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	<title>आलेख Archives - Ravivar Delhi</title>
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	<description>National Hindi Newspaper &#38; Magazine</description>
	<lastBuildDate>Thu, 09 Jul 2026 13:12:29 +0000</lastBuildDate>
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	<title>आलेख Archives - Ravivar Delhi</title>
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		<title>बांकीपुर उपचुनाव: भाजपा के अभेद्य किले में प्रशांत किशोर की अग्निपरीक्षा</title>
		<link>https://ravivardelhi.com/bankipur-by-election-prashant-kishors-trial-by-fire-in-bjps-impregnable-stronghold/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ravivar Delhi]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 09 Jul 2026 20:11:00 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[बिहार]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[Bankipur By-election: Prashant Kishor's Trial by Fire in BJP's Impregnable Stronghold]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अजय कुमार बिहार की राजनीति में बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव अब केवल एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है। यह मुकाबला तीन बड़े राजनीतिक संदेशों की लड़ाई बन चुका है। एक तरफ भाजपा अपने तीन दशक पुराने गढ़ को बचाने की चुनौती से जूझ रही है, दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल अपने परंपरागत वोट बैंक &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>अजय कुमार</strong></p>



<p>बिहार की राजनीति में बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव अब केवल एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है। यह मुकाबला तीन बड़े राजनीतिक संदेशों की लड़ाई बन चुका है। एक तरफ भाजपा अपने तीन दशक पुराने गढ़ को बचाने की चुनौती से जूझ रही है, दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल अपने परंपरागत वोट बैंक को एकजुट रखने की कोशिश में है, जबकि जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर पहली बार चुनाव मैदान में उतरकर अपनी पूरी राजनीतिक विश्वसनीयता दांव पर लगा चुके हैं। यही वजह है कि राजधानी पटना की यह सीट पूरे बिहार की सबसे चर्चित चुनावी रणभूमि बन गई है। हालिया घटनाक्रम ने मुकाबले को और रोचक बना दिया है। जन सुराज के वरिष्ठ नेता रितेश रंजन उर्फ बिट्टू सिंह ने पार्टी छोड़कर एनडीए प्रत्याशी के समर्थन का ऐलान कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि प्रशांत किशोर चुनावी रणनीतिकार तो हो सकते हैं, लेकिन राजनीतिक दल चलाने की क्षमता उनमें नहीं दिखती। इसी बीच प्रशांत किशोर ने अपने नामांकन कार्यक्रम में भी बदलाव करते हुए अब 13 जुलाई को नामांकन करने का फैसला किया है। पार्टी अध्यक्ष मनोज भारती ने कार्यकर्ताओं के लिए नया सर्कुलर जारी कर पूरी ताकत के साथ नामांकन कार्यक्रम को सफल बनाने का आह्वान किया है। दूसरी ओर राजद ने रेखा गुप्ता को उम्मीदवार बनाया, लेकिन उम्मीदवार घोषित होने के साथ ही पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा। पहले सांसद सुरेंद्र यादव ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह रेखा गुप्ता को नहीं जानते, फिर वरिष्ठ नेता भाई वीरेंद्र ने भी उम्मीदवार चयन पर सवाल उठा दिए। इतना ही नहीं, तेज प्रताप यादव की जनशक्ति जनता दल ने वीणा मानवी को मैदान में उतारकर महागठबंधन के वोटों में संभावित सेंध का संकेत दे दिया। कांग्रेस भी उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया से असहज दिखाई दे रही है। इन घटनाओं ने विपक्षी एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।</p>



