘शिकारी’ जेलेंस्की के बीच सिर्फ 30 मिनट में इतना तेज़ी से घटनाक्रम हुआ, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने जरूर राहत की साँस ली होगी। पिछले तीन वर्षों तक रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जोई बाइडन और यूरोपीय नेताओं ने पेंट-टी शर्ट में घूमते और आक्रामक रूस के विरुद्ध प्रोपेगंडा करते जेलेंस्की को इस कद्र ‘बल्ली’ पर चढ़ाए रखा कि वह यह भूल बैठे, उनकी मुलाक़ात ओवल कक्ष में जोई बाइडन से नहीं, ट्रम्प से हो रही है। जेलेंस्की की रही सही ‘औक़ात’ बैठक में मौजूद उपराष्ट्रपति जे डी वांस ने बता दी। अमेरिकी मीडिया के अनुसार ओवल में ऐसी घटनाएँ होती नहीं हैं, जो टीवी पर सीधे प्रसारित हों।
यूरोपीय समुदाय, कनाडा और लेटिन अमेरिकी देशों के दर्जन-दो दर्जन भर देश हाथ पांव मार रहे हैं। जेलेंस्की के पक्ष में एकजुटता का राग अलापते हुए एक बीच का रास्ता निकालने की कोशिश में जुटे हैं। इनकी कोशिश है कि पिछले तीन वर्ष से चले आ रहे रूस-यूक्रेन युद्ध पर विराम लगे, निरीह हजारों लोगों को मौजूदा युद्ध की चपेट से बचाया जाए। फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी सहित अन्यान्य देश देख चुके हैं कि यूक्रेन की मदद में यूरोपीय देशों की 60% मदद के बावजूद 40 % अमेरिका ने सैन्य मदद की है । जेलेंस्की ने पुतिन को जबतब खूब गालियां सुनाई। अपने रुदन पर सहानुभूति बटोरते हुए आर्थिक मदद के साथ सैन्य मदद पाई। अमेरिकी कांग्रेस में एक संबोधन में जेलेंस्की की सहानुभूति में तालियाँ बजी। इसे दुनिया भर के लोगों ने देखा। इस पर जोई बाइडन ने जेलेंस्की की पीठ तो थपथपाई ही, गोला-बारूद और सैन्य साज सामान पर टैक्स पेयर के 350 अरब डालर से ज्यादा डालर ‘फूँक’ दिए। हुआ कुछ नहीं, सिर्फ़ इतना कि युद्ध लंबा खिसकता रहा। व्हाइट हाउस वार्ता विफल होने पर यूक्रेन में एक पक्ष जेलेंस्की के ख़िलाफ़ खड़ा हो गया है। वह जेलेंस्की के ख़िलाफ़ महाभियोग चलाए जाने की आवाज़ उठाने में लगा है। इनमें से प्रतिपक्ष के एक सांसद डुबिंस्की भी हैं, जो जेलेंस्की से क्षुब्ध हैं, इन दिनों नजरबंद हैं।
ट्रम्प की जिद्द के माने क्या हैं? अब व्हाइट हाउस में बॉस ट्रम्प है। उन्होंने पिछले ४३-४४ दिनों में चुनावी वादों को पूरा करने के लिए करीब एक सौ कार्यकारी आदेश जारी किए, मंत्री मंडल का गठन किया, मित्र देशों में भारत सहित अनेक देशों के राष्ट्रध्यक्ष और प्रधान मंत्रियों से मिले। उन्होंने ताजपोशी के बाद अवैध इमिग्रेशन, टैरिफ और चुनावी वादों के अनुरूप दो युद्ध रुकवाने एक, इजराइल-हमास तथा दूसरे यूक्रेन -रूस के बीच युद्ध विराम की कोशिशें की। इजराइल-हमास युद्ध को रुकवाने पर तो सहज डंडा चल गया, यूक्रेन-रूस युद्ध बदस्तूर जारी रहने से उनकी मीडिया में किरकिरी हुई। वह कहते रहे कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन उनके मित्र हैं, वह एक दिन में युद्ध रुकवा देंगे। उन्होंने पुतिन से फ़ोन पर घंटे भर बात की तो उन्हें लगा कि बाजी हाथ में है, पर पुतिन यह बात कहाँ मानने वाले थे कि वह यूक्रेन से जीते हुए इलाक़े वापस करने पर राजी हो जाएँगे। अमेरिका ने इस युद्ध में यूक्रेन को 350 अरब डालर मूल्य का सैन्य साज सामान दिया था। ट्रम्प चाहते तो यह राशि छोड़ सकते थे, लेकिन वह यह जानते थे कि वह यूक्रेन से सैन्य साज सामान के बदले खनिज संपदा की डील कर लेते हैं तो उन्हें भविष्य में चीन के सम्मुख हाथ पसारने नहीं पड़ेंगे। यूक्रेन ने डील पर हस्ताक्षर करने की शर्त मान ली। लेकिन यह क्या जेलेंस्की व्हाइट हाउस आए थे डील पर हस्ताक्षर करने और रूस की बेमानी और अपनी सुरक्षा की गारंटी को लेकर ऐसे मुँह बनाने लगे कि उन्हें ट्रम्प की हैसियत और अमेरिकी ताक़त का अहसास नहीं रहा। बस यहीं से तकरार इतनी बढ़ी कि उन्हें बैरंग लौटना पड़ा। यह किसी से छिपा नहीं है कि अमेरिका का पहला प्रतिद्वंद्वी रूस नहीं, चीन है। चीन (17 खरब डालर) आर्थिक क्षेत्र में अमेरिका (27 खरब डालर) से थोड़ा पीछे दूसरे स्थान पर है जबकि उसकी सैन्य शक्ति अमेरिकी से कम नहीं है। