हनक हारी, हौसला जीता: ट्रम्प के ‘सरेंडर’ और शाहबाज़ की बिसात की इनसाइड स्टोरी

Arrogance lost, courage won: The inside story of Trump's 'surrender' and Shahbaz's chessboard

दिलीप कुमार पाठक

इतिहास की बिसात पर जब अहंकार और आत्मसम्मान का टकराव होता है, तो अक्सर नतीजा बारूद की ताक़त नहीं, बल्कि इरादों की मजबूती तय करती है। आज दुनिया के फलक पर जो कुछ घट रहा है, वह डोनाल्ड ट्रम्प की उस तथाकथित ‘मजबूत’ छवि का विखंडन है, जिसे उन्होंने वर्षों की बयानबाजी से गढ़ा था। ट्रम्प, जो दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचाने का दावा करते थे, आज खुद अपनी ही बिछाई बिसात पर एक ‘मज़ाक’ बनकर रह गए हैं। यह जंग बारूद की नहीं, बल्कि रसूख और जज्बात की थी, जहाँ ट्रम्प की धमकियाँ ईरान के संकल्प के सामने बेअसर साबित हुईं। वाशिंगटन के सत्ता के गलियारों में आज वह शोर नहीं है, जो कभी ईरान को नेस्तनाबूद करने के दावों से गूंजता था। इसके बजाय, वहां एक ऐसी खामोशी है जो किसी बड़ी हार को स्वीकार करने से पहले छाई रहती है। वर्तमान परिदृश्य में जो सबसे बड़ी सुगबुगाहट है, वह है दो हफ्ते के लिए थमा हुआ ‘सीज़फायर’ कहने को तो यह युद्ध की मशीनरी पर लगा एक अस्थायी ब्रेक है, लेकिन हकीकत की गहराई में झांकें तो यह ट्रम्प और इज़रायल की उस हताशा का प्रतीक है, जहाँ वे समझ चुके हैं कि इस जंग को सीधे तौर पर जीतना मुमकिन नहीं है। दो हफ्ते का यह सीज़फायर मानवता के लिए उम्मीद की एक किरण है, लेकिन सत्ता के गलियारों में यह महाशक्ति की एक रणनीतिक पीछे-हट है। इज़रायल की तकनीक भी ईरान के ‘हौसले’ का काट नहीं ढूंढ पाई, और यह स्पष्ट हो गया कि सुपर पावर का झुकना यह बताता है कि दुनिया अब बदल चुकी है। इस युद्ध में इज़रायल और अमेरिका ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन उन्हें उम्मीद नहीं थी कि एक मुल्क पाबंदियों के बीच भी इतना फौलादी इरादा दिखाएगा। इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ का किरदार सबसे दिलचस्प रहा।

ट्रम्प ने अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए शाहबाज़ शरीफ़ का एक रणनीतिक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया। जब दुनिया को लगा कि पाकिस्तान मध्यस्थता कर रहा है, तब असल में पर्दे के पीछे ट्रम्प प्रशासन ईरान की उन लगभग सभी शर्तों को स्वीकार करने की स्थिति में आ चुका था, जिन्हें वे कल तक ‘असंभव’ करार देते थे।शाहबाज़ शरीफ़ मात्र एक जरिया थे, असली समझौता तेहरान की शर्तों पर हुआ। ईरान ने अपनी शर्तों पर अडिग रहकर यह साबित कर दिया कि सत्ता की हनक हमेशा अडिग इरादों को नहीं कुचल सकती। ट्रम्प के लिए यह ‘ डील’ करना मजबूरी बन गया था, क्योंकि वे जानते थे कि ईरान की मिसाइलें अब उनके नियंत्रण से बाहर हो चुकी हैं। ट्रम्प के लिए यह दौर किसी चुनौती से कम नहीं है। उनके अपने देश में उठते विरोध के स्वर और वैश्विक मंच पर उनके फैसलों पर होते सवाल यह बताने के लिए काफी हैं कि केवल आर्थिक पाबंदियों से किसी राष्ट्र का चरित्र नहीं बदला जा सकता।

शाहबाज़ शरीफ़ के जरिए दिया गया बयान दरअसल ट्रम्प का वह ‘एग्जिट रूट’ था, जिसने अमेरिका को एक बेहद जटिल और खर्चीले दलदल से बाहर निकलने का रास्ता दिया। ईरान ने न केवल अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता की रक्षा की, बल्कि यह भी दिखा दिया कि इज़रायल की तकनीकी श्रेष्ठता और अमेरिका के जंगी बेड़े भी उस संकल्प का मुकाबला नहीं कर सकते जो अपनी जमीन की अस्मिता से उपजा हो। अमेरिका की आंतरिक राजनीति में भी ट्रम्प इस वक्त बुरी तरह घिर चुके हैं, और यह समझौता उनकी गिरती लोकप्रियता को बचाने का एक आखिरी दांव है। ईरान ने अपने संयम और रणनीतिक धैर्य से यह संदेश दिया है कि जब हौसला पहाड़ जैसा हो, तो सुपर पावर की लहरें भी उससे टकराकर शांत हो जाती हैं। इतिहास गवाह रहेगा कि जीत उसकी हुई जो अंत तक मैदान में डटा रहा। कूटनीति के पन्नों में यह हमेशा दर्ज रहेगा कि कैसे एक महाशक्ति ने अपनी साख बचाने के लिए एक मध्यस्थता के मुखौटे का सहारा लिया और उन शर्तों के साथ एक ऐसी जंग से बाहर निकला, जिसे वह हर तरीके से हार रहा था।

सीज़फायर का यह ठहराव भले ही अस्थायी हो, लेकिन इसने दुनिया को महाशक्तियों की सीमाओं का अहसास करा दिया है। अब गेंद ट्रम्प के पाले में है, कि वे इस दो हफ्ते के समय का उपयोग मानवता को बचाने के लिए करते हैं, या फिर अपनी ढहती हुई इज़्ज़त को किसी और तरीके से संवारने की कोशिश में जुटे रहते हैं।

ईरान की धरती पर गिरे हर बम ने उसके इरादों को कमजोर करने के बजाय और भी ज्यादा मजबूत किया है। इज़रायल का पक्ष जो कभी बहुत आक्रामक था, वह भी अब चुप्पी साधे बैठा है क्योंकि उसे समझ आ गया है कि जंग का अंत उनके पक्ष में नहीं होने वाला। ट्रम्प का यह कार्यकाल उनकी उस छवि के विपरीत रहा है जो वे दिखाना चाहते थे, और शाहबाज़ शरीफ़ का इस्तेमाल उनकी इसी कमजोरी को ढकने के लिए किया गया। अंत में, यह जंग हमें याद दिलाती है कि बारूद के ढेर पर बैठकर आप किसी का दिल और दिमाग नहीं जीत सकते। मानवता की पुकार आज सबसे ऊपर है, और इस युद्ध का स्थायी रूप से थमना ही विश्व शांति की एकमात्र राह है। ईरान का हौसला और अमेरिका की हताशा आज के वैश्विक इतिहास के सबसे बड़े अध्याय बन चुके हैं। सुपर पावर का यह मौन सरेंडर दुनिया के नए शक्ति संतुलन की ओर एक बड़ा और निर्णायक इशारा है।