<p>बांकीपुर का चुनावी इतिहास भाजपा के पक्ष में बेहद मजबूत रहा है। वर्तमान स्वरूप में 2010 के परिसीमन के बाद से यह सीट लगातार भाजपा के पास रही है, जबकि यदि पुराने पटना पश्चिम क्षेत्र को जोड़ दिया जाए तो 1995 से यहां भाजपा का दबदबा कायम है। नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा चार बार और उनके पुत्र नितिन नवीन लगातार पांच बार विधायक रहे। 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के नितिन नवीन को 98,299 वोट मिले थे, जबकि राजद की रेखा गुप्ता को लगभग 46 हजार और जन सुराज की उम्मीदवार वंदना कुमारी को केवल 7,717 वोट मिले थे। यानी भाजपा और जन सुराज के बीच करीब 90 हजार वोटों का अंतर था। यही आंकड़ा बताता है कि प्रशांत किशोर के सामने चुनौती कितनी कठिन है। फिर भी प्रशांत किशोर ने सुरक्षित सीट चुनने के बजाय भाजपा के सबसे मजबूत किले में उतरने का फैसला किया। उनका तर्क है कि यह चुनाव केवल जीत-हार का नहीं बल्कि बिहार की राजनीति की दिशा बदलने का प्रयास है। चुनावी रणनीतिकार के रूप में नरेंद्र मोदी से लेकर कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों के लिए रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर अब पहली बार खुद जनता से वोट मांग रहे हैं। पिछले कई महीनों से उन्होंने बांकीपुर में अलग तरह का चुनाव अभियान तैयार किया है। सुबह पार्कों में युवा टीम लोगों से संवाद करती है, दिन में महिला कार्यकर्ता घर-घर पहुंचकर महंगाई, शिक्षा और सुरक्षा जैसे मुद्दे उठाती हैं, जबकि शाम को नुक्कड़ सभाओं, चौपाल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए भाजपा और राजद दोनों पर हमला बोला जाता है। सोशल मीडिया से लेकर मोहल्ला स्तर तक जन सुराज ने हाईटेक और जमीनी प्रचार का मिश्रित मॉडल तैयार किया है।</p>



<p>लेकिन चुनाव केवल अभियान से नहीं जीते जाते। बांकीपुर का सामाजिक समीकरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस विधानसभा क्षेत्र में लगभग चार लाख मतदाता हैं। इनमें कायस्थ मतदाता निर्णायक माने जाते हैं, जिनकी संख्या लगभग 14 प्रतिशत बताई जाती है। भाजपा ने इसी समीकरण को ध्यान में रखते हुए अभिषेक कुमार को उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा वैश्य, सवर्ण, शहरी मध्यम वर्ग और भाजपा का पारंपरिक संगठनात्मक नेटवर्क भी इस सीट पर मजबूत माना जाता है। दूसरी ओर मुस्लिम मतदाता लगभग 8 से 10 प्रतिशत माने जाते हैं और उनका बड़ा हिस्सा भाजपा विरोधी मतदान करता रहा है। ऐसे में यदि विपक्ष बंटता है तो मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा राजद की ओर जाने की संभावना अधिक मानी जा रही है, क्योंकि राजद लगातार यह नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहा है कि भाजपा को वास्तविक चुनौती वही दे सकता है। प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी उम्मीद युवा मतदाता हैं। पेपर लीक, बेरोजगारी, पलायन, खराब शहरी व्यवस्था, जलजमाव, ट्रैफिक और शिक्षा जैसे मुद्दों को उन्होंने लगातार चुनावी बहस का केंद्र बनाया है। बांकीपुर शहरी सीट है और यहां पढ़े-लिखे तथा नौकरीपेशा मतदाताओं की संख्या ग्रामीण सीटों की तुलना में अधिक है। यही कारण है कि जन सुराज जातीय राजनीति से हटकर &#8216;गुड गवर्नेंस&#8217; और शहरी विकास का एजेंडा सामने रख रही है। लेकिन बिहार की चुनावी राजनीति का अनुभव बताता है कि अंतिम समय में जातीय ध्रुवीकरण अक्सर स्थानीय मुद्दों पर भारी पड़ता है।</p>