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग अमेरिका की ‘वन चाइना पालिसी’ के कायल हैं। लेकिन वह मौके की तलाश में हैं कि कब ताइवान को वन चाइना नीति के अंतर्गत जबरन कब्जे में ले लें। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच रिश्ते बिगड़े नहीं। चीन की दिक्कत यह है कि वह अपनी विस्तारवादी नीति के वशीभूत है। मौके की तलाश में है कि कब एक चीन नीति मानने वाले अमेरिका के नाकों तले ताइवान को दबोच लें। चीनी आकाओं ने भी व्हाइट हाउस में ट्रम्प-जेलेंस्की के वाक् युद्ध और यूक्रेन के राष्ट्रपति को जलील होते देखा है। चीन के सरकारी मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने मात्र इतना कमेंट किया है कि ‘युद्ध ख़त्म हो, शान्ति स्थापित हो।’
अमेरिकी शर्तें क्या हैं?
डॉनाल्ड ट्रम्प के लिए जेलेंस्की सर्कस के एक जोकर से अधिक कुछ नहीं है। उनकी निगाह में जेलेंस्की एक फूहड़ और तानाशाह हैं, जो शक्तिशाली रूस से बाजी हार चुके हैं। कहते हैं कि अमेरिकी मदद के बिना वह युद्ध के मैदान में कदापि नहीं ठहर सकते। ऐसे में अमेरिका किसी भी शर्त पर यूक्रेन को सैन्य अथवा आर्थिक मदद देने को तैयार नहीं हैं, बल्कि यूक्रेन को अभी तक जो मदद दी गई है, उसकी भरपाई के रूप में अमेरिका को यूक्रेन से उनके मौजूदा खनिज संसाधनों की पूर्ति हो। ऐसे में जेलेंस्की की ओर से युद्ध विराम के पहले ट्रम्प से खनिज संपदा डील पर हस्ताक्षर किए जाने से पहले लिखित गारंटी माँगना ‘फूहड़पन’ से अधिक कुछ नहीं है। ट्रम्प ने कहा भी कि जब उनके वैज्ञानिक यूक्रेन में खनन कार्यों में व्यस्त होंगे, रूस की कदापि हिम्मत नहीं होगी कि वह सुरक्षा गारंटी में कोई चूक करे। फिर यह तर्क भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि यूक्रेन के खरसोन और जीआरपीजीआई में खनिज है कितने मूल्य का, जबकि एक तिहाई हिस्से पर रूस पहले ही कब्जा कर चुका है। बेहतर होता, जेलेंस्की पहले डील पर हस्ताक्षर करते और फिर गुहार लगाते कि रूस पर दबाव बनाएं कि वह युद्ध विराम का सम्मान करे।
मोदी मंत्र, ट्रम्प और रिश्तों के माने क्या है? प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रम्प और पुतिन के साथ बेहतर रिश्ते निभाते हुए सर्वदा ॐ सर्वे भवंतु सुखिन:, सर्वे संतु निरामया:, सर्वे भद्रानि पश्यंतु, मां कचिशद्दू खबाग्यभ्वेत: ॐ शांति: शांति: शांति: और मौजूदा संकटपूर्ण स्थिति में ‘विश्व बन्धुत्व’ के मंत्र को मंचों और पुतिन एवँ जेलेंस्की से वैयक्तिक बातचीत में दोहराया है। यह मंत्र आज के विभाजित युग में कितना अपरिहार्य है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि ‘युद्ध समस्या का निदान नहीं है, इसका एकमात्र विकल्प राजनयिक बातचीत है।’ लेकिन मद में चूर जेलेंस्की ने बातचीत का वह रास्ता भी बंद कर दिया है, यह जानते समझते हुए कि ट्रम्प सर्वशक्तिशाली हैं, वह ख़ुद ‘युद्ध नहीं, शांति’ की अपील कर रहे हैं। व्हाइट हाउस में ओवल में बातचीत करते हुए यह बात तो ट्रम्प भी मानते हैं कि मोदी ‘टफ’ वार्ताकार हैं। मोदी पर ट्रम्प और पुतिन के भरोसे का परिणाम है कि भारत आज इस स्थिति में है कि वह अमेरिका, रूस और चीन के सत्ता के ध्रुवीय केंद्रों में चौथे केंद्र को संभालते हुए हिन्द प्रशांत महासागर में द्वीपीय देशों की सुरक्षा और कारोबार का नेतृत्व करते हुए नई दिशा दे सकते हैं।
भारत ने हिमालय के पूर्वी क्षोर पर ताकतवार चीन के साथ झड़पों के बावजूद रिश्ते बिगड़ने नहीं दिए, बल्कि राजनयिक और आर्थिक स्तर पर रिश्ते बनाए रखें। भारत ने रणनीतिक और सैन्य रिश्तों पर आंच नहीं आने दी। इसके विपरीत अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए फ्रांस से राफेल और अमेरिका से एफ़-३५ जेट लड़ाकू विमानों की खेप के लिए अहम समझौते करते हुए घर और बाहर यह अहसास दिलाने में कोई चूक नहीं की कि सैन्य शक्ति संतुलन में भारत भले चीन से एक कदम पीछे है, वह पड़ौसी देशों पाकिस्तान और बांग्लादेश के सीमापार आतंक को बाखूबी नियंत्रित करने में सक्षम है।
अब विकल्प क्या बचे हैं, जेलेंस्की का क्या होगा?
