विकसित भारत का भाग्य, भविष्य व भय के मध्य खड़ा है कृत्रिम बुद्धिमत्ता

Artificial Intelligence stands between the fate, future and fear of a developed India

एआई इम्पैक्ट 2026 इस द्वंद्व का प्रतीक था—एक ओर भारत का स्वर्णिम स्वप्न है, तो दूसरी ओर भारत का भय। मोदी मिशन और वैष्णव विजन भारत को एआई महाशक्ति बनाने का संकल्प लेते हैं, जो विदेशी निवेश, तकनीकी साझेदारी और रोजगार की अनंत संभावनाएँ भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर प्रस्तुत करेंगी।

विनोद कुमार सिंह

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी नई दिल्ली स्थित भव्य भारत मंडपम में 16 से 20 फरवरी 2026 तक आयोजित एआई इम्पैक्ट 26 का भव्य सम्मेलन सम्पन्न हो गया है। यह स्वर्णिम पल आधुनिक भारत के इतिहास में एक निर्णायक क्षण के रूप में दर्ज किया जाएगा। यह एक अंतरराष्ट्रीय तकनीकी सम्मेलन मात्र नहीं, बल्कि एक दृढ़ इच्छाशक्ति व सभ्यतागत घोषणा थी—कि भारत अब अपनी नीति व नियति कृत्रिम बुद्धिमत्ता की शक्ति से गढ़ना चाहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के नेतृत्व में यह आयोजन भारत की उस महत्त्वाकांक्षा का प्रतीक बना, जिसमें तकनीक विकास का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का दर्शन बन रही है। जिसकी झलक हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उद्घाटन भाषण में स्पष्ट दिखी। उन्होंने जिस आत्मविश्वास से कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारत का भाग्य और भविष्य है, उनका यह कथन किसी राजनीतिक भाषण से अधिक एक रणनीतिक उद्घोष था।

यह विकसित भारत का भाग्यविधाता और भारतीयों के स्वर्णिम भविष्य का निर्माता होगा। वह भारत, जो सदियों तक औपनिवेशिक युग में औद्योगिक क्रांति से वंचित रहा, जिसने सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति में सेवा क्षेत्र तक स्वयं को सीमित रखा, वह अब तीसरी बड़ी तकनीकी क्रांति—कृत्रिम बुद्धिमत्ता—में नेतृत्व की प्रबल आकांक्षा रखता है। मोदी सरकार के लिए एआई केवल तकनीकी उपकरण नहीं, बल्कि विकसित भारत 2047 को नई गति देकर नव-निर्माण करने का माध्यम है। जिस प्रकार रेल, बिजली व सड़क राष्ट्र-निर्माण की आधारशिला बनी हैं, इक्कीसवीं सदी में डेटा, एल्गोरिद्म और सुपरकंप्यूटिंग को राष्ट्रीय बुनियादी ढाँचे के रूप में देखा जा रहा है। मोदी ने एआई को “डिजिटल स्वराज” का मार्ग बताया, जिसमें भारत तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता और नियंत्रक होगा।

वहीं केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव का विजन इस स्वप्न को संस्थागत ढाँचा देने का प्रयास है। उन्होंने एआई को राष्ट्रीय अवसंरचना की संज्ञा देते हुए कहा कि भारत को अपने स्वयं के फाउंडेशन मॉडल, राष्ट्रीय डेटा ग्रिड और सुपरकंप्यूटिंग क्षमता विकसित करनी होगी। उनका मानना है कि एआई भारत के लिए वही भूमिका निभाएगा, जो बीसवीं सदी में रेलवे और बिजली ने निभाई—देश को जोड़ने और गति देने की भूमिका।

एआई इम्पैक्ट सम्मेलन में कई रणनीतिक घोषणाएँ की गईं, जो भारत के तकनीकी भविष्य की दिशा व दशा निर्धारित करती हैं। सरकार ने राष्ट्रीय एआई कंप्यूट ग्रिड, स्वदेशी भाषा मॉडल, सरकारी सेवाओं में एआई के व्यापक उपयोग, स्वास्थ्य और शिक्षा में डिजिटल प्लेटफॉर्म, स्मार्ट शहरों और रक्षा प्रणालियों में एआई-आधारित समाधान विकसित करने की प्रतिबद्धता दोहराई। भारत को एआई अनुसंधान, स्टार्टअप और उद्योग का वैश्विक केंद्र बनाने के लिए नीति, वित्त और अवसंरचना के समन्वित प्रयासों की घोषणा की गई।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस सम्मेलन की एक प्रमुख उपलब्धि विदेशी निवेश को आकर्षित करने की दिशा में रही। वैश्विक टेक कंपनियों, निवेश फंडों और बहुराष्ट्रीय निगमों ने भारत के एआई पारिस्थितिकी तंत्र में निवेश की रुचि दिखाई। डेटा सेंटर, क्लाउड अवसंरचना, सेमीकंडक्टर, चिप डिजाइन और एआई स्टार्टअप में अरबों डॉलर के निवेश प्रस्तावों की चर्चा हुई। भारत को एआई निर्माण और अनुसंधान का वैश्विक हब बनाने के लिए कई अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों की घोषणा की गई, जो संकेत है कि वैश्विक पूंजी भारत को अगली तकनीकी क्रांति का महत्वपूर्ण केंद्र मान रही है।

