परदे के पीछे की कूटनीति और भारत-पाक संबंधों की नई पहेली

Behind-the-scenes diplomacy and the new puzzle of India-Pakistan relations

बिशन पपोला

भारत और पाकिस्तान के संबंधों को समझना हमेशा आसान नहीं रहा है। दोनों देशों के बीच जितनी तल्ख़ी सार्वजनिक मंचों पर दिखाई देती है, उसके समानांतर अक्सर ऐसे संपर्क भी चलते रहते हैं जो सुर्खियों में कम दिखाई देते हैं। यही कारण है कि कूटनीति के बारे में कहा जाता है कि जो दिखाई देता है, वह पूरी कहानी नहीं होता और जो वास्तव में होता है, वह अक्सर सार्वजनिक दृष्टि से दूर रहता है। हाल के दिनों में कोलंबो में आयोजित एक क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद को लेकर उठी चर्चा ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या भारत और पाकिस्तान के बीच औपचारिक रिश्तों के समानांतर कोई वैकल्पिक संवाद भी जारी है, या फिर यह केवल सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसे आवश्यकता से अधिक महत्व दिया जा रहा है।

भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध पिछले कुछ वर्षों में लगातार तनावपूर्ण रहे हैं। सीमा पार आतंकवाद, जम्मू-कश्मीर, नियंत्रण रेखा पर संघर्षविराम उल्लंघन और राजनीतिक बयानबाज़ी ने दोनों देशों के बीच विश्वास की खाई को और गहरा किया है। वर्ष 2025 में पहलगाम आतंकी हमले और उसके बाद भारत द्वारा की गई सैन्य कार्रवाई ने इस दूरी को और बढ़ा दिया। ऐसे माहौल में यदि किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दोनों देशों के प्रतिनिधि एक ही मंच पर दिखाई दें या अलग-अलग स्तर पर बातचीत की खबर सामने आए, तो स्वाभाविक रूप से वह चर्चा का विषय बन जाती है।

हालांकि, यह समझना आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल औपचारिक बैठकों से संचालित नहीं होते। विश्व राजनीति में कई प्रकार के संवाद समानांतर रूप से चलते हैं। आधिकारिक वार्ताओं को ट्रैक-1 कहा जाता है, जबकि पूर्व राजनयिकों, रणनीतिक विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और प्रभावशाली गैर-सरकारी व्यक्तियों के बीच होने वाली चर्चाओं को ट्रैक-2 कूटनीति कहा जाता है। इसके अतिरिक्त ट्रैक-1.5 ऐसा मंच होता है, जहां सरकारी और गैर-सरकारी दोनों प्रकार के प्रतिभागी विचार-विमर्श करते हैं। इन बैठकों का उद्देश्य तत्काल कोई समझौता करना नहीं होता, बल्कि संवाद के रास्ते खुले रखना, विभिन्न पक्षों की सोच को समझना और भविष्य के संभावित समाधान तलाशना होता है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब इन बैठकों को राजनीतिक दृष्टि से देखा जाने लगता है। भारत में ट्रैक-2 या ट्रैक-1.5 संवाद को अक्सर गुप्त वार्ता या बैकचैनल कूटनीति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि दोनों की प्रकृति अलग होती है। बैकचैनल वार्ता सामान्यतः सरकारों की जानकारी और सहमति से किसी विशेष उद्देश्य के लिए संचालित होती है, जबकि ट्रैक-2 संवाद अपेक्षाकृत स्वतंत्र विमर्श का मंच होता है। इसलिए किसी सम्मेलन में भारतीय और पाकिस्तानी प्रतिनिधियों की उपस्थिति को सीधे नीति परिवर्तन का संकेत मान लेना उचित नहीं कहा जा सकता।

फिर भी यह भी उतना ही सच है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई भी संवाद पूरी तरह निरर्थक नहीं होता। इतिहास बताता है कि कई बार औपचारिक वार्ताओं का मार्ग अनौपचारिक संपर्कों ने ही प्रशस्त किया है। शीत युद्ध के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच अनेक अकादमिक एवं रणनीतिक संवाद बाद में बड़े समझौतों की पृष्ठभूमि बने। इसी प्रकार भारत और पाकिस्तान के बीच भी अतीत में कई बार अनौपचारिक संपर्कों ने तनाव कम करने में भूमिका निभाई है। इसलिए ऐसे मंचों के महत्व को पूरी तरह नकारना भी उचित नहीं होगा।

कोलंबो बैठक को लेकर भारत सरकार की प्रतिक्रिया इस दृष्टि से महत्वपूर्ण रही कि उसने स्पष्ट कर दिया कि यह किसी भी प्रकार की आधिकारिक वार्ता नहीं थी और सरकार का उससे कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। यह प्रतिक्रिया केवल तथ्यात्मक स्पष्टीकरण नहीं थी, बल्कि वर्तमान राजनीतिक और रणनीतिक परिस्थिति का भी संकेत थी। भारत लंबे समय से यह स्पष्ट करता रहा है कि आतंकवाद और वार्ता साथ-साथ नहीं चल सकते। इसलिए सरकार किसी ऐसे संदेश से बचना चाहती है जिससे यह लगे कि आधिकारिक स्तर पर पाकिस्तान के साथ सामान्य संवाद फिर से प्रारंभ हो गया है।

दूसरी ओर, यह भी देखा जा रहा है कि समाज और रणनीतिक समुदाय के कुछ वर्ग दोनों देशों के बीच न्यूनतम संवाद बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दे रहे हैं। उनका तर्क है कि दो परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी देशों के बीच संचार के सभी रास्ते बंद हो जाना स्वयं क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता है। यदि मतभेदों का समाधान तत्काल संभव न भी हो, तब भी संवाद का एक न्यूनतम ढांचा बना रहना चाहिए ताकि किसी संकट की स्थिति में गलतफहमी या अनावश्यक टकराव से बचा जा सके।

