पश्चिम एशिया के तनाव के बीच-ऊर्जा संकट की दस्तक: महंगाई के नए दौर की आहट!

Amid tensions in West Asia, energy crisis looms: a new wave of inflation is on the horizon!

सुनील कुमार महला 

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, विशेषकर ईरान, इज़राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच टकराव ने वैश्विक तेल बाज़ार में गहरी चिंता पैदा कर दी है। पाठकों को बताता है कि सबसे बड़ा खतरा होर्मुज जलडमरूमध्य को है, जहां से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है। भारत के लिए यह मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि हमारे कुल तेल आयात का लगभग 50–52 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से आता है। यदि यह समुद्री मार्ग अवरुद्ध होता है, तो भारत पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, सरकार का कहना है कि देश के पास लगभग 6–7 सप्ताह का रणनीतिक तेल भंडार उपलब्ध है, जिससे कुछ समय तक घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है। पेट्रोलियम मंत्रालय स्थिति पर लगातार निगरानी बनाए हुए है।

हाल फिलहाल, यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और अपनी कुल जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। आज ऊर्जा की मांग निरंतर बढ़ रही है और वर्तमान में बड़ी मात्रा में तेल मध्य-पूर्व से खरीदा जाता है। ऐसे में क्षेत्रीय संकट का सीधा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों और आम नागरिकों की जेब पर पड़ना स्वाभाविक है। तेल की कीमतें पहले ही 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुकी हैं। यदि यह वृद्धि जारी रहती है, तो महंगाई, चालू खाता घाटा और सरकारी व्यय पर दबाव बढ़ेगा। परिवहन, उर्वरक, हवाई यात्रा तथा दैनिक उपयोग की वस्तुएं महंगी हो सकती हैं।

कहना ग़लत नहीं होगा कि अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद पश्चिम एशिया की स्थिति और जटिल हो गई है तथा टकराव के नए मोर्चे खुल रहे हैं। अमेरिका और इज़राइल ने तेहरान सहित ईरान के कई शहरी क्षेत्रों पर हमले तेज कर दिए हैं, जबकि ईरान ने अमेरिकी सहयोगी खाड़ी देशों के ठिकानों को निशाना बनाना शुरू किया है। इज़रायली हमलों के कारण 4 मार्च 2026 (बुधवार) को तेहरान में सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार को स्थगित करना पड़ा। वास्तव में, ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के तेल प्रतिष्ठानों पर हमले तेज कर वैश्विक बाजार में हलचल मचा दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य को अवरुद्ध करने की कार्रवाई ने न केवल एशियाई देशों की चिंता बढ़ाई है, बल्कि विश्व व्यापार की धुरी को प्रभावित किया है। भारत भी इससे अछूता नहीं है।मसलन, बुधवार तक फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी और आसपास के समुद्री क्षेत्रों में भारतीय ध्वज वाले 37 जहाज फंसे हुए बताए गए हैं। इन पर 1100 से अधिक भारतीय नाविक सवार हैं। कुछ जहाज भारत के लिए कच्चा तेल और एलएनजी लेकर आ रहे थे, जबकि कुछ खाड़ी देशों में पेट्रोलियम उत्पाद लेने जा रहे थे। हालांकि, स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले 48 घंटों में संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, जॉर्डन, बहरीन, ओमान, कुवैत और कतर के नेताओं से बातचीत कर वहां फंसे भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयास किए हैं। लेकिन युद्ध के कारण आर्थिक मोर्चे पर भी असर स्पष्ट दिखने लगा है और इस क्रम में शेयर बाजार में 1123 अंकों की गिरावट दर्ज की गई, जबकि डॉलर के मुकाबले रुपया 92 के पार चला गया। यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो तेल की कीमतों में 13-15 प्रतिशत तक वृद्धि संभव है और साथ ही साथ ब्रेंट क्रूड के दाम और ऊपर जा सकते हैं।

बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि होर्मुज मार्ग बाधित होने के कारण जहाजों को अब केप ऑफ गुड होप के रास्ते से लाया जा रहा है, जिससे परिवहन में लगभग दो सप्ताह का अतिरिक्त समय और लगभग 40 प्रतिशत अधिक लागत लग सकती है। इसके परिणामस्वरूप भारत के निर्यात में 15 प्रतिशत तक गिरावट की आशंका जताई जा रही है। जानकारों का यह मानना है कि तेल कीमतों में संभावित तेजी से परिवहन एवं खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ेगा और महंगाई दर 1-2 प्रतिशत तक ऊपर जा सकती है तथा इससे किराना और यात्रा खर्च में भी वृद्धि होगी। अनिश्चितता के माहौल में सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की मांग बढ़ेगी, जिससे उसके दाम चढ़ सकते हैं। इतना ही नहीं, कच्चे माल और औद्योगिक धातुओं की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है। तांबा और एल्युमिनियम जैसी धातुओं की कमी से भारतीय ऑटोमोबाइल और निर्माण क्षेत्र की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। गौरतलब है कि भारत फॉस्फेट और पोटाश जैसे उर्वरकों के कच्चे माल का आयात करता है। ऊर्जा लागत बढ़ने से उर्वरक उत्पादन महंगा होगा, जिससे रबी फसलों की तैयारी प्रभावित हो सकती है। उर्वरक सब्सिडी का बोझ बढ़ने से सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ेगा।

हाल फिलहाल, युद्ध को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इन हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताया, किंतु ठोस हस्तक्षेप अभी तक नहीं हुआ है। बताया जाता है कि सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य देशों-रूस, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस के बीच इस मुद्दे पर गहरे मतभेद हैं।

कुल मिलाकर, हमारे देश को तत्काल घबराने की आवश्यकता भले न हो, परंतु यह स्पष्ट है कि यदि युद्ध लंबा चलता है तो ऊर्जा, व्यापार, महंगाई, कृषि और वित्तीय स्थिरता पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। इस परिस्थिति से स्पष्ट सबक यह है कि भारत को दीर्घकालिक और संतुलित ऊर्जा नीति अपनानी होगी। नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों, हरित हाइड्रोजन और घरेलू तेल अन्वेषण को प्राथमिकता देकर ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस कदम उठाना समय की मांग है।

अंत में यही कहूंगा कि अमरीका, ईरान और इजरायल के बीच बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। यह टकराव सीधे युद्ध से अधिक शक्ति संतुलन, प्रतिबंधों, प्रॉक्सी हमलों और कूटनीतिक दबाव की रणनीतियों पर आधारित है। पश्चिम एशिया में अस्थिरता का सीधा प्रभाव तेल आपूर्ति, ऊर्जा कीमतों और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों पर पड़ता है, जिससे विश्व अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ती है। भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति महंगाई और आर्थिक दबाव को बढ़ा सकती है। अंततः स्पष्ट है कि स्थायी समाधान सैन्य टकराव में नहीं, बल्कि संयम, संवाद और प्रभावी कूटनीति में निहित है।