डॉ वंदना शर्मा
जुलाई का उमस भरा मौसम। हवा तो बस नाम मात्र की चल रही थी। सड़ी हुई गर्मी पड़ रही थी। ईश्वर भी जैसे मानसून के साथ मजाक ही कर रहे थे। बादल आते तो जरूर लेकिन बरसते नहीं। ऊपर बैठा ईश्वर भी टिंकू के हालात पर हंस रहा होगा, जिसकी आंखे टप-टप बरस रही थी। टिंकू अपनी बीवी का फोटो हाथ में ले बिस्तर पर औंधा लेटा हुआ जार-जार रोये जा रहा था। साथ ही अपनी बीवी से माफी मांग रहा था। “मुझे माफ कर दो विनीता मैं तुम्हारा साथ नहीं दे पाया। पर एक मौका तो देती मुझे हालात सुधारने का। बिना कुछ कहे, बिना किसी शिकायत के क्यूं चली गई।
अपने घरवालों को खुश करने में हमेशा तुम्हारी उपेक्षा की। हमेशा तुम्हें ही चुप रहने को कहा। कभी तुम्हारी बात नहीं सुनी। और देखो आज मैं अकेला हूँ। कोई नहीं है मेरे साथ। ना मां-बाबू जी, ना बड़े भैया-भाभी, ना छोटा भाई। सबने मेरा साथ छोड़ दिया।”
टिंकू अपने परिवार में मंझला बेटा था। रामायण का प्रभाव कुछ ज्यादा ही था मन पर हमेशा लक्ष्मण बना रहता बड़े भाई के लिए। बड़ी भाभी को मां समझता सबकी सेवा करता रात-दिन। उसके इस भोलेपन का फायदा सभी परिवार वाले उठाते। टिंकू के एक बहन भी थी उमा ।छोटी थी पर हुक्म चलाती थी उस पर। अपना सारा काम भी उसी से कराती और बाद में ताना मार देती कि इकलौती बहन है उसके लिए कुछ कर नहीं सकते।
बड़े भैया-भाभी भी फायदा उठाते उसका, घर का सारा काम करवाते, उसकी सारी सैलरी अपने बच्चों पर ही खर्च करवा देते। मीठा-मीठा बोलकर रोज लूट रहे थे। पर टिंकू को उनकी चालाकियां समझ नहीं आती। वो तो आदर्श बेटा, आदर्श भाई बनने के लिए सब कुछ त्याग करने बैठा था। टिंकू दिल्ली में जॉब करता। जब भी किसी त्योहार पर घर जाता तो अपने भतीजे को फोन करता – “लाडो क्या लाऊं तेरे लिए” और भतीजा भी लम्बी-चौड़ी लिस्ट बता देता। उसकी बड़ी भाभी भी दिल्ली से अपने लिए कुछ न कुछ मंगाती रहती। जब भी घर जाता सबके लिए कपड़े, खाने का राशन, उपहार सब ले जाता। घर जाकर भी कहीं न आराम करता। अपनी मम्मी के सिर में तेल लगाता, उनके पैर दबाता, पूरे घर की सफाई करता। और बड़ी भाभी को खुश करने के लिए खाना भी बना देता। रसोई का भी सब काम करता। फिर भी घर वाले उसे नकारा, मूर्ख और बड़बोला बोलते। क्योंकि सबकी सेवा करने में वो अपनी नौकरी पर कम ध्यान देता।
उसकी बहन की शादी नहीं हो रही थी। क्योंकि वो बहुत काली थी। चार साल से उसके लिए रिश्ता ढूंढ रहे थे। किसी ज्योतिष ने बताया कि पहले टिंकू का रिश्ता पक्का कर दो। उसकी बीवी के भाग्य से तुम्हारी बेटी का भी रिश्ता हो जाएगा। हुआ भी ऐसा ही। जैसे ही टिंकू का रोका हुआ। उसकी बहन का रिश्ता पक्का हो गया। सबने अब टिंकू की शादी को चार महीने के लिए टाल दिया और उमा की शादी धूमधाम से करने पर फोकस किया।
टिंकू की होने वाली बीवी विनीता बहुत ही भोली और धार्मिक विचारों वाली लड़की थी। टिकू की मां बहुत तेज थी। उसने बहुत सोच-विचार कर विनीता को हाँ इसीलिए कहा था कि सीधी है मुंह नहीं खोलेगी और उसे आसानी से नौकरानी बनाया जा सकता है। टिंकू की मां ने चार महीने तक विनीता से बात करने के लिए मना कर दी और ताना देते हुए बोली अपनी छोटी बहन की शादी की जिम्मेदारी तुझे ही निभानी है। बड़ा तो किसी काम में हाथ ना लगाता।