<p>इस चुनाव में भाजपा की रणनीति भी बदली हुई नजर आ रही है। पार्टी ने केवल उम्मीदवार घोषित कर चुनाव नहीं छोड़ा है, बल्कि संगठन के बड़े नेताओं को बांकीपुर में सक्रिय कर दिया है। नितिन नवीन स्वयं क्षेत्र में लगातार मौजूद हैं और पार्टी बूथ स्तर तक नेटवर्क मजबूत करने में जुटी है। भाजपा इस चुनाव को अपनी संगठनात्मक ताकत और शहरी वोट बैंक की परीक्षा मान रही है। दूसरी तरफ राजद इसे भाजपा के खिलाफ विपक्षी आधार बचाने की लड़ाई के रूप में देख रहा है। जबकि जन सुराज के लिए यह अस्तित्व और भविष्य दोनों का सवाल बन चुका है। एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में जन सुराज ने 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी का कुल मत प्रतिशत लगभग 2.44 प्रतिशत ही रहा। ऐसे में प्रशांत किशोर के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या वे कुछ महीनों के भीतर अपने संगठन को इतनी मजबूती दे पाए हैं कि भाजपा और राजद जैसे स्थापित दलों को सीधी चुनौती दे सकें। यदि जन सुराज का वोट शेयर कई गुना बढ़ता है, भले जीत न मिले, तब भी प्रशांत किशोर इसे अपनी राजनीतिक सफलता बताएंगे। लेकिन यदि प्रदर्शन पिछले चुनाव जैसा रहा तो बिहार की वैकल्पिक राजनीति का उनका दावा गंभीर सवालों के घेरे में आ जाएगा। बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम चाहे जो भी हो, इतना तय है कि यह चुनाव केवल एक विधायक चुनने तक सीमित नहीं रहेगा। भाजपा के लिए यह अपने अभेद्य किले की रक्षा की परीक्षा है। राजद के लिए यह विपक्षी नेतृत्व बचाने की चुनौती है। और प्रशांत किशोर के लिए यह रणनीतिकार से जननेता बनने की सबसे कठिन अग्निपरीक्षा है। बिहार की राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि चुनाव केवल आंकड़ों से नहीं, माहौल से भी जीते जाते हैं। लेकिन बांकीपुर में इस बार आंकड़े भाजपा के साथ हैं, संगठन भाजपा के साथ है, जबकि माहौल बनाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी प्रशांत किशोर ने खुद अपने कंधों पर उठा ली है। अब 30 जुलाई का मतदान ही बताएगा कि बांकीपुर की जनता अनुभव, संगठन और परंपरा के साथ जाती है या फिर बदलाव के नए प्रयोग पर भरोसा करती है।</p>
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		<title>सरहद पार की साज़िश और आंतरिक सुरक्षा की नई चुनौतियाँ</title>
		<link>https://ravivardelhi.com/cross-border-conspiracies-and-new-challenges-to-internal-security/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ravivar Delhi]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 09 Jul 2026 20:09:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[पंजाब]]></category>
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		<category><![CDATA[Cross-border conspiracies and new challenges to internal security]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अशोक भाटिया आज की ताजा खबर है कि चंडीगढ़ पुलिस ने सेक्टर-11 के एक दवा स्टोर के कैशियर जानकी दास की हत्या की जांच के दौरान पाकिस्तान समर्थित आईएसआई के एक बड़े अंतरराष्ट्रीय नार्को-टेरर और फेक करेंसी नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। पुलिस ने पंजाब के सीमावर्ती जिलों (तरनतारन और अमृतसर) में छापेमारी कर इस &#8230;</p>
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<p><strong>अशोक भाटिया</strong></p>



<p>आज की ताजा खबर है कि चंडीगढ़ पुलिस ने सेक्टर-11 के एक दवा स्टोर के कैशियर जानकी दास की हत्या की जांच के दौरान पाकिस्तान समर्थित आईएसआई के एक बड़े अंतरराष्ट्रीय नार्को-टेरर और फेक करेंसी नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। पुलिस ने पंजाब के सीमावर्ती जिलों (तरनतारन और अमृतसर) में छापेमारी कर इस सिंडिकेट से जुड़े तीन और आरोपियों को गिरफ्तार किया है।</p>



<p>दरअसल अक्सर जो अपराध सतही तौर पर स्थानीय रंजिश या लूटपाट की आम घटना दिखाई देते हैं, उनकी जड़ें देश की सीमाओं के पार तक फैली होती हैं। चंडीगढ़ के सेक्टर-11 में एक दवा स्टोर के कैशियर (जानकी दास) की नृशंस हत्या की जांच के दौरान चंडीगढ़ पुलिस ने जिस अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया है, वह इसी कड़वी हकीकत की तस्दीक करता है। इस हत्याकांड के सुरागों का पीछा करते हुए क्राइम ब्रांच जब पंजाब के सीमावर्ती जिलों—तरनतारन और अमृतसर—तक पहुँची, तो एक ऐसा खौफनाक मंज़र सामने आया जिसने देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है।यह केवल एक साधारण आपराधिक गिरोह नहीं था, बल्कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा पोषित एक बड़ा &#8216;नार्को-टेरर&#8217; (मादक पदार्थ-आतंकवाद) और जाली नोटों का नेटवर्क था। इस कार्रवाई में भारी मात्रा में मेथामफेटामाइन (नशीला पदार्थ), ₹8 लाख के नकली नोट, और अवैध हथियार बरामद होना यह साबित करता है कि भारत के खिलाफ सीमा पार से जारी &#8216;प्रॉक्सी वॉर&#8217; (छद्म युद्ध) ने अब नया और अधिक घातक रूप अख्तियार कर लिया है।</p>



