बड़ी भूल

big mistake

प्रमोद भार्गव

अपनी सारी जमीन-जायदाद की रजिस्ट्री अपने मौसेरे भाई रामनिवास के नाबालिग बेटों के नाम कराके भोला दादा गांव लौटे तब बुजुर्ग दीनदयाल ने भोला का भविष्य बांचते हुए कहा,”भोला ने अपने हाथों,अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली।अब जाके दुर्दिन दूर नहीं!”

दीनदयाल ने आपनी पूरी जिंदगी संघर्ष और कठोर परिश्रम में गुजारते हुए,अपनी हैसियत बनाई थी।इसलिए वे उड़ती चिड़िया की चाल पहचानने का अनुभव रखते थे।उम्र के अस्सी वर्ष पार हो जाने के बाद भी उनकी वाणी का खरापन गया नहीं था। सही वक्त पर उचित सलाह देना आज भी उनके स्वभाव का सबसे बड़ा उदात्त गुण था।इस कारण गांव तो गांव आसपास के गांव के लोग भी उनसे सलाह-मशविरा ले लिया करते हैं।

भोला दादा विचित्र स्वभाव के व्यक्ति रहे।उनका जीवन हमेशा अमरबेल की तरह परावलम्बी रहा।जीवन के पचास वर्ष उन्होंने अम्मां पर आश्रित रहते हुए गुजारे।मां के वे इकलौते बेटे थे।भोला दादा जब दस बरस के थे,तब उनके पिता उफान मारती सिंध नदी को पार कर लेने के भ्रम में खतरा मोल ले बैठे और लहरों में हमेशा के लिए समा गए।उन्हें तैरना तो खूब आता था, लेकिन बैरी समय की चाल के आगे पानी की ताकत का अनुमान लगाने की बड़ी भूल कर बैठे थे।

भोला दादा 20 वर्ष की उम्र के हुए तो अम्मां ने पास के गांव के रामप्रसाद की पुत्री से कुंडलियों का मिलान कराकर बेटे की शादी कर दी।अम्मां जब जीवित थीं,तब बताती थीं,”बेटा-बहू की जन्मपत्रियों का ऐसा मिलान हुआ है कि पूरे बत्तीस गुण मिले हैं।आज तक इस गांव में और कोई के इतने गुण नहीं मिले।बड़ी भागवान थी बहू!जिंदा रहती तो सदा लक्ष्मी बरसती रहती।पर जा मोड़ा के ही भाग में सुख नहीं लिखे थे, सो,पहले ही जापे में प्रभु को प्यारी हो गई।बहू की बजाय राम मोय उठा लेते तो मोय मुक्ति मिल जाती और भोला को जीवन संभरो रहतो।” इतना कहते-कहते उनकी आंखों में आंसू छलक पड़ते और वे धोती के पल्लू से आंसू पोंछते हुए सुबक पड़तीं।

भोला दादा के पुनर्विवाह की भी चर्चा चली,परंतु बात बनने से पहले ही अनहोनी घट गई ।वे अपने ही खेत में ज्यादा काम कर लेने की होड़ में फटाफट ज्वार काटने लगे। इस जल्दबाजी में उनकी आंख ज्वार के पत्ते की फटकार लग गई।वे रिरियाते हुए स्वाफी को मुंह में लेकर सांस से गरम करते और आंख सेंक लेते ।किंतु आराम नहीं मिला। अम्मां ने वैद्य-हकीमों से खूब उपचार कराया।पर आराम नहीं मिला।आंख की रोशनी हमेशा के लिए जाती रही।आंख फूट जाने की खबर पूरे इलाके में फैल गई।अब अभागे विधुर को कोई अपनी पुत्री क्यों ब्याहे?

एक आंख की रोशनी विलुप्त होने के बाद भोला दादा की मति भी कुंद होती चली गई।उनके स्वभाव में चिड़-चिड़ापन आ गया।आंख की दिव्यांगता को लेकर कोई उन पर कटाक्ष करता तो वे गाली-गलौंच पर उतर आते।यहां तक की कभी-कभी तो मारपीट की नौबत भी आन पड़ती।ऐसे में उनका बचाव मौसेरे भाई रामनिवास जरूर करते,सो भोला उन्हें हिमायती मानकर चलता।वैसे भी उनके मन की कुटिल चाल समझने की बुद्धि,बेचारे भोला में कहां थी?इन्हीं तकरारों की बेचैनियों में भोला दादा पचास की उम्र पार कर गए।कुछ दिनों बाद अम्मां भी चल बसीं।

अम्मां की मौत के बाद भोला के पीछे गांव के अनेक लोग लग गए।सबकी निगाहें उनकी जमीन-जायदाद हड़प लेने में लग गईं।पर दादा पर दांव चला रामनिवास का।अब था भी वह मौसेरा भाई और हमउम्र ,सो घुटने अपने की ओर झुकना स्वाभाविक थे।भोला चूंकि रामनिवास के मित्रवत थे,इसलिए उन्हें रामू कहकर पुकारते थे। वैसे भी रामू उम्र में भोला से बड़े थे।रामू अब भोला को अपने घर ले जाने लग गए।रामू की पत्नी उन्हें रिश्ते में देवर होने के कारण लाला कहकर पुकारते हुए दुलार जतातीं।चाय-नाश्ता कराते हुए उनकी खूब आवभगत होती।उन्हें आराम के लिए अटा के नीचे वाले कमरे में खाट बिछाकर सुला देतीं।इस समय वे अपने दोनों बेटों को भोला के हाथ-पैर दबाने में भी लगा देतीं और खुद उनके सिराने बैठकर बीजना झलने लग जातीं।ऐसे सुख की अनुभूति तो भोला को घरवाली के जीवित रहते हुए भी कभी नहीं हुई।सो जीवन खूब आनंदमयी होता चला गया।