यहीं से बहस का दूसरा पक्ष सामने आता है। भारत में एक बड़ा वर्ग मानता है कि पाकिस्तान ने दशकों से आतंकवाद को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाया है और जब तक उसके व्यवहार में ठोस परिवर्तन नहीं दिखाई देता, तब तक किसी भी प्रकार के सामान्यीकरण की चर्चा समय से पहले होगी। इस दृष्टिकोण के समर्थकों का कहना है कि केवल बातचीत की तस्वीरें या शांति की अपील आतंकवाद की वास्तविक चुनौती का समाधान नहीं हैं। विश्वास तभी बन सकता है जब जमीन पर व्यवहार में परिवर्तन दिखाई दे।

यही कारण है कि हाल के दिनों में संवाद की आवश्यकता पर दिए गए विभिन्न सार्वजनिक वक्तव्यों को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज़ हुई है। कुछ लोगों ने इसे व्यावहारिक सोच बताया, जबकि अन्य ने इसे समय से पहले की पहल माना। लोकतंत्र में ऐसे मतभेद स्वाभाविक हैं, क्योंकि विदेश नीति केवल आदर्शवाद से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, जनभावनाओं और रणनीतिक हितों के संतुलन से संचालित होती है।

मीडिया की भूमिका भी इस पूरे प्रकरण में उल्लेखनीय है। पहले ऐसे क्षेत्रीय सम्मेलन नियमित रूप से होते थे, लेकिन उन्हें सीमित कवरेज मिलती थी। आज भारत-पाकिस्तान संबंधों से जुड़ी हर छोटी घटना तुरंत राष्ट्रीय बहस का विषय बन जाती है। सोशल मीडिया के दौर में किसी सम्मेलन की तस्वीर, किसी प्रतिनिधि की उपस्थिति या किसी टिप्पणी को अलग-अलग संदर्भों में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे कई बार वास्तविकता और धारणा के बीच अंतर पैदा हो जाता है। परिणामस्वरूप किसी सामान्य रणनीतिक सम्मेलन को भी बड़े कूटनीतिक घटनाक्रम के रूप में देखा जाने लगता है।

वास्तविकता यह है कि भारत और पाकिस्तान के संबंध केवल दो देशों का द्विपक्षीय विषय नहीं रह गए हैं। दक्षिण एशिया की स्थिरता, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद, परमाणु संतुलन और वैश्विक शक्ति समीकरण भी इन संबंधों को प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक, विश्वविद्यालय और रणनीतिक संस्थान समय-समय पर ऐसे संवाद आयोजित करते रहते हैं, जिनमें दोनों देशों के प्रतिनिधि भाग लेते हैं। इन बैठकों का उद्देश्य किसी सरकार की ओर से समझौता करना नहीं, बल्कि विचारों का आदान-प्रदान करना होता है।

आज भारत की विदेश नीति पहले की तुलना में अधिक आत्मविश्वासी और स्पष्ट दिखाई देती है। भारत वैश्विक मंचों पर अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को खुलकर रख रहा है और आतंकवाद के मुद्दे पर उसका रुख लगातार कठोर बना हुआ है। ऐसे में यह संभावना कम ही दिखाई देती है कि केवल किसी ट्रैक-2 या ट्रैक-1.5 बैठक के आधार पर भारत अपनी घोषित नीति में बदलाव करेगा। दूसरी ओर, यह भी उतना ही स्पष्ट है कि किसी भी जिम्मेदार राष्ट्र के लिए सभी प्रकार के संवाद पूरी तरह समाप्त कर देना भी दीर्घकालिक समाधान नहीं माना जाता।

भारत-पाकिस्तान संबंधों का भविष्य अंततः केवल सम्मेलनों, बयानों या तस्वीरों से तय नहीं होगा। वास्तविक परिवर्तन तभी संभव होगा जब आतंकवाद के प्रश्न पर ठोस और सत्यापित प्रगति दिखाई दे, सीमा पर स्थिरता कायम रहे और दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक किसी भी प्रकार के संवाद को लेकर आशा और संशय दोनों साथ-साथ चलते रहेंगे।

दरअसल, कूटनीति का मूल उद्देश्य शोर मचाना नहीं, बल्कि विकल्पों को जीवित रखना होता है। संवाद का अर्थ हमेशा समझौता नहीं होता और कठोर सार्वजनिक रुख का अर्थ हमेशा संपर्क समाप्त हो जाना भी नहीं होता। भारत और पाकिस्तान के वर्तमान संबंध इसी जटिल यथार्थ का उदाहरण हैं, जहां सार्वजनिक राजनीति और परदे के पीछे होने वाले संपर्क समानांतर रूप से चलते दिखाई देते हैं। इसलिए किसी एक घटना के आधार पर न तो अत्यधिक आशावादी निष्कर्ष निकालना उचित होगा और न ही यह मान लेना चाहिए कि हर संवाद सामान्य संबंधों की वापसी का संकेत है।

दक्षिण एशिया की वास्तविक शांति केवल बैठकों से नहीं, बल्कि विश्वास, जवाबदेही और आतंकवाद के विरुद्ध ठोस कार्रवाई से ही संभव होगी। जब तक यह आधार तैयार नहीं होता, तब तक ट्रैक-2 जैसे मंच चर्चा के विषय तो बन सकते हैं, लेकिन स्थायी समाधान का विकल्प नहीं।