<p>देखने वाली बात यह है कि पिछले कुछ दशकों में आतंकवाद का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। अब यह केवल बंदूकों और बमों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे &#8216;हाइब्रिड वॉरफेयर&#8217; के रूप में लड़ा जा रहा है। नार्को-टेररिज्म इस रणनीति का सबसे खतरनाक हथियार है।इसके तहत एक तरफ सीमा पार से ड्रग्स भेजकर भारत की युवा पीढ़ी को शारीरिक और मानसिक रूप से खोखला किया जाता है, तो दूसरी तरफ उसी ड्रग्स की बिक्री से मिलने वाले काले धन का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों, हथियारों की खरीद और स्लीपर सेल्स को फंडिंग देने के लिए किया जाता है।इस विशिष्ट मामले में नशीले पदार्थों के साथ &#8216;फेक इंडियन करेंसी नोट&#8217; (FICN) की बरामदगी यह दर्शाती है कि दुश्मन देश भारत की आर्थिक संप्रभुता पर भी समानांतर प्रहार कर रहा है। बाजार में नकली नोटों को खपाकर भारतीय मुद्रा की साख को कमजोर करने और महंगाई व अस्थिरता पैदा करने की यह एक सोची-समझी साज़िश है।</p>



<p>चंडीगढ़ पुलिस की जांच में जो सबसे चिंताजनक पहलू सामने आया है, वह है इस नेटवर्क द्वारा सीमा पार से तस्करी के लिए ड्रोन तकनीक का धड़ल्ले से इस्तेमाल। पंजाब की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि कटीले तारों और चौसीस घंटे की बीएसएफ (BSF) की चौकसी के बावजूद, आसमान के रास्ते को पूरी तरह सील करना एक बड़ी चुनौती बन गया है। पाकिस्तान में बैठे आका रात के अंधेरे में आधुनिक, कम आवाज वाले ड्रोनों के जरिए जीपीएस कोऑर्डिनेट्स का उपयोग कर हेरोइन, मेथामफेटामाइन और जाली नोटों के पैकेट भारतीय सीमा के भीतर गिरा देते हैं।स्थानीय स्तर पर &#8216;ड्रॉप&#8217; उठाने वाले कूरियर सुरक्षा एजेंसियों के रडार से बचने के लिए अत्यधिक एनक्रिप्टेड डिजिटल मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं। इस केस में गिरफ्तार आरोपी—गुरमीत सिंह उर्फ बादशाह, आकाश कुमार और सचिन सिलवेस्टर—इसी कॉपरेटिव नेटवर्क के प्यादे थे, जो तकनीक के सहारे देश विरोधी ताकतों के एजेंडे को जमीन पर उतार रहे थे।</p>



<p>इस पूरे खुलासे का सबसे स्याह और डरावना पहलू यह है कि इस अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का मुख्य सूत्रधार या रणनीतिकार कोई बाहर घूम रहा अपराधी नहीं, बल्कि जेल की सलाखों के पीछे बंद गैंगस्टर धर्मिंदर सिंह उर्फ गोली है। यह घटना भारतीय कारागारों की सुरक्षा और प्रबंधन पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।एक खूंखार अपराधी जेल के भीतर बैठकर मोबाइल फोन, इंटरनेट और एनक्रिप्टेड ऐप्स के जरिए पाकिस्तान में आईएसआई के हैंडलर्स और बाहर जमीन पर सक्रिय अपने गुर्गों के बीच पुल का काम कर रहा था।जेलों का &#8216;क्राइम हब&#8217; में बदल जाना यह दिखाता है कि तकनीक के इस दौर में हमारे जेल प्रशासन के पास या तो आधुनिक जैमर्स और सर्विलांस उपकरणों की कमी है, या फिर भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि देश की सुरक्षा दांव पर लगा दी जाती है। जब तक जेलों से गैंगस्टरों के नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया जाएगा, तब तक बाहर सड़क पर पुलिस की हर कामयाबी अधूरी रहेगी।</p>



