इस्लामिक देश मलेशिया के कलाकारों ने रच डाली राधा-कृष्ण की दिव्य लीला

Artists from the Islamic country Malaysia created the divine play of Radha-Krishna

पतंगों के रंगों में कृष्ण लीला: मलेशियाई कलाकारों का भारतीय स्पर्श

विवेक शुक्ला

हाल ही में राजधानी दिल्ली में आयोजित तीसरा अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव न केवल एक रंगीन उत्सव रहा, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान और पर्यटन क्षेत्र को नई गति प्रदान करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी साबित हुआ।

इस दौरान मलेशिया के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत राधा-कृष्ण लीला ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया, जो वैश्विक सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बना। ऐसे आयोजन न केवल स्थानीय पर्यटन को बढ़ावा देते हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को मजबूत करते हैं।

बीती 16 से 18 जनवरी 2026 तक बांसेरा पार्क में आयोजित इस महोत्सव का उद्घाटन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने किया, जिन्होंने इसे राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने और दिल्ली को पतंग उत्सवों का केंद्र बनाने की अपील की। गृह मंत्री अमित शाह ने बांसेरा पार्क में इसका उद्घाटन किया। यह पार्क, जो यमुना नदी के किनारे लगभग 40 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है, हजारों बांस के पौधों से सजा हुआ है और एक पर्यावरणीय तथा सांस्कृतिक स्थल के रूप में जाना जाता है।

उद्घाटन समारोह में शाह ने कहा कि भारत के लोग उत्सवप्रिय हैं, जैसा कि कवि कालिदास ने कहा था- “उत्सव-प्रिय जनाह”। उन्होंने मकर संक्रांति की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व पर प्रकाश डाला, और पतंग उड़ाने की परंपरा को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ा, जहां “साइमन गो बैक” जैसे नारे पतंगों पर लिखे जाते थे। दिल्ली के उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता भी इस अवसर पर उपस्थित थे। महोत्सव में 28 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पतंग कलाकारों ने भाग लिया, जिनमें भारत, नाइजीरिया, सीरिया, जिम्बाब्वे, कांगो आदि देशों के कलाकार शामिल थे। आकाश में उड़ती रंग-बिरंगी पतंगें स्वतंत्रता, संस्कृति और रचनात्मकता का प्रतीक बनीं।

महोत्सव का एक प्रमुख आकर्षण 17 जनवरी को मलेशिया के सुत्रा फाउंडेशन द्वारा प्रस्तुत ‘राधा-कृष्ण लीला’ का नृत्य-नाटक था। पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित मलेशियाई कलाकार दातुक रामली इब्राहिम द्वारा कोरियोग्राफ की गई यह प्रस्तुति राधा और कृष्ण के दिव्य प्रेम को दर्शाती है, जहां राधा की ‘मीठी समर्पण’ को केंद्र में रखा गया। यह ओडिसी नृत्य शैली में प्रस्तुत की गई, जो मलेशिया और भारत की सांस्कृतिक एकता को रेखांकित करती है। इस प्रदर्शन ने दर्शकों को भारतीय पौराणिक कथाओं के माध्यम से वैश्विक कलाकारों की व्याख्या से परिचित कराया। इसके अलावा, बुर्किना फासो की ‘कांटीगुई’ नृत्य मंडली, किर्गिज गणराज्य की ‘अलाम’ लोककला मंडली और ‘अदेमी’ नृत्य मूह ने भी अपनी कला प्रस्तुत की।

कुल मिलाकर, 148 कलाकारों ने आठ देशों से भाग लिया, जिसमें कजाकिस्तान, मालदीव, लिथुआनिया (इंडो-लिथुआनियन प्रस्तुति) और उज्बेकिस्तान शामिल थे।

यह महोत्सव भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) और दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) द्वारा आयोजित किया गया, जो विदेश मंत्रालय के तहत कार्य करता है। आईसीसीआर की महानिदेशक के. नंदिनी सिंघला ने इसे भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का मंच बताया, जो संवाद, सद्भाव और आपसी समझ को मजबूत करता है।

