बांकीपुर उपचुनाव: भाजपा के अभेद्य किले में प्रशांत किशोर की अग्निपरीक्षा

Bankipur By-election: Prashant Kishor's Trial by Fire in BJP's Impregnable Stronghold

अजय कुमार

बिहार की राजनीति में बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव अब केवल एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है। यह मुकाबला तीन बड़े राजनीतिक संदेशों की लड़ाई बन चुका है। एक तरफ भाजपा अपने तीन दशक पुराने गढ़ को बचाने की चुनौती से जूझ रही है, दूसरी तरफ राष्ट्रीय जनता दल अपने परंपरागत वोट बैंक को एकजुट रखने की कोशिश में है, जबकि जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर पहली बार चुनाव मैदान में उतरकर अपनी पूरी राजनीतिक विश्वसनीयता दांव पर लगा चुके हैं। यही वजह है कि राजधानी पटना की यह सीट पूरे बिहार की सबसे चर्चित चुनावी रणभूमि बन गई है। हालिया घटनाक्रम ने मुकाबले को और रोचक बना दिया है। जन सुराज के वरिष्ठ नेता रितेश रंजन उर्फ बिट्टू सिंह ने पार्टी छोड़कर एनडीए प्रत्याशी के समर्थन का ऐलान कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि प्रशांत किशोर चुनावी रणनीतिकार तो हो सकते हैं, लेकिन राजनीतिक दल चलाने की क्षमता उनमें नहीं दिखती। इसी बीच प्रशांत किशोर ने अपने नामांकन कार्यक्रम में भी बदलाव करते हुए अब 13 जुलाई को नामांकन करने का फैसला किया है। पार्टी अध्यक्ष मनोज भारती ने कार्यकर्ताओं के लिए नया सर्कुलर जारी कर पूरी ताकत के साथ नामांकन कार्यक्रम को सफल बनाने का आह्वान किया है। दूसरी ओर राजद ने रेखा गुप्ता को उम्मीदवार बनाया, लेकिन उम्मीदवार घोषित होने के साथ ही पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा। पहले सांसद सुरेंद्र यादव ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह रेखा गुप्ता को नहीं जानते, फिर वरिष्ठ नेता भाई वीरेंद्र ने भी उम्मीदवार चयन पर सवाल उठा दिए। इतना ही नहीं, तेज प्रताप यादव की जनशक्ति जनता दल ने वीणा मानवी को मैदान में उतारकर महागठबंधन के वोटों में संभावित सेंध का संकेत दे दिया। कांग्रेस भी उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया से असहज दिखाई दे रही है। इन घटनाओं ने विपक्षी एकजुटता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बांकीपुर का चुनावी इतिहास भाजपा के पक्ष में बेहद मजबूत रहा है। वर्तमान स्वरूप में 2010 के परिसीमन के बाद से यह सीट लगातार भाजपा के पास रही है, जबकि यदि पुराने पटना पश्चिम क्षेत्र को जोड़ दिया जाए तो 1995 से यहां भाजपा का दबदबा कायम है। नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा चार बार और उनके पुत्र नितिन नवीन लगातार पांच बार विधायक रहे। 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के नितिन नवीन को 98,299 वोट मिले थे, जबकि राजद की रेखा गुप्ता को लगभग 46 हजार और जन सुराज की उम्मीदवार वंदना कुमारी को केवल 7,717 वोट मिले थे। यानी भाजपा और जन सुराज के बीच करीब 90 हजार वोटों का अंतर था। यही आंकड़ा बताता है कि प्रशांत किशोर के सामने चुनौती कितनी कठिन है। फिर भी प्रशांत किशोर ने सुरक्षित सीट चुनने के बजाय भाजपा के सबसे मजबूत किले में उतरने का फैसला किया। उनका तर्क है कि यह चुनाव केवल जीत-हार का नहीं बल्कि बिहार की राजनीति की दिशा बदलने का प्रयास है। चुनावी रणनीतिकार के रूप में नरेंद्र मोदी से लेकर कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों के लिए रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर अब पहली बार खुद जनता से वोट मांग रहे हैं। पिछले कई महीनों से उन्होंने बांकीपुर में अलग तरह का चुनाव अभियान तैयार किया है। सुबह पार्कों में युवा टीम लोगों से संवाद करती है, दिन में महिला कार्यकर्ता घर-घर पहुंचकर महंगाई, शिक्षा और सुरक्षा जैसे मुद्दे उठाती हैं, जबकि शाम को नुक्कड़ सभाओं, चौपाल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए भाजपा और राजद दोनों पर हमला बोला जाता है। सोशल मीडिया से लेकर मोहल्ला स्तर तक जन सुराज ने हाईटेक और जमीनी प्रचार का मिश्रित मॉडल तैयार किया है।