<p>गौरतलब है कि पंजाब ने अस्सी और नब्बे के दशक में उग्रवाद का एक लंबा और काला दौर देखा है। बड़ी कुर्बानियों के बाद वहां शांति बहाल हुई थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से &#8216;उड़ता पंजाब&#8217; की जो छवि बनी है, वह इसी नार्को-टेरर का परिणाम है।चंडीगढ़ पुलिस द्वारा इन सीमावर्ती जिलों में की गई छापेमारी बताती है कि इन क्षेत्रों में इस नेटवर्क की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं। बेरोजगार युवाओं को पैसों का लालच देकर इस दलदल में धकेला जा रहा है।आज का सबसे बड़ा खतरा यह है कि स्थानीय अपराधियों और वैचारिक रूप से प्रेरित आतंकवादियों के बीच की लकीर मिट चुकी है। अपराधी अब केवल फिरौती या डकैती नहीं कर रहे, बल्कि वे विदेशी ताकतों के हाथों के खिलौने बनकर देश के खिलाफ देशद्रोह के मामलों में सीधे शामिल हो रहे हैं।</p>



<p>इस पूरे घटनाक्रम में चंडीगढ़ पुलिस की भूमिका अत्यंत सराहनीय रही है। एक स्थानीय हत्या के मामले को केवल एक &#8216;ब्लाइंड मर्डर&#8217; मानकर फाइल बंद करने के बजाय, पुलिस ने इसके पीछे छिपे वृहद पैटर्न को समझा। चंडीगढ़ जैसे केंद्र शासित प्रदेश की पुलिस ने पंजाब पुलिस और केंद्रीय खुफिया एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित कर त्वरित कार्रवाई की। आरोपियों के फोन रिकॉर्ड्स, वित्तीय लेनदेन और कॉल डेटा के विश्लेषण से ही इस सिंडिकेट का पर्दाफाश संभव हो सका। यह आधुनिक पुलिसिंग का एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे डेटा और तकनीक का सही इस्तेमाल कर बड़े से बड़े सिंडिकेट को तोड़ा जा सकता है।</p>



<p>इस खुलासे ने सुरक्षा एजेंसियों के सामने कुछ अनिवार्य और कड़े कदम उठाने की आवश्यकता को रेखांकित किया है:जैसे देश की सभी संवेदनशील जेलों में &#8216;आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस&#8217; आधारित सर्विलांस, आधुनिक 5G जैमर्स और नियमित औचक निरीक्षण अनिवार्य किए जाएं। जेल के भीतर मोबाइल का मिलना एक अक्षम्य राष्ट्रीय सुरक्षा अपराध माना जाना चाहिए।भारत-पाकिस्तान सीमा पर &#8216;एंटी-ड्रोन सिस्टम&#8217; और लेजर फेंसिंग को बड़े पैमाने पर तैनात करने की गति तेज करनी होगी, ताकि आसमान से होने वाली इस अवैध सप्लाई चेन को हवा में ही नष्ट किया जा सके।इस नार्को-टेरर नेटवर्क की कमर तब तक नहीं टूटेगी जब तक इनके वित्तीय साम्राज्य को नेस्तनाबूद नहीं किया जाता। ईडी और एनआईए जैसी केंद्रीय एजेंसियों को इस सिंडिकेट की संपत्तियों को कुर्क करना चाहिए और हवाला नेटवर्क को ध्वस्त करना चाहिए।ड्रग्स और आतंकवाद का कोई राज्य नहीं होता। इसके लिए पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़ को मिलाकर एक संयुक्त, स्थायी &#8216;नार्को-टेरर इंटेलिजेंस ग्रिड&#8217; बनाने की जरूरत है, जहां रीयल-टाइम सूचनाएं साझा की जा सकें।</p>