व्हाइट हाउस से बेआबरू हो कर जेलेंस्की निकले तो ब्रिटेन के प्रधान मंत्री कीयर स्टार्मर ने उन्हें कंधा दिया। कीयर ने अपने पूर्ववर्ती निर्णय के अनुरूप ‘फ्रोजन’ रूसी संपत्ति के एक हिस्से के रूप में जेलेंस्की को क़रीब ढाई अरब डालर की आर्थिक मदद का आश्वासन दिया तथा किंग चार्ल्स से भेंट और मौजूदा संकट के निपटारे के संदर्भ में यूरोपीय समुदाय की एक बैठक से अवगत कराया। इसके बावजूद ऐसा नहीं है कि यूक्रेन के सिर से ख़तरा टल गया है। रूस से आतंकित समीपवर्ती देशों, ख़ासकर पोलैंड, लिथुआनिया, बाल्टिक देश फ़िनलैंड और स्वीडन घबराए हुए हैं। इन नेताओं के पास जेलेंस्की का रुदन सुनने के अलावा कोई विकल्प नहीं है? सोवियत संघ से अलग थलग होने वाले इन छोटे छोटे देशों के पास अपनी सुरक्षा के लिए न तो आर्थिक संसाधन हैं और न ही सैन्य शक्ति। अमेरिका, चीन के बाद तीसरी ताक़त के रूप में यूरोप में जर्मनी के होने वाले चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने जरूर कहा है कि ‘अब वक्त आ गया है, ‘नाटो को अमेरिका से स्वतंत्र हो जाना चाहिए। रक्षा खर्चों में अधिकाधिक व्यय किया जाना चाहिए।’ ऐसी स्थिति में जेलेंस्की के पास त्यागपत्र देने और विकल्प के रूप में यूक्रेन के नए नेता के सम्मुख अमेरिका के सम्मुख घुटने टेकने के अलावा कोई चारा नहीं है।
तीव्र प्रतिक्रियाएं : यूरोप और अमेरिका में पक्ष और प्रतिपक्ष ने तीव्र प्रतिक्रियाएं की हैं। मीडिया में कहा जा रहा है कि वार्ता भंग होने का लाभ पुतिन को मिलेगा, जो पूरे यूरोप पर गिद्ध दृष्टि लगाए हुए है। यूक्रेन समर्थक रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने अफ़सोस जताया है कि उन्हें नहीं लगता जेलेंस्की के रहते यह वार्ता फिर से शुरू हो पाएगी। बेहतर होगा कि जेलेंस्की त्याग पत्र दे और नए वार्ताकार को भेजे। रिपब्लिकन डॉन बेकन ने कहा कि अमेरिकी विदेश नीति के लिए यह ख़राब दिन रहा। न्यू यॉर्क से रिपब्लिकन प्रतिनिधि माइक लायर का विचार था कि दोनों ही पक्ष के लिए यह एक अच्छा मौक़ा था, जो हाथ से निकल गया। इलिनोइस गवर्नर जे बीप्रिट्जकर, जो ख़ुद यूक्रेन मूल के हैं, ने शुक्रवार को शिकागो में प्रेस वार्ता में कहा कि वह यूक्रेन के साथ हैं।
अब सवाल इतना सा है कि क्या अमेरिका के सहयोग के बिना यूरोप मदद के लिए आगे बढ़ेगा? क्या यूक्रेन की जनता देश में मार्शल ला लागू रहने की स्थिति में जेलेंस्की से त्यागपत्र ले कर नए राष्ट्रपति का चुनाव कराएगी?