राजेश जैन
मोंगला पोर्ट और तीस्ता नदी से जुड़े हालिया फैसले केवल दो विकास परियोजनाओं की कहानी नहीं हैं। ये दक्षिण एशिया में बदलते शक्ति संतुलन की नई तस्वीर पेश करते हैं। भारत के सामने चुनौती सिर्फ चीन के बढ़ते प्रभाव का जवाब देने की नहीं, बल्कि अपने पड़ोसियों के साथ भरोसे और साझेदारी को लगातार मजबूत बनाए रखने की भी है। विदेश नीति में खाली जगह ज्यादा देर तक खाली नहीं रहती। जहां प्रभाव कमजोर पड़ता है, वहां कोई दूसरा देश अपनी मौजूदगी दर्ज करा देता है। ऐसे में आने वाले वर्षों में भारत-बांग्लादेश संबंध इस बात पर निर्भर करेंगे कि दोनों देश साझा इतिहास को भविष्य की मजबूत साझेदारी में कितनी सफलतापूर्वक बदल पाते हैं।
दोस्ती की मजबूत नींव
भारत और बांग्लादेश के रिश्तों की बुनियाद 1971 के मुक्ति संग्राम से जुड़ी है। बांग्लादेश की आजादी में भारत ने निर्णायक भूमिका निभाई। इसके बाद दोनों देशों के बीच व्यापार, सुरक्षा, ऊर्जा, सड़क, रेल और जलमार्ग जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग लगातार बढ़ता गया। विशेषकर पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल में दोनों देशों के संबंध अपने सबसे मजबूत दौर में रहे। सीमा विवादों का समाधान हुआ, आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ा और कई कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर तेजी से काम शुरू हुआ। भारत ने अरबों डॉलर की लाइन ऑफ क्रेडिट उपलब्ध कराई और मोंगला व चटगांव जैसे महत्वपूर्ण बंदरगाहों के विकास में भी भागीदारी की योजना बनाई। लेकिन 2026 तक आते-आते तस्वीर बदलती नजर आने लगी है। मोंगला पोर्ट के आर्थिक क्षेत्र का प्रोजेक्ट अब चीन को मिल गया है। साथ ही तीस्ता नदी प्रबंधन में भी चीन की भूमिका बढ़ने की संभावना बनी है। इन घटनाओं ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को नई दिशा दे दी है।
आखिर क्या बदल गया
अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश की राजनीतिक प्राथमिकताएं बदलने लगीं। नई सरकार ने चीन के साथ आर्थिक और रणनीतिक सहयोग बढ़ाने के संकेत दिए। जून 2026 में प्रधानमंत्री तारिक रहमान की चीन यात्रा के दौरान कई महत्वपूर्ण समझौते हुए। इनमें सबसे चर्चित फैसला मोंगला पोर्ट के पास बनने वाले विशेष आर्थिक क्षेत्र का प्रोजेक्ट भारत के बजाय चीन को सौंपना रहा। यहीं से यह मामला केवल निवेश का नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया में प्रभाव की प्रतिस्पर्धा का बन गया।
मोंगला पोर्ट क्यों है इतना महत्वपूर्ण
मोंगला बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा समुद्री बंदरगाह है और यह भारत की समुद्री सीमा से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित है। चीन यहां आधुनिक कंटेनर टर्मिनल, वेयरहाउस, लॉजिस्टिक्स पार्क और औद्योगिक क्षेत्र विकसित करेगा। इससे मोंगला की व्यापारिक क्षमता कई गुना बढ़ सकती है। भारत की चिंता केवल आर्थिक नहीं है। रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दुनिया के कई हिस्सों में चीन ने बंदरगाहों के विकास के जरिए अपनी दीर्घकालिक रणनीतिक मौजूदगी मजबूत की है। श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह अक्सर इस संदर्भ में उदाहरण के तौर पर दिया जाता है। हालांकि मोंगला को लेकर फिलहाल किसी सैन्य उपयोग की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
तीस्ता परियोजना बढ़ा रही चिंता
अगर मोंगला समुद्री सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है तो तीस्ता परियोजना भारत की जमीनी सुरक्षा से जुड़ी मानी जा रही है। तीस्ता नदी का प्रस्तावित विकास क्षेत्र सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी ‘चिकन नेक’ के करीब है। यही संकरा गलियारा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्से से जोड़ता है। यदि चीन इस क्षेत्र में लंबे समय तक इंफ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी परियोजनाओं से जुड़ा रहता है, तो भारत की सुरक्षा एजेंसियां स्वाभाविक रूप से इसे संवेदनशील नजरिए से देखेंगी। यही वजह है कि यह परियोजना केवल नदी प्रबंधन तक सीमित नहीं मानी जा रही।
भारत की सबसे चार बड़ी चुनौतियां
भारत के सामने चार प्रमुख चुनौतियां दिखाई देती हैं।
पहली, कूटनीतिक चुनौती। जिन परियोजनाओं में भारत की भागीदारी तय मानी जा रही थी, वे अब चीन के पास जा रही हैं। इससे क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर नई प्रतिस्पर्धा पैदा हुई है।
दूसरी, सुरक्षा चुनौती। बंगाल की खाड़ी में चीन की आर्थिक मौजूदगी भविष्य में सामरिक महत्व भी हासिल कर सकती है।
तीसरी, व्यापारिक चुनौती। भारत पूर्वोत्तर राज्यों को मोंगला और चटगांव बंदरगाहों के जरिए कम लागत वाले समुद्री मार्ग से जोड़ना चाहता था। इससे परिवहन समय और खर्च दोनों कम होते। नई परिस्थितियां इन योजनाओं को प्रभावित कर सकती हैं।
चौथी, क्षेत्रीय प्रभाव की चुनौती। चीन दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में लगातार बंदरगाहों, रेलवे, औद्योगिक क्षेत्रों और आधारभूत ढांचे में निवेश बढ़ा रहा है। इसे उसकी व्यापक समुद्री रणनीति का हिस्सा माना जाता है।
क्या चीन सिर्फ निवेश कर रहा
यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। चीन की विदेश नीति में आर्थिक निवेश, आधारभूत ढांचे का निर्माण और व्यापारिक सहयोग महत्वपूर्ण साधन रहे हैं। कई देशों में इन परियोजनाओं ने समय के साथ चीन की रणनीतिक उपस्थिति भी मजबूत की है। पाकिस्तान का ग्वादर और श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह इसके चर्चित उदाहरण हैं। हालांकि हर देश की परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि मोंगला भविष्य में सैन्य अड्डे में बदल जाएगा। लेकिन भारत इस संभावना पर निश्चित रूप से नजर बनाए हुए है।
भारत के सामने आगे का रास्ता
भारत के लिए सबसे जरूरी है कि वह केवल प्रतिक्रिया देने के बजाय सक्रिय पड़ोसी नीति अपनाए। सबसे पहले, बांग्लादेश के साथ राजनीतिक और कूटनीतिक संवाद लगातार मजबूत रखना होगा। सरकारें बदलती हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं बदलते।
दूसरा, भारत को अपनी अधूरी कनेक्टिविटी परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा करना होगा। क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा में देरी भी नुकसान का कारण बन सकती है।
तीसरा, पूर्वोत्तर भारत को व्यापार और उद्योग का मजबूत केंद्र बनाना होगा ताकि उसकी आर्थिक क्षमता स्वाभाविक रूप से बढ़े।
चौथा, हिंद महासागर क्षेत्र में भारत जिन समुद्री परियोजनाओं, नौसैनिक क्षमताओं और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों पर काम कर रहा है, उन्हें और गति देनी होगी।
बदल रही दक्षिण एशिया की तस्वीर
भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल सरकारों के बीच नहीं हैं। साझा इतिहास, संस्कृति, भाषा, व्यापार और लोगों के बीच गहरे रिश्ते आज भी दोनों देशों को जोड़ते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि आज की दुनिया में केवल ऐतिहासिक मित्रता पर्याप्त नहीं होती। प्रभाव बनाए रखने के लिए तेज फैसले, समय पर निवेश, भरोसेमंद साझेदारी और सक्रिय कूटनीति जरूरी होती है। मोंगला और तीस्ता की कहानी यही बताती है कि दक्षिण एशिया अब नए शक्ति संतुलन की ओर बढ़ रहा है। इस बदलते दौर में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन का मुकाबला भर नहीं, बल्कि अपने पड़ोस में भरोसे, विकास और साझेदारी का ऐसा मॉडल प्रस्तुत करना है, जो किसी भी बाहरी प्रभाव से अधिक मजबूत साबित हो।