<p>अब यह चंडीगढ़ पुलिस का यह खुलासा एक गंभीर चेतावनी है। यह हमें याद दिलाता है कि भारत के खिलाफ साजिश रचने वाली ताकतें कभी सोती नहीं हैं; वे लगातार अपनी रणनीतियां बदल रही हैं। सरहद पार बैठे आकाओं के मंसूबों को नाकाम करने के लिए हमारी सुरक्षा एजेंसियों को अपराधियों से दो कदम आगे रहना होगा।दवा स्टोर के कैशियर की जान तो वापस नहीं आ सकती, लेकिन उनकी मौत की जांच से जो सच बाहर आया है, उसने देश को एक बड़े खतरे के प्रति सचेत कर दिया है। अब समय आ गया है कि नार्को-आतंकवाद के खिलाफ &#8216;जीरो टॉलरेंस&#8217; की नीति को केवल बयानों में नहीं, बल्कि जमीन पर अत्यंत आक्रामकता के साथ लागू किया जाए। देश की संप्रभुता, युवाओं के भविष्य और हमारी आर्थिक स्थिरता की रक्षा के लिए इस पूरे नेटवर्क की जड़ों में तेजाब डालना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।</p>
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		<title>भारतीय वायुसेना की बढ़ती ताकत</title>
		<link>https://ravivardelhi.com/the-growing-might-of-the-indian-air-force/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Ravivar Delhi]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 09 Jul 2026 20:08:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[The Growing Might of the Indian Air Force]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>महेन्द्र तिवारी भारतीय वायुसेना को लेकर हाल ही में सामने आई विश्व स्तर की रैंकिंग ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता, संचालन क्षमता, प्रशिक्षण, तकनीकी दक्षता और रणनीतिक तैयारी से जीते जाते हैं। वर्ल्ड डायरेक्टरी ऑफ मॉडर्न मिलिट्री एयरक्राफ्ट यानी &#8230;</p>
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<p><strong>महेन्द्र तिवारी</strong></p>



<p>भारतीय वायुसेना को लेकर हाल ही में सामने आई विश्व स्तर की रैंकिंग ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता, संचालन क्षमता, प्रशिक्षण, तकनीकी दक्षता और रणनीतिक तैयारी से जीते जाते हैं। वर्ल्ड डायरेक्टरी ऑफ मॉडर्न मिलिट्री एयरक्राफ्ट यानी WDMMA द्वारा जारी नवीनतम ग्लोबल एयर पावर रैंकिंग में भारत को चीन से ऊपर स्थान दिया गया है। यह उपलब्धि केवल एक रैंकिंग भर नहीं है, बल्कि पिछले कई वर्षों से भारतीय वायुसेना द्वारा किए जा रहे आधुनिकीकरण, बेहतर प्रशिक्षण, तकनीकी उन्नयन और परिचालन क्षमता में निरंतर सुधार की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली मान्यता भी है। WDMMA ने 103 देशों की 129 सैन्य वायु इकाइयों तथा लगभग 48,082 सैन्य विमानों का अध्ययन करके यह मूल्यांकन तैयार किया है। इसमें केवल विमानों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी वास्तविक युद्ध क्षमता, रखरखाव, उपलब्धता, तकनीकी स्तर, प्रशिक्षण, हथियार प्रणाली, लॉजिस्टिक सहायता और भविष्य की क्षमता जैसे अनेक पहलुओं को शामिल किया गया है।</p>



<p>रैंकिंग में अमेरिका की वायुसेना पहले स्थान पर है और उसके बाद अमेरिकी नौसेना तथा रूस की वायुसेना का स्थान आता है। इसके बाद अमेरिकी सेना और मरीन कॉर्प्स की विमानन शाखाएं हैं। भारतीय वायुसेना छठे स्थान पर है जबकि चीन की वायुसेना सातवें स्थान पर है। पहली नजर में यह परिणाम कई लोगों को चौंकाने वाला लग सकता है क्योंकि चीन के पास भारत की तुलना में कहीं अधिक संख्या में सैन्य विमान हैं। फिर भी भारत को आगे रखा गया है। इसका कारण यह है कि आधुनिक सैन्य मूल्यांकन में केवल संख्या निर्णायक नहीं होती। किसी भी वायुसेना की वास्तविक ताकत इस बात से तय होती है कि वह अपने विमानों का कितनी प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकती है, उसके पायलट कितने प्रशिक्षित हैं, उसकी युद्धक रणनीति कितनी मजबूत है और वह किसी भी संकट की स्थिति में कितनी तेजी से प्रतिक्रिया देने में सक्षम है।</p>