महोत्सव में एक विशेष पवेलियन भी था, जहां पतंगों के इतिहास, युद्ध में उनकी भूमिका, सैन्य निगरानी और संचार के उपयोग को प्रदर्शित किया गया। 18 जनवरी को समापन पर मालदीव की फ्यूजन बैंड ‘2ऑफअस’, इंडो-लिथुआनियन नृत्य ‘रासोस- द ड्यूड्रॉप ऑफ एक्सपीरियंस’ और उज्बेकिस्तान की ‘तरोना’ नृत्य मंडली ने प्रस्तुति दी।

ऐसे आयोजन पर्यटन क्षेत्र को कैसे गति प्रदान करते हैं?

सबसे पहले, वे स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। दिल्ली, जो पहले से ही ताजमहल, लाल किला जैसे ऐतिहासिक स्थलों के लिए प्रसिद्ध है, अब बांसेरा पार्क जैसे नए पर्यटन स्थलों को बढ़ावा दे रही है। महोत्सव के दौरान हजारों लोग यहां आए, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ हुआ- होटल, परिवहन, भोजन और हस्तशिल्प की बिक्री में वृद्धि। वैश्विक कलाकारों की भागीदारी से सांस्कृतिक पर्यटन को प्रोत्साहन मिलता है, जहां पर्यटक न केवल दर्शनीय स्थलों को देखते हैं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक अनुभव प्राप्त करते हैं। उदाहरण के लिए, राधा-कृष्ण लीला जैसी प्रस्तुतियां विदेशी पर्यटकों को भारतीय पौराणिक कथाओं से जोड़ती हैं, जो उन्हें भारत की गहराई समझने में मदद करती है।

पर्यटन विशेषज्ञों के अनुसार, सांस्कृतिक उत्सव पर्यटन राजस्व को 20-30% तक बढ़ा सकते हैं। भारत में गोवा कार्निवल, राजस्थान डेजर्ट फेस्टिवल जैसे आयोजन इसका प्रमाण हैं। दिल्ली पतंग महोत्सव को राष्ट्रीय उत्सव बनाने की अपील से यह पूरे देश में फैल सकता है, जिससे पर्यटन सर्किट मजबूत होंगे। अंतरराष्ट्रीय कलाकारों का अन्य शहरों जैसे चंडीगढ़, शिलांग, जम्मू, बेंगलुरु और वडोदरा में प्रदर्शन पर्यटन को विकेंद्रित करता है, जो ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों को लाभ पहुंचाता है। इससे सॉफ्ट पावर बढ़ती है, जहां संस्कृति के माध्यम से देश की छवि मजबूत होती है।

कोविड महामारी के बाद पर्यटन क्षेत्र में उछाल आया है, और ऐसे उत्सव इसे और तेज करते हैं। वे स्थानीय हस्तशिल्पियों, कलाकारों और छोटे व्यवसायों को प्लेटफॉर्म देते हैं। उदाहरणस्वरूप, पतंग बनाने वाले कारीगरों को अंतरराष्ट्रीय बाजार मिलता है। पर्यावरणीय दृष्टि से, बांसेरा पार्क जैसे स्थल इको-टूरिज्म को बढ़ावा देते हैं, जहां पर्यटक प्रकृति और संस्कृति का संयोजन अनुभव करते हैं।

निष्कर्ष में, दिल्ली अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव ने सांस्कृतिक संवाद को मजबूत किया और पर्यटन को नई दिशा दी। अमित शाह के उद्घाटन से लेकर मलेशियाई कलाकारों की राधा-कृष्ण लीला तक, यह उत्सव एकता का प्रतीक बना। सरकार को ऐसे आयोजनों को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि भारत पर्यटन हब के रूप में उभरे। इससे न केवल आर्थिक लाभ होगा, बल्कि वैश्विक सद्भाव भी बढ़ेगा।