लेकिन चुनाव केवल अभियान से नहीं जीते जाते। बांकीपुर का सामाजिक समीकरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस विधानसभा क्षेत्र में लगभग चार लाख मतदाता हैं। इनमें कायस्थ मतदाता निर्णायक माने जाते हैं, जिनकी संख्या लगभग 14 प्रतिशत बताई जाती है। भाजपा ने इसी समीकरण को ध्यान में रखते हुए अभिषेक कुमार को उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा वैश्य, सवर्ण, शहरी मध्यम वर्ग और भाजपा का पारंपरिक संगठनात्मक नेटवर्क भी इस सीट पर मजबूत माना जाता है। दूसरी ओर मुस्लिम मतदाता लगभग 8 से 10 प्रतिशत माने जाते हैं और उनका बड़ा हिस्सा भाजपा विरोधी मतदान करता रहा है। ऐसे में यदि विपक्ष बंटता है तो मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा राजद की ओर जाने की संभावना अधिक मानी जा रही है, क्योंकि राजद लगातार यह नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहा है कि भाजपा को वास्तविक चुनौती वही दे सकता है। प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी उम्मीद युवा मतदाता हैं। पेपर लीक, बेरोजगारी, पलायन, खराब शहरी व्यवस्था, जलजमाव, ट्रैफिक और शिक्षा जैसे मुद्दों को उन्होंने लगातार चुनावी बहस का केंद्र बनाया है। बांकीपुर शहरी सीट है और यहां पढ़े-लिखे तथा नौकरीपेशा मतदाताओं की संख्या ग्रामीण सीटों की तुलना में अधिक है। यही कारण है कि जन सुराज जातीय राजनीति से हटकर ‘गुड गवर्नेंस’ और शहरी विकास का एजेंडा सामने रख रही है। लेकिन बिहार की चुनावी राजनीति का अनुभव बताता है कि अंतिम समय में जातीय ध्रुवीकरण अक्सर स्थानीय मुद्दों पर भारी पड़ता है।

इस चुनाव में भाजपा की रणनीति भी बदली हुई नजर आ रही है। पार्टी ने केवल उम्मीदवार घोषित कर चुनाव नहीं छोड़ा है, बल्कि संगठन के बड़े नेताओं को बांकीपुर में सक्रिय कर दिया है। नितिन नवीन स्वयं क्षेत्र में लगातार मौजूद हैं और पार्टी बूथ स्तर तक नेटवर्क मजबूत करने में जुटी है। भाजपा इस चुनाव को अपनी संगठनात्मक ताकत और शहरी वोट बैंक की परीक्षा मान रही है। दूसरी तरफ राजद इसे भाजपा के खिलाफ विपक्षी आधार बचाने की लड़ाई के रूप में देख रहा है। जबकि जन सुराज के लिए यह अस्तित्व और भविष्य दोनों का सवाल बन चुका है। एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में जन सुराज ने 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी का कुल मत प्रतिशत लगभग 2.44 प्रतिशत ही रहा। ऐसे में प्रशांत किशोर के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या वे कुछ महीनों के भीतर अपने संगठन को इतनी मजबूती दे पाए हैं कि भाजपा और राजद जैसे स्थापित दलों को सीधी चुनौती दे सकें। यदि जन सुराज का वोट शेयर कई गुना बढ़ता है, भले जीत न मिले, तब भी प्रशांत किशोर इसे अपनी राजनीतिक सफलता बताएंगे। लेकिन यदि प्रदर्शन पिछले चुनाव जैसा रहा तो बिहार की वैकल्पिक राजनीति का उनका दावा गंभीर सवालों के घेरे में आ जाएगा। बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम चाहे जो भी हो, इतना तय है कि यह चुनाव केवल एक विधायक चुनने तक सीमित नहीं रहेगा। भाजपा के लिए यह अपने अभेद्य किले की रक्षा की परीक्षा है। राजद के लिए यह विपक्षी नेतृत्व बचाने की चुनौती है। और प्रशांत किशोर के लिए यह रणनीतिकार से जननेता बनने की सबसे कठिन अग्निपरीक्षा है। बिहार की राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि चुनाव केवल आंकड़ों से नहीं, माहौल से भी जीते जाते हैं। लेकिन बांकीपुर में इस बार आंकड़े भाजपा के साथ हैं, संगठन भाजपा के साथ है, जबकि माहौल बनाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी प्रशांत किशोर ने खुद अपने कंधों पर उठा ली है। अब 30 जुलाई का मतदान ही बताएगा कि बांकीपुर की जनता अनुभव, संगठन और परंपरा के साथ जाती है या फिर बदलाव के नए प्रयोग पर भरोसा करती है।