<p>भारतीय वायुसेना की सबसे बड़ी विशेषता उसका व्यापक परिचालन अनुभव है। स्वतंत्रता के बाद से भारत ने अनेक युद्धों, सीमित सैन्य अभियानों, आतंकवाद विरोधी अभियानों तथा मानवीय राहत कार्यों में अपनी वायु शक्ति का सफल उपयोग किया है। चाहे 1971 का युद्ध हो, कारगिल संघर्ष हो या हाल के वर्षों में सीमा पर उत्पन्न तनावपूर्ण परिस्थितियां, भारतीय वायुसेना ने समय पर, सटीक और प्रभावी कार्रवाई करके अपनी क्षमता का परिचय दिया है। इस लंबे अनुभव ने उसे केवल तकनीकी रूप से ही नहीं बल्कि रणनीतिक रूप से भी अधिक परिपक्व बनाया है।</p>



<p>भारत ने पिछले एक दशक में वायुसेना के आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान दिया है। आधुनिक लड़ाकू विमान, लंबी दूरी की मिसाइलें, उन्नत रडार, नेटवर्क आधारित युद्ध प्रणाली, स्वदेशी तकनीकों का बढ़ता उपयोग और निगरानी क्षमता में उल्लेखनीय सुधार ने भारतीय वायुसेना को नई शक्ति प्रदान की है। फ्रांस से प्राप्त राफेल लड़ाकू विमानों ने भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता में महत्वपूर्ण वृद्धि की है। इनके साथ आधुनिक मिसाइल प्रणालियां और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली भी जुड़ी हुई हैं, जिससे किसी भी संभावित संघर्ष में भारत की प्रतिक्रिया क्षमता पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हुई है। साथ ही तेजस जैसे स्वदेशी लड़ाकू विमान भारत की आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।</p>



<p>भारत की भौगोलिक स्थिति भी उसकी वायु रणनीति को विशेष महत्व देती है। एक ओर पाकिस्तान की सीमा है तो दूसरी ओर चीन जैसी बड़ी सैन्य शक्ति। उत्तर में ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र, पश्चिम में रेगिस्तान, पूर्वोत्तर के कठिन पर्वतीय इलाके और दक्षिण में विशाल समुद्री क्षेत्र भारतीय वायुसेना के सामने विविध प्रकार की चुनौतियां प्रस्तुत करते हैं। ऐसी परिस्थितियों में किसी भी वायुसेना को बहुआयामी क्षमता विकसित करनी पड़ती है। भारतीय वायुसेना ने इन सभी परिस्थितियों के अनुरूप प्रशिक्षण और संसाधनों का विकास किया है। यही कारण है कि उसकी परिचालन क्षमता को विश्व स्तर पर सराहा जा रहा है।</p>



<p>चीन के पास विमानों की संख्या अधिक होने के बावजूद भारत का आगे आना यह भी दर्शाता है कि आधुनिक युद्ध में गुणवत्ता का महत्व लगातार बढ़ रहा है। किसी देश के पास हजारों विमान होने से वह स्वतः सबसे शक्तिशाली नहीं बन जाता। यदि उन विमानों का रखरखाव, प्रशिक्षण, तकनीकी उन्नयन और युद्ध के समय उनका समन्वित उपयोग प्रभावी नहीं है तो संख्या का लाभ सीमित हो जाता है। WDMMA का मूल्यांकन इसी व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित है। इसी कारण भारतीय वायुसेना को उसके वास्तविक परिचालन प्रदर्शन और समग्र युद्ध क्षमता के आधार पर बेहतर स्थान मिला है।</p>



<p>हालांकि यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत के सामने कई चुनौतियां भी मौजूद हैं। भारतीय वायुसेना लंबे समय से अपने स्वीकृत लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या से कम स्क्वाड्रनों के साथ कार्य कर रही है। पुराने लड़ाकू विमानों को चरणबद्ध तरीके से सेवा से हटाया जा रहा है और उनकी जगह नए विमानों की आवश्यकता लगातार बनी हुई है। आने वाले वर्षों में तेजस के नए संस्करण, उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान कार्यक्रम और पांचवीं पीढ़ी के स्वदेशी लड़ाकू विमान परियोजना जैसे कार्यक्रमों की सफलता भारत की वायु शक्ति को और अधिक मजबूत बनाएगी।</p>