विदेशी निवेश के साथ रोजगार की संभावनाएँ भी इस सम्मेलन का केंद्रीय विषय रहीं। सरकार और उद्योग जगत का दावा है कि एआई भारत में लाखों नई नौकरियाँ पैदा करेगा—डेटा वैज्ञानिक, एआई इंजीनियर, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ, चिप डिजाइनर, डिजिटल सेवा प्रदाता और तकनीकी प्रशिक्षक के क्षेत्रों में। साथ ही एआई-आधारित स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और प्रशासनिक सेवाओं में नए प्रकार के रोजगार उत्पन्न होंगे। भारत की विशाल युवा जनसंख्या को एआई युग के लिए कौशल प्रदान कर वैश्विक कार्यबल का नेतृत्व करने के लिए तैयार किया जाएगा।

वहीं दूसरी ओर इतिहास हमें सिखाता है कि हर तकनीकी क्रांति अवसरों के साथ विस्थापन भी लाती है। उदाहरणस्वरूप, औद्योगिक क्रांति ने अनेक पारंपरिक कारीगरों को विस्थापित किया, सूचना क्रांति ने डिजिटल डिवाइड को जन्म दिया और एआई क्रांति मानव श्रम के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा कर रही है। मशीनें न केवल शारीरिक श्रम, बल्कि बौद्धिक श्रम भी करने लगी हैं। पत्रकारिता, बैंकिंग, कानून, शिक्षा, चिकित्सा और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में एआई का प्रवेश तेजी से हो रहा है। आम आदमी के मन में यह भय स्वाभाविक है कि कहीं यह नई तकनीक उसकी आजीविका न छीन ले।

एक ओर सरकार कौशल विकास और पुनःप्रशिक्षण की बात करती है, परंतु भारत जैसे विशाल और विविध समाज में यह कार्य कितना प्रभावी होगा, यह एक खुली चुनौती है। ग्रामीण, असंगठित और कम शिक्षित श्रमिक वर्ग के लिए एआई युग में समायोजन करना आसान नहीं होगा। यदि एआई नीति सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा सुधार और रोजगार पुनर्गठन के साथ नहीं जुड़ी, तो यह तकनीकी प्रगति सामाजिक असंतोष का कारण बन सकती है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं और मजदूर संगठनों के प्रतिनिधियों का मानना है कि मानव निर्णयों पर मशीन का प्रभाव बढ़ रहा है। यदि शासन, न्याय और सुरक्षा में एआई का उपयोग बढ़ता है, तो मानवीय विवेक, नैतिकता और संवेदना का स्थान एल्गोरिद्म ले सकता है। एल्गोरिद्म निष्पक्ष होने का दावा करता है, परंतु वह भी मानव-निर्मित होता है और उसमें मानव पूर्वाग्रह समाहित हो सकते हैं। लोकतंत्र में अंतिम निर्णय मानव प्रतिनिधियों और संस्थाओं के हाथ में होना चाहिए, परंतु एआई की बढ़ती भूमिका लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को जटिल बना सकती है।

डेटा और गोपनीयता का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। एआई डेटा पर आधारित है; डेटा आधुनिक युग का नया तेल बन चुका है। नागरिकों की निजी जानकारी, व्यवहार, स्वास्थ्य, शिक्षा और वित्तीय विवरण एआई प्रणालियों में प्रवाहित होंगे। दबी जुबान में चर्चा हो रही है कि आखिर इस डेटा का स्वामी कौन होगा—नागरिक, सरकार या कॉर्पोरेट जगत? भारत में डेटा संरक्षण कानून विकसित हो रहे हैं, परंतु आम नागरिक के मन में यह आशंका है कि कहीं उसकी निजता तकनीकी प्रगति की बलि न चढ़ जाए।