उमा की शादी होते ही टिंकू की मां ने अपना रंग दिखाना शुरू किया। टिंकू की शादी की कोई तैयारी नहीं की और विनीता के घर वालों का भी बहुत अपमान किया। टिंकू की शादी इसी उमस वाली जुलाई में हुई थी। और टिंकू की खामोशी की वजह से उसकी जिंदगी में सावन कभी आया ही नहीं।
टिंकू की मां ने उसकी शादी बेमन से ऐसे ही उमा की शादी के बचे-खुचे सामान से ही निपटा दी। ना तो विनीता को कोई सोने की चीज चढ़ाई न ही कोई अच्छी साड़ी। शादी के अगले दिन से ही विनीता को सास ने नौकरानी बना दिया। जेठानी भी दूसरी सास बनी-फिरती। सारा काम विनीता को ही करना पड़ता। टिंकू भी उसके हक के लिए कोई आवाज नहीं उठाता। वो तो खुद अपने घरवालों की चापलूसी करता रहता सारे दिन। और विनीता से भी यही कहता कि – “मुंह खोलने की जरूरत नहीं है। चुपचाप सबकी सेवा करती रहो।”
भोली विनीता सारा दिन परिवार की सेवा में लगी रहती कोई उससे खाने को भी नहीं पूछता। दिन के तीन बज जाते उसके मुंह में रोटी का एक निवाला ना जाता। जेठानी घर का कुछ काम न करती। घर के सभी सदस्यों के कपड़े धोने, सबके लिए खाना बनाना, घर की सफाई भी उसी को करनी पड़ती। घर के किसी काम में उसकी सलाह न ली जाती। घर की सारी बाते उससे छिपाई जाती। पर उसका हाल पूछने वाला कोई न था। इस दुनिया में उसी बहु की कदर होती है जिसका पति उसकी कदर करता है। अगर पति पत्नी का सम्मान करता है और दूसरों से भी करवाता है तो ससुराल में किसी की हिम्मत नहीं उस बहु को कुछ कह दे।
टिंकू के छोटे भाई की शादी में टिंकू और विनीता के साथ बहुत भेद-भाव हुआ। सारा काम करने को तो वो दोनों और उन्हें घर की किसी रस्म में शामिल नहीं किया गया। टिंकू को महसूस तो हो रहा था यह परायापन पर बोला कुछ नहीं। उसकी आंखों पर तो पट्टी बंधी थी जैसे। विनीता की देवरानी तेज थी वो कोई काम न करती। शादी के चौथे दिन ही अपने पति को लेकर अलग हो गई। पर सब उसकी तारीफ ही करते क्योंकि वो कभी अपनी बीवी की बुराई न तो खुद करता, न किसी को करने देता। हमेशा सबके सामने अपनी बीवी की ही तारीफ करता। उसके देवर की अच्छी सैलरी थी किसी चीज की कमी नहीं थी। दुनिया का नियम है कि पैसे वाले के सौ गुनाह भी माफ होते हैं।
विनीता बेचारी करती भी क्या जब उसका पति ही नहीं सुनता उसकी बात, तो किससे कहे अपना दर्द। विनीता ने कई बार टिंकू को समझाने की कोशिश भी की कि अब तो तुम्हारे सभी भाई-बहन की शादी हो गई। सब अपनी गृहस्थी में खुश हैं। अब तो अपनी गृहस्थी पर ध्यान दो। सब तुम्हारा फायदा उठाते हैं। कोई प्यार नहीं करता तुम्हें।”
टिंकू अपने घरवालों का नाम सुनते ही आग-बबूला हो जाता और विनीता पर हाथ उठा देता और धमकी देता – “मेरे घरवाले मेरा परिवार है, मेरे खून के रिश्ते हैं। उनके बारे में बात करने की कोई जरूरत नहीं। खून का रिश्ता ही काम आता है। बीवी तो दोबारा मिल जाएगी लेकिन मां-बाप नहीं।”
विनीता भी क्या करती। उसने टिंकू से बोलना ही बंद कर दिया। अब वो कभी कोई शिकायत न करती। चुपचाप अपना फर्ज पूरा करती, जितना उससे होता सबकी सेवा करती। अपनी बीमारी के बारे में भी किसी को नहीं बताया। और एक दिन उसकी उसी बीमारी से मृत्यु हो गई। सभी घर वाले टिंकू को ही ताना देने लगे। “सबकी चापलूसी करता फिरता है। अपनी बीवी का इलाज क्यूं ना कराया।” सब उसे अकेला छोड़कर चले जाते हैं।
आज वहीं टिकू अपनी बीवी के साथ किए गलत व्यवहार पर शर्मिंदा है और उससे माफी मांग रहा है। पर इस दुनिया से जानेवाला कभी वापस नहीं आता माफ करने के लिए।