<p>भविष्य के युद्धों का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। अब केवल लड़ाकू विमान ही निर्णायक नहीं होंगे बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मानव रहित विमान, स्वार्म ड्रोन, साइबर युद्ध, अंतरिक्ष आधारित निगरानी, नेटवर्क आधारित कमान प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसी तकनीकें भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। भारत इन क्षेत्रों में भी तेजी से निवेश कर रहा है। रक्षा अनुसंधान संस्थानों और निजी उद्योगों की भागीदारी बढ़ने से देश की रक्षा उत्पादन क्षमता में सुधार हो रहा है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत रक्षा उपकरणों का स्वदेशी निर्माण भविष्य में भारत की सामरिक स्वतंत्रता को और मजबूत करेगा।</p>



<p>भारतीय वायुसेना केवल युद्ध लड़ने वाली संस्था नहीं है। प्राकृतिक आपदाओं, बाढ़, भूकंप, महामारी और अन्य संकटों के समय भी उसने हजारों लोगों की जान बचाई है। राहत सामग्री पहुंचाना, दूरदराज के क्षेत्रों से नागरिकों को निकालना, विदेशों से भारतीयों की सुरक्षित वापसी और मानवीय सहायता पहुंचाना उसके नियमित कार्यों का हिस्सा बन चुका है। इस कारण भारतीय वायुसेना की छवि केवल एक सैन्य शक्ति की नहीं बल्कि राष्ट्रीय सेवा के विश्वसनीय संगठन की भी है।</p>



<p>आज दुनिया में सैन्य शक्ति का अर्थ केवल आक्रमण की क्षमता नहीं बल्कि प्रभावी प्रतिरोध की क्षमता भी है। मजबूत वायुसेना किसी भी देश के लिए सुरक्षा कवच का कार्य करती है। यदि किसी देश की वायु शक्ति सक्षम होती है तो संभावित विरोधी भी आक्रामक कदम उठाने से पहले कई बार सोचने को विवश होता है। भारत की बढ़ती वायु शक्ति इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह क्षेत्रीय स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों को मजबूत करती है।</p>



<p>भारत की उपलब्धि का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इससे देश के रक्षा उद्योग और वैज्ञानिक समुदाय का मनोबल बढ़ेगा। स्वदेशी तकनीकों के विकास, अनुसंधान और नवाचार को नई गति मिलेगी। इससे रोजगार, औद्योगिक विकास और तकनीकी आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा मिलेगा। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता केवल सैन्य आवश्यकता नहीं बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।</p>



<p>यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी भी वैश्विक रैंकिंग को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। विभिन्न संस्थाएं अलग-अलग मानकों के आधार पर मूल्यांकन करती हैं और उनके निष्कर्ष भी अलग हो सकते हैं। फिर भी यदि किसी प्रतिष्ठित संस्था द्वारा भारत की वायु शक्ति को चीन से बेहतर आंका गया है तो यह भारतीय वायुसेना की पेशेवर क्षमता, अनुशासन, प्रशिक्षण और तकनीकी दक्षता का महत्वपूर्ण संकेत अवश्य है। यह उपलब्धि संतोष का विषय है, लेकिन इसे अंतिम लक्ष्य मानने के बजाय आगे की तैयारी का आधार बनाया जाना चाहिए।</p>



<p>आने वाले वर्षों में भारत को अपने लड़ाकू विमान बेड़े का विस्तार, आधुनिक मिसाइल प्रणालियों का समावेश, स्वदेशी विमान निर्माण, ड्रोन तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित युद्ध प्रणाली और अंतरिक्ष आधारित सैन्य क्षमताओं पर निरंतर निवेश करना होगा। यदि यह गति बनी रहती है तो भारतीय वायुसेना न केवल एशिया बल्कि विश्व की सबसे प्रभावशाली वायु सेनाओं में और मजबूत स्थान प्राप्त कर सकती है। वर्तमान रैंकिंग यह संदेश देती है कि आधुनिक युद्ध की दुनिया में केवल संसाधनों का आकार नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता, तैयारी, रणनीतिक सोच और निरंतर नवाचार ही किसी राष्ट्र को वास्तविक शक्ति प्रदान करते हैं। भारत ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाए हैं और यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।</p>
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