डिजिटल असमानता का प्रश्न भारत के लिए विशेष रूप से गंभीर है। भारत विविधता से भरा समाज है, जहाँ शहरी और ग्रामीण, अमीर और गरीब, शिक्षित और अशिक्षित के मध्य लंबी व गहरी खाई है। यदि एआई केवल शहरी, अंग्रेज़ी-भाषी और तकनीकी रूप से सक्षम वर्ग तक सीमित रहा, तो यह खाई और गहरी हो सकती है। सरकार भारतीय भाषाओं में एआई मॉडल विकसित करने की बात कर रही है, ताकि ग्रामीण और क्षेत्रीय भाषाओं के नागरिक भी लाभान्वित हों। यह एक सकारात्मक संकेत है, परंतु इसे नीति और संसाधनों के स्तर पर वास्तविक रूप देना चुनौतीपूर्ण होगा।

एआई इम्पैक्ट सम्मेलन 26 में भारत, अमेरिका और चीन की तकनीकी प्रतिस्पर्धा का संदर्भ भी स्पष्ट था। अमेरिका एआई अनुसंधान और नवाचार में अग्रणी है, चीन एआई को राज्य-नियंत्रित रणनीतिक उपकरण के रूप में विकसित कर रहा है, वहीं भारत तीसरा रास्ता खोज रहा है—लोकतांत्रिक, समावेशी और मानव-केंद्रित एआई विकास का मॉडल। यदि भारत इस मार्ग पर सफल होता है, तो वह केवल तकनीकी शक्ति नहीं, बल्कि नैतिक वैश्विक नेतृत्व भी स्थापित कर सकता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल तकनीक नहीं, बल्कि मानव चेतना, समाज और सभ्यता को पुनर्परिभाषित करने वाली शक्ति है। भारतीय संस्कृति में बुद्धि को विवेक, धर्म और करुणा से जोड़ा गया है। परंतु मशीन की कृत्रिम बुद्धि में यह विवेक और करुणा कहाँ से आएगी? यह प्रश्न केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व दार्शनिक भी है। भारत, जो योग, दर्शन और मानव चेतना के अध्ययन की प्राचीन परंपरा रखता है, एआई युग में मानव और मशीन के संबंध पर वैश्विक विमर्श का नेतृत्व कर सकता है।

एआई इम्पैक्ट 2026 इस द्वंद्व का प्रतीक था—एक ओर भारत का स्वर्णिम स्वप्न है, तो दूसरी ओर भारत का भय। मोदी मिशन और वैष्णव विजन भारत को एआई महाशक्ति बनाने का संकल्प लेते हैं। विदेशी निवेश, तकनीकी साझेदारी और रोजगार की संभावनाएँ भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर प्रस्तुत करती हैं। यदि इन अवसरों का संतुलित और न्यायपूर्ण उपयोग किया गया, तो भारत इक्कीसवीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रमुख स्तंभ बन सकता है।

परंतु यह विकास की यात्रा तभी सफल होगी, जब एआई को लोकतांत्रिक, समावेशी और मानव-केंद्रित बनाया जाएगा। तकनीक को पूंजी और सत्ता के केंद्रीकरण का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानव कल्याण का माध्यम बनाना होगा। रोजगार पुनर्गठन, शिक्षा सुधार, डिजिटल समावेशन और डेटा संरक्षण को एआई नीति के साथ एकीकृत करना होगा।

एआई भारत का भाग्य और भविष्य बन सकता है, परंतु केवल तब, जब यह मानवता का विस्तार बने, उसका विकल्प नहीं। अतः भारत के सामने अवसर भी है और चुनौती भी। एआई इम्पैक्ट 2026 ने भविष्य का द्वार खोल दिया है—अब यह भारत पर निर्भर है कि वह इस द्वार से होकर एक न्यायपूर्ण, समावेशी और विवेकपूर्ण तकनीकी सभ्यता की ओर बढ़ता है या फिर एक ऐसे मशीनी युग की ओर, जहाँ मानव मात्र एक उपभोक्ता बनकर रह जाए।

भारत का भाग्य और भविष्य अब एल्गोरिद्म, डेटा और मशीनों की प्रयोगशालाओं में लिखा जा रहा है, परंतु उसकी आत्मा अभी भी मानव विवेक, करुणा और लोकतंत्र में बसती है। यही द्वंद्व एआई युग के भारत की सबसे बड़ी सफलता की कहानी भी होगा और चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी भी—जो अभी भविष्य के गर्भ में छिपी है।