रावेल पुष्प
वैसे तो हर भाषा का अपना-अपना साहित्य है, लेकिन दूसरी भाषा के साहित्य से परिचय तो अनुवाद के माध्यम से ही हो सकता है। इसी सन्दर्भ में अगर हम पंजाबी के समृद्ध कथा साहित्य की बात करें तो कई नाम हमारे सामने आते हैं, जिन्हें अनुवाद के कारण ही हिन्दी के पाठकों को अपने लगते हैं मसलन- नानक सिंह, करतार सिंह दुग्गल, अमृता प्रीतम, बलवंत गार्गी तथा और भी कई। मुझे याद आता है राजपाल एंड संस से 2009 में अलग-अलग भाषाओं की श्रेष्ठ कहानियों की एक सीरिज आई थी जिसमें पंजाबी की 18 श्रेष्ठ कहानियां विजय चौहान के सम्पादन में प्रकाशित हुई थीं। उसके बाद भी इस तरह के प्रयास हुए हैं। इधर हाल ही में नीलम शर्मा ‘अंशु’ के संपादन में शानदार हार्ड बाउंड में एक पुस्तक आई है – पंजाबी की निर्वाचित कहानियां, जिसमें कुल मिलाकर 27 कथाकारों की कहानियां हैं,जिनका अनुवाद भी नीलम ने ही किया है।
इस संग्रह की कहानियों का चयन नीलम ने अपनी रुचि और विवेक से किया है और यहां ये कोई दावा भी नहीं है कि ये पंजाबी की श्रेष्ठ कहानियां हैं। हां, उनके चयन में वो कहानियां आ पाई हैं,जिन कहानियों के किसी न किसी पक्ष ने उनके दिल को गहराई तक छुआ है। नीलम दरअसल बंगाल में रहते हुए नेशनल लाइब्रेरी के माध्यम से पंजाबी साहित्य का रसास्वादन ले सकीं।इसके साथ ही पंजाबी में इन दिनों लगभग हर विषय पर कहानियां लिखी जा रही हैं और इन सब से गुजरते हुए उनकी सदिच्छा रही कि हिन्दी पाठकों तक ये कहानियां पहुंच सकें। वैसे ये तो महज बानगी भर ही है, भविष्य में वे और भी अनूदित कहानियां पाठकों को पेश करेंगी। इसके अलावा वे आकाशवाणी कोलकाता के एफ़ एम चैनल पर लगभग 25 वर्षों तक रेडियो जॉकी भी रहीं। उनकी हिंदी,पंजाबी और बांग्ला में आपसी अनुवाद की अब तक 21 पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है, जिसमें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित बांग्ला लेखक देवेश राय के उपन्यास ‘ तिस्ता पारेर ब्रितांतो’ का साहित्य अकादमी के लिए ही सीधे पंजाबी में अनुवाद ‘गाथा तिस्ता पार दी’ शामिल है। इसके अलावा विभिन्न साहित्यक पत्रिकाओं में भी उनके द्वारा अनूदित कहानियां ससम्मान प्रकाशित होती ही रहती हैं।
इस संग्रह की पहली कहानी नानक सिंह की अंतिम किरण है, जिसमें एक कोठे पर लेखक से होनेवाली गुफ़्तगू है जहां एक वेश्या कहती है- “दिल जैसी चीज कौन किसके पास अमानत रखता है? हमलोगों के पास जो दिल बतौर अमानत रखे जाते हैं न,वे असली नहीं होते और ऐसे दिलों की कीमत भी कोई बहुत ज्यादा नहीं होती। बल्कि कभी-कभी तो ये सब्जी मंडी के सड़े हुए आमों से भी सस्ते बिक जाते हैं।” लेकिन ख़ुदा न खा़स्ता अगर कोई सच्चा मिल भी जाए तो समाज उसे जीने नहीं देता।
एस बलवंत की कहानी – “दिल्ली में खोई चवन्नी” में कथा के बहाने पुरानी दिल्ली के इतिहास के कई अनछुए पहलू उजागर हुए हैं मसलन- सब्जी मंडी के उपर एक पहाड़ी थी, जहां एक मीनार बनी हुई थी उसे जीतगढ़ कहा जाता था।
इसके अलावे जी बी रोड वाली आंटियों के बारे में यह भी सुना था कि शाही महल में रहने के कारण इनके पास तहजीब और बातचीत के सलीके का बहुत बढ़िया हुनर था। इन सब के सलीके और तहजीब में माहिर होने के कारण कई धनाढ्य माता-पिता द्वारा अपने बिगड़ैल शहजादों को तहजीब सीखने के लिए इन आंटियों के पास भेजा जाता था।
इसी तरह वीना वर्मा की ‘खरीदी हुई औरत’ में पंजाब के ऐसे बंदे की कथा है जिन जैसों की शादी किसी कारण से नहीं हो पाती थी। वैसे पंजाब में लड़कियों का अभाव भी काफ़ी था। वैसे लोग बंगाल से गरीब घर की लड़कियां खरीद कर ले जाते थे और विवाह करते थे।
इसी तरह इन चयनित कहानियों में पंजाब के रहन-सहन, सामाजिक ताना-बाना और वहां की मिट्टी की ख़ुशबू भरी है। इसके अलावा चयनित कहानीकारों में शामिल हैं – दिलीप कौर टिवाणा, रामस्वरूप अणखी,मोहन भंडारी,हमदर्दवीर नौशहरवी,जिंदर,वरियाम सिंह संधू,अजमेर सिद्धू,भगवंत रसूलपुरी,परवेज कौर संधू तथा अन्य।
इस चयन में एकाध कमजोर कहानी छोड़कर सभी जीवन के किसी न किसी पक्ष को बखूबी रेखांकित करती हैं और पंजाब की बनती-बिगड़ती आबोहवा से भी रुबरु करवाती हैं।
नवीन प्रकाशन कोलकाता द्वारा प्रकाशित ये पुस्तक सही अर्थों में हिन्दी पाठकों के लिए एक अनुपम उपहार है।