रामू के चंगुल में आए भोला को जब दीनदयाल ने देखा तो एकांत में मौका पाकर नसीहत दी,”देख भोला तू तो ठहरा निरा मूढ़!रामू और बाकी लुगाई की रस-पगी बातों के बहकावे में मत आ जाना?तूने कहीं जायदाद की लिखा-पढ़ी कर दी तो तेरे गुलछर्रे उड़ाने की जो मौज-मस्ती चल रही है, वह सब चार दिन की चांदनी बनकर रह जाएगी।हम तो तुझे बड़े-बुजुर्ग होने के नाते समझाइस दे रहे हैं।बांकी तू जान,तेरा काम जाने!”

नहीं काका ! तुमसे सलाह लिए बिना कोई लिखतम करने वाला नहीं हूं।विश्वास रखो।”

परंतु जिस दिन रामू के साथ भोला दादा रजिस्ट्री कराने तहसील मुख्यालय गए तो किसी को हवा तक नहीं लगी।वह तो अगले दिन पटवारी ने गांव आने पर बताया कि भोला ने रामू के नाबालिग पुत्रों के नाम जमीन-जायदाद की रजिस्ट्री करा दी। इसके बाद से रामू,उसकी पत्नी और बच्चों के आचरण में परिवर्तन का सिलसिला व हस्तक्षेप शुरू हो गया।भोला के घर के कुछ हिस्से की तोड़-फोड़ कराकर नए निर्माण के साथ कायाकल्प कर लिया गया।फिर एक दिन शुभ मुहूर्त में सत्यनारायण भगवान की कथा कराकर गृह प्रवेश भी हो गया।अब भोला ने अनुभव किया कि रामू के लड़के उनकी कही बात की अवज्ञा करने लगे हैं।लड़के अब उनकी आज्ञा का पालन नहीं करते,बल्कि कसैला मुहं बनाकर ठेंगा दिखा कर मुख फेर लेते हैं।रामू की पत्नी का भी देवर पर न्यौछावर होने वाला दुलार जाता रहा।इस उपेक्षित बर्ताव में भोला अपमान बोध अनुभव करने लगे।अतएव अब घर से अब उनका मोहभंग होने लगा।वे अब उन लोगों के साथ उठने-बैठने लगे,जिनके चरित्र में बिगड़े होने की बदनामी चस्पा थी। अब बिगड़ैलों की संगत का असर भोला पर दिखने लगा।एक दिन उन्होंने मान-मर्यादा की सभी सीमाएं लांघ दीं।दारू का भभूका मुहं से छोड़ते हुए वे घर में घुसने लगे तो रामू की पत्नी ने भोला लाला को धकियाते हुए ऐसी लताड़ लगाई कि भोला चारों खाने चित्त गिरे।फिर वे बिफर पड़ीं,"तुमने तो पूरी लाज-शर्म खूंटी पर टांग दी।रोजाना खाने-पीने लग गए।तुम्हें क्या है निर्वंशी, हमें तो मोड़ा-मोड़ीन का भविष्य बनाना है।खबरदार फिर कभी खा-पीकर देहरी पर पैर रखा तो पैर तोड़ दूंगी।" नशे की खुमारी में धूल झाड़ते-पोंछते भोला गिरते-पड़ते उठे और रोते-रिरियाते चिल्ला कर हुंकारने लगे,"मेरी बिल्ली,मोइये म्याऊं।मेरे घर से मेरी ही बेदखली!है भगवान कैसो जमानों आ गयो।सुनो,गांव वालो,सुनियों दीनदयाल काका...." लोग घरों से निकलकर तमाशा देखने लगे...। भोला को जैसे समर्थन मिला।

वे बोले,"देखो इस परमार्थी रामू की घरवाली को...! जब जायदाद जाके लडकों के नाम नहीं लिखी थी, तब-तक मेरी घी से चुपड़ी बातों से चिरौरी करती थीI अब मेरे घर से मोय निकाल रही है।कतई ईमान-धर्म नहीं रहा।दीनदयाल काका ने मुझे जो नसीहत दी थी,वह अक्षर-अक्षर सही निकली।मेरी ही मति मारी गई थी,जो मैंने तुमरी नसीहत नजरअंदाज कर दी।लेकिन अब इस कुलटा ने अपना असली रूप दिखा दिया।" रामू अभी तक घर की खिड़की से सब देख-सुन रहे थे।लेकिन अब पत्नी को कुलटा कह देने से उनके सब्र का बांध टूट गया।वे फुर्ती से बाहर आते हुए बोले,"लातों के भूत बातों से नहीं मानते।अब इसका मुहं काला करना ही पड़ेगा...।"और वे भोला पर टूट पड़े। असहाय भोला चिल्लाए,"देखो इस हरामजादे को कल तक अपनी वाचाल लुगाई को मेरे पास सुलाने में जाए लाज-शर्म नहीं आती थी।अब मुझ लाचार पर लात उठा रहा है।पापी कोड़ी होकर मरेगा...!" भोला के लांक्षण से रामू, उनकी पत्नी और बेटे तिलमिला गए।उन्होंने मिलकर भोला के हाथ-पैर पकड़कर घसीटा और गांव के बाहर घूरे पर छोड़ आए...।