रावेल पुष्प
कोलकाता : अंतर्राष्ट्रीय संस्था इस्सार ने रोटरी सदन के कक्ष में त्रिदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लेखकों और चिंतकों का एक सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें कई सत्रों में विभिन्न विश्व शांति को समर्पित कार्यक्रम निर्धारित थे। आयोजित किए गए कार्यक्रमों की श्रृंखला में एक कार्यक्रम साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखक श्यामल भट्टाचार्य के युद्ध पर आधारित उपन्यास बुखारी पर चर्चा थी,जिसके अब तक 14 भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं। इस महत्वपूर्ण उपन्यास पर हुई चर्चा सत्र की अध्यक्षता कर रहे थे- पद्मश्री सितांशु यशचंद्र जी और संचालन कर रहे थे तन्मय बीर।
संचालन करते हुए तन्मय बीर ने कहा कि आज फिर एक विश्व युद्ध की कगार पर सारी दुनिया खड़ी है और ऐसे समय में इस पुस्तक पर चर्चा करना बेहद सामयिक और सार्थक होगा। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि हमारी सभ्यता का दुखांत पक्ष यही है कि हम एक युद्ध रोकने के लिए फिर एक और युद्ध करते हैं। युद्ध में वैसे तो देखने में लगता है कि ये द्विपक्षीय है पर इसके परिणाम बहुपक्षीय होते हैं।
इस चर्चा में भाग लेते हुए कोलकाता ट्रांसलेटर्स फ़ोरम के अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार रावेल पुष्प ने कहा कि श्यामल भट्टाचार्य का उपन्यास जम्मू कश्मीर के उत्तरी भाग में 1984 से चल रही युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है जिससे उस क्षेत्र के सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात सैनिकों के जीवन और मृत्यु की गाथा को बखूबी उकेरा गया है। वहां के तापमान माइनस 40 डिग्री से 50 डिग्री में सैनिकों की जितनी मौतें युद्ध से होती हैं उससे कहीं अधिक भयानक ठंड के कारण हो जाती हैं।इसके लेखक श्यामल जो स्वयं वायु सेवा में एक सैनिक थे और तमाम कठिनाइयों से दो दर्शकों तक रुबरु हुए थे। लेखक पात्रों के माध्यम से यह भी बताता है कि दो देशों के नेता युद्ध का खेल खेलते हैं और ठंडे कमरों में बैठकर भाषण देते हैं।
रावेल पुष्प ने उपन्यास की कुछ अन्य घटनाओं का जिक्र करते हुए युद्ध पर लिखे गए उपन्यासों की फेहरिस्त में श्यामल भट्टाचार्य के इस उपन्यास को मील का पत्थर करार दिया।
इस चर्चा में भाग लेते हुए स्पेनिश में अनुवाद की सिद्धहस्त जया चौधरी ने कहा हैं कि स्पैनिश लिटरेचर पढ़ने से उन्होंने अलग-अलग देशों के लेखकों के लिखे कुछ बेहतरीन वॉर नॉवेल पढ़े हैं, और बंगाली में लिखा गया ‘बुखारी’ क्वालिटी के मामले में उनके जैसा ही है, लेकिन कई मायनों में यूनिक है, एक असाधारण नॉवेल है।
मूल रूप से बांग्ला से सबसे पहले हुए हिंदी अनुवाद की अनुवादिका श्रीमती रुपाली मजूमदार ने अनुवाद के दौरान आई चुनौतियों पर चर्चा करते हुए बताया कि वे स्वयं भी सैनिक परिवार से जुड़ी हुई हैं और इसे करने में लगभग एक वर्ष का समय लग गया था।
उसके बाद स्वयं लेखक श्यामल भट्टाचार्य ने इस उपन्यास की लेखन प्रक्रिया पर चर्चा करते हुए कहा कि 13 अप्रैल 1984 से दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध के मैदान में चल रहे इस लंबे युद्ध के बारे में लिखते हुए, वह युद्ध में मरने वालों के बारे में कम और बचने वालों के बारे में ज़्यादा लिखते हैं। वह ज़िंदा रहने के बारे में लिखते हैं, कि कैसे उन्होंने अपनी हदें पार कीं और बच गए, कैसे यह युद्ध ग्लेशियरों को खत्म कर रहा है, उन्हें ज़हरीला बना रहा है, और इंसानियत को बहुत ज़्यादा खत्म कर रहा है।
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में पद्मश्री सीतांशु यशचन्द्र ने कहा कि उन्होंने यह नॉवेल दो दशक पहले पढ़ा था। यह नॉवेल सिर्फ़ एक वॉर नॉवेल नहीं है, यह एक एंटी-वॉर नॉवेल है, एक ऐसा नॉवेल जो इंसानियत को वॉर चाहने वालों के हाथों से बचाने के लिए लिखा गया है, और इसी चाहत की वजह से इसका 14 भाषाओं में ट्रांसलेशन हो चुका है। इसे पहले ही इंडियन लिटरेचर के एक क्लासिक नॉवेल के तौर पर पहचान मिल चुकी है। इसका दुनिया की सभी भाषाओं में ट्रांसलेशन होना चाहिए। वह इस नॉवेल के बारे में मशहूर एनवायरनमेंटलिस्ट सुंदरलाल बहुगुणा की कही बातों का भी सपोर्ट करते हैं। इस नॉवेल ने दबे हुए ग्लेशियर के खामोश होठों को भाषा दी है, जो धरती माँ की तकलीफ़ के बारे में लिखा गया है। यह नॉवेल सभी को पढ़ना चाहिए, और आने वाली पीढ़ियों को सौंपना चाहिए।
आखिर में कार्यक्रम के संयोजक इस्सार की ओर से सुदीप्तो चटर्जी ने सभी को धन्यवाद दिया।
तृतीय विश्व युद्ध की आहट के बीच युद्ध विषयक उपन्यास बुखारी को केंद्र में रखकर चर्चा करना सभी श्रोताओं को बड़ा ही सार्थक और समीचीन